टीम एबीएन, रांची। ओटीसी ग्राउंड स्थित राज्य ग्रामीण विकास संस्थान (सर्ड) के आवासीय परिसर में चल रहे दस दिवसीय श्री शतचंडी महायज्ञ सह श्रीमद् देवी भागवतम ज्ञान यज्ञ के तीसरे दिन शुक्रवार को मां भगवती के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा हुई। चैत्र नवरात्र के मौके पर आयोजित इस भव्य आयोजन में वैदिक मंत्रोच्चार की गूंज रही।
वाराणसी से आए यज्ञाचार्य नागेंद्र नाथ ओझा व सह यज्ञाचार्य निरंजन दास मिश्र के मंत्रों पर श्रद्धालु मुग्ध रहे। इन्हीं मंत्रों के साथ यज्ञाचार्य ने अरणी मंथन (लकड़ी घिसकर अग्नि प्रज्ज्वलित) कर अग्नि प्रज्जवलित की। इसके साथ ही शुक्रवार से हवन की शुरुआत हो गयी, जो पूरे यज्ञ अवधि तक चलेगी।
अग्नि प्रज्ज्वलित के साथ ही मौके पर मौजूद श्रद्धालुओं ने मां भगवती का खूब जयकारा लगाया। पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। सुबह पूजा की शुरूआत के साथ ही यज्ञ मंडप पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। भारी संख्या में महिला-पुरुष, बच्चे-बूढ़े यज्ञ मंडप की परिक्रमा किए और मां से आशीष मांगी।
यज्ञ से पवित्र होता है वातावरण : यज्ञाचार्य
महायज्ञ के प्रमुख यज्ञाचार्य नागेंद्र नाथ ओझा ने अरणी मंथन के महत्व पर प्रकाश डाला और इससे होने वाले कल्याण के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यज्ञ से वातावरण पवित्र होता है। विश्व में इतने विष्फोट हो रहे हैं, वातावरण दूषित हो रहा है। ऐसे आकाश तत्व की पवित्रता नहीं आयेगी, तब तक समाज का कल्याण नहीं होगा। यही अरणी मंथन से अग्नि का व जलन से सत्यता का प्रतीक है। धर्मो रक्षति रक्षित:... धर्म की हमें रक्षा करनी है, धर्म ही हमारी रक्षा करता है।
अग्नि कुंड को जागृत करने में माचिस का प्रयोग नहीं करते हैं : सह यज्ञाचार्य
महायज्ञ के सह यज्ञाचार्य निरंजन दास मिश्र ने बताया कि मंत्र के तरंग के बीच लकड़ी के घर्षण से अग्नि उत्पन्न कर अग्नि कुंड को जागृत किया जाता है। उसमें माचिस का प्रयोग नहीं किया जाता है। इसके दर्शन मात्र से नेत्र के कई विकार (रोग) समाप्त हो जाते हैं।
प्रेम से भगवान का नाम लो, यही भागवत होने की निशानी : मनु श्री महाराज
श्री शतचंडी महायज्ञ सह श्रीमद् देवी भागवतम ज्ञान यज्ञ में शुक्रवार को वृंदावन से आए संत मनु श्री महाराज ने प्रवचन के दौरान परीक्षित-शुकदेव संवाद का रोचक तरीके से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि कलयुग में ईश्वर प्राप्ति का, समस्त वेद, पुराण, शास्त्र का एक ही निचोड़ है, प्रेम से भगवान का नाम लो, यही भागवत होने की निशानी है। सिर्फ भगवान का नाम लें, वहीं साथ जाएगा। बाकी सब यही छूट जाएगा।
मनु श्री महाराज ने कहा कि परीक्षित के पास केवल सात दिन थे, सात दिन बाद उनकी मृत्यु होनी थी और वे मुनि सुखदेव के पास अपनी शंका मिटाने के लिए गए थे, तब सुखदेव मुनि ने कहा कि आप व्यर्थ की चिंता कर रहे हो। शरीर को तो मरना ही है। आत्मा शरीर बदल रही है। आत्मा अमर है, वह मरती नहीं। फिर चिंता की क्या बात।
सुखदेव मुनि ने परीक्षित को दिव्य ज्ञान से सांसारिक मोह के बंधन से मुक्त कर दिया। मनु श्री महाराज ने सांतनु-सत्यवती विवाह व भीष्म प्रसंग का भी अपने प्रवचन के माध्यम से पूरी व्याख्या की। पूरे प्रवचन के दौरान पंडाल में मौजूद सैकड़ों की भीड़ शांत-चित होकर भागवत कथा का अमृतपान करती रही। प्रवचन के बाद श्रद्धालुओं ने भोग के रूप में सूजी के हलवा का प्रसाद लिया।
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