एबीएन सोशल डेस्क। उपभोक्ता को तय राशि के भुगतान के बदले दी जाने वाली सेवा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के दायरे में आती है। उसमें देरी या लापरवाही की स्थिति में पीड़ित व्यक्ति न्याय प्राप्ति हेतु सेवा प्रदाता के विरुद्ध उपभोक्ता अदालत का द्वार खटखटा सकता है। बेशक वह परिवहन सेवा हो या फिर डॉक्टर अथवा अस्पताल से मिलने वाली मेडिकल सेवा।
प्रदेश की एक उपभोक्ता अदालत में 31 जनवरी, 2017 को परिवादी प्रभुलाल पालीवाल द्वारा परिवाद दायर किया गया। जिसमें उन्होंने बताया कि 8 दिसंबर, 2016 को उनके पुत्र मुकेश का विवाह था। इसके लिए आठ दिसंबर को सुबह 11 बजे जावद से उदयपुर बारात लेकर जाने के लिए ट्रेवल एजेंसी की एक बस 14101 रुपये किराये पर तय की गई। बस के मालिक को 2100 रुपये बतौर पेशगी भी दिये थे। लेकिन उक्त बस तय किये गये समय 11 बजे नहीं पहुंची।
परिवादी प्रभुलाल द्वारा बस मालिक से बार-बार संपर्क करने पर उनके द्वारा कुछ देर में बस आने की बात कही जाती रही। प्रतीक्षा में शाम के तीन बज गए। परिवादी को दूसरी बस की व्यवस्था करके बारात लेकर जानी पड़ी। उपभोक्ता अदालत ने बस मालिक द्वारा समय पर बस न भेजने को लापरवाही माना और ट्रेवल कम्पनी पर 19 हजार रुपये हर्जाना लगाते हुए यह राशि पीड़ित उपभोक्ता को दिलाने का आदेश दिया। इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में स्वास्थ्य सेवाओं को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की परिधि में माना है।
सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि चिकित्सकों व स्वास्थ्य सेवाओं को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के दायरे से बाहर नहीं रखा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बाबत मुंबई हाईकोर्ट के फैसले को सही मानते हुए मेडिको लीगल एक्शन ग्रुप की याचिका को खारिजकर दिया।
न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ व न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने माना कि केवल 2019 के अधिनियम द्वारा 1986 के अधिनियम को निरस्त करने से चिकित्सकों द्वारा रोगियों को प्रदान की जाने वाली स्वास्थ्य सेवाओं को सेवा शब्द की परिभाषा से बाहर नहीं किया जायेगा। जबकि याचिकाकर्ता की दलील थी कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत चिकित्सकों के विरुद्ध उपभोक्ता अदालत में शिकायत दर्ज नहीं की जा सकती है। मुंबई हाईकोर्ट ने अक्तूबर 2021 में इस याचिका को खारिज कर दिया था। याचिका में विधेयक पेश करते समय केंद्रीय मंत्री के बयान का हवाला दिया गया,जिसमे मंत्री ने तब कहा था, स्वास्थ्य सेवाएं विधेयक के तहत शामिल नहीं। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि मंत्री का बयान कानून के दायरे को सीमित नहीं कर सकता।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि 1986 के कानून में सेवाओं की परिभाषा में स्वास्थ्य सेवा का उल्लेख नहीं था। इसे नए अधिनियम के तहत शामिल करने का प्रस्ताव था जिसे अंतत: हटा दिया गया। इस पर न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि उपभोक्ता अधिनियम में सेवा की परिभाषा व्यापक है। यदि संसद इसे बाहर करना चाहती तो वह इसे स्पष्ट रूप से कहती। लेकिन संसद द्वारा उक्त बाबत कुछ न कहने से स्वास्थ्य सेवाओं को उपभोक्ता अधिनियम के दायरे में ही माना जायेगा।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम यूं तो सन 1986 में गठित हो गया था जो उपभोक्ताओ के हितों की रक्षा के लिए मील का पत्थर भी साबित हुआ। इस अधिनियम के लागू होने से उपभोक्ताओं को अपने शोषण से मुक्ति व न्याय प्राप्त करने का अधिकार मिला। लेकिन आज भी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो इस उपभोक्ता कानून से अनभिज्ञ हैं। समाज के आखिरी व्यक्ति तक इस उपभोक्ता कानून व न्याय के लिए बनाई गई उपभोक्ता अदालतों की जानकारी होना आवश्यक है। क्योंकि आज भी जागरूकता के अभाव में उपभोक्ता विक्रेताओं व सेवा प्रदाताओं द्वारा की जा रही ठगी का शिकार हो रहे हैं।
उपभोक्ता अदालतों ने पीड़ित उपभोक्ताओं को समय-समय पर न्याय भी दिया है,जो एक ताकत के रूप में व्यवस्थाओं को सुधारने में सहायक सिद्ध हुआ है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 गठित होने के बाद इसमें उपभोक्ता संरक्षण नियम 1987 केंद्र सरकार द्वारा बजट घोषणा से प्रभाव में लाया गया था, जिसके चलते 16 मार्च 2011 को केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद का गठन किया गया। इस अधिनियम के नियमों में 17 बार नवीन प्रावधान जोड़े गये। इसी प्रकार 25 बार विभिन्न नियमों में संशोधन के साथ प्रावधानों को विलोपित किया गया। यानि समय और आवश्यकता के अनुरूप उपभोक्ता कानून को कारगर बनाने की कोशिश होती रही है, जो एक शुभ संकेत है।
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