कई पौराणिक कथाओं को समेटे हैं सनातन के पर्व-त्योहार

 

राजकुमारी पाण्डेय

एबीएन सोशल डेस्क। सनातन धर्म में पर्वों की यही बात है कि इनके पीछे छुपे पौराणिक कथा अपनी ओर आकर्षित करते हैं। आज जाने  होलिका दहन का इतिहास। होलिका दहन का पर्व  संदेश देता है कि ईश्वर अपने अनन्य भक्तों की रक्षा के लिये सदैव अपने भक्तो के साथ रहते हैं। 

होलिका दहन होली के पहले दिन फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसके अगले दिन रंगों से होली खेलने की परंपरा है जिसे धुलेंडी धुलंडी और धूलि आदि नामों से भी जाना जाता है। होली बुराई पर अच्छाई की विजय के उपलक्ष्य में मनायी जाती है। होलिका दहन (जिसे छोटी होली भी कहते हैं) के अगले दिन पूरी हर्षोल्लास के साथ रंग खेलने का विधान है और अबीर-गुलाल आदि एक-दूसरे को लगाकर व गले मिलकर इस पर्व को मनाया जाता है।

भारत में मनाये जाने वाले सबसे शानदार त्योहारों में से एक है होली। दीवाली की तरह ही इस त्योहार को भी अच्छाई की बुराई पर जीत का त्योहार माना जाता है। हिंदुओं के लिये होली का पौराणिक महत्व भी है। इस त्योहार को लेकर सबसे प्रचलित है प्रहलाद होलिका और हिरण्यकश्यप की कहानी। लेकिन होली की केवल यही नहीं बल्कि और भी कई कहानियां प्रचलित है। वैष्णव परंपरा मे होली को होलिका-प्रहलाद की कहानी का प्रतीकात्मक सूत्र मानते हैं।

होलिका दहन का नियम

फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से फाल्गुन पूर्णिमा तक होलाष्टक माना जाता है। जिसमें शुभ कार्य वर्जित रहते हैं। पूर्णिमा के दिन होलिका-दहन किया जाता है। इसके लिए मुख्यतः दो नियम ध्यान में रखने चाहिए...

  1. पहला उस दिन भद्रा न हो। भद्रा का दूसरा नाम विष्टि करण भी है जो कि 11 करणों में से एक है। एक करण तिथि के आधे भाग के बराबर होता है।
  2. दूसरी बात पूर्णिमा प्रदोषकाल-व्यापिनी होनी चाहिये। सरल शब्दों में कहें तो उस दिन सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्तों में पूर्णिमा तिथि होनी चाहिये।                  

होलिका दहन की पौराणिक कथा

पुराणों के अनुसार दानवराज हिरण्यकश्यप ने जब देखा कि उसका पुत्र प्रह्लाद सिवाय विष्णु भगवान के किसी अन्य को नहीं भजता है तो वह क्रुद्ध हो उठा और प्रहलाद को कई बार मारने की कोशिश किया अंततः उसे नही मार पाया। हिरणयकश्यप का हर कोशिश विफल हो गया। तब अंत मे उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया की वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए क्योंकि होलिका को वरदान प्राप्त था कि उसे अग्नि नुकसान नहीं पहुंचा सकती।लेकिन ऐसा नही हुआ। जब होलिका प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठी किन्तु हुआ इसके ठीक विपरीत होलिका खुद उस अग्नि में जलकर भस्म हो गयी और भक्त प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ। इसी घटना की याद में इस दिन होलिका दहन करने का विधान है। होली का पर्व संदेश देता है कि इसी प्रकार ईश्वर अपने अनन्य भक्तों की रक्षा के लिये  सदैव अपने भक्तो के साथ उपस्थित रहते हैं।होली की केवल यही नहीं बल्कि और भी कई कहानियां प्रचलित है। होलिका दहन के अगले दिन होली बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।

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