टीम एबीएन, रांची। झारखंड में नियम कानून की बातें तो खूब होती हैं। लेकिन जब उसे अमलीजामा पहनाने की बात आती है तो चुप्पी साध ली जाती है। यह बात यहां की ब्यूरोक्रेसी को कड़वी लगेगी। क्योंकि अधिकारी जानते हैं कि सदन से पारित हो जाने भर से कोई विधेयक यानी बिल कानून नहीं बन जाता है। उसे एक प्रक्रिया से गुजरना होता है।
राज्य सूची से जुड़े बिल को विधानसभा से पारित होने के बाद राज्यपाल और समवर्ती सूची से जुड़े बिल को विधानसभा से पारित होने के बाद राष्ट्रपति की सहमति जरूरी होती है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि राष्ट्रपति की सहमति के लिए केंद्र सरकार के अलग-अलग मंत्रालयों में आठ ऐसे बिल लटके हैं, जिनपर संबंधित मंत्रालयों ने कुछ जरूरी टिप्पणी या स्पष्टीकरण मांगा है।
आठ बिल में से सात बिल ऐसे हैं, जो पूर्ववर्ती रघुवर सरकार के कार्यकाल में विधानसभा से पारित कराये गये थे।
एक बिल वर्तमान हेमंत सोरेन सरकार से जुड़ा है। राज्यपाल के प्रधान सचिव नितिन मदन कुलकर्णी को 3 जनवरी 2023 को गृह मंत्रालय के अंडर सेक्रेटरी ने पत्र जारी कर इस ओर ध्यान आकृष्ट कराया है। पत्र में कहा गया है कि लंबित बिल पर राष्ट्रपति की सहमति के लिए कमेंट उपलब्ध कराया जाये।
केंद्र से चिट्ठी आने के बाद राज्यपाल के प्रधान सचिव नितिन मदन कुलकर्णी ने 6 जनवरी 2023 को सूबे के मुख्य सचिव सुखदेव सिंह को पत्र लिखकर जल्द से जल्द स्पष्टीकरण उपलब्ध कराने का आग्रह किया है, ताकि आगे की कार्रवाई पूरी की जा सके।
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