एबीएन सेंट्रल डेस्क। आंध्र प्रदेश सरकार ने जन सुरक्षा का हवाला देते हुए राष्ट्रीय राजमार्ग समेत विभिन्न सड़कों पर जन सभाएं तथा रैलियां आयोजित करने पर रोक लगा दी है। दरअसल, पिछले सप्ताह कंदुकुरु में राज्य की मुख्य विपक्षी दल तेलुगु देशम पार्टी (तेदेपा) की एक रैली में भगदड़ मचने से आठ लोगों की मौत हो गयी थी। पुलिस के अनुसार लोग बड़ी संख्या में सभास्थल पर पहुंच गये थे और लोगों में आगे जाने की आपाधापी होने लगी थी, इससे भगदड़ की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी। इसके बाद गुंटूर में एक तारीख को तेदेपा के संक्रांति उपहार कार्यक्रम में फिर से भगदड़ मच गई और फिर तीन लोगों की जान चली गयी। इस तरह की दुर्घटनाएं और इनमें निर्दोष लोगों की मौत, दोनों ही दुखद और चिंतनीय है। लेकिन इस वजह की आड़ में अगर जनसभा और रैली करने के लोकतांत्रिक अधिकार को खत्म करने की कोशिश की जाये, तो यह भी बड़ी चिंता का विषय है।
कुछ दिनों के भीतर तेदेपा की दो रैलियों में एक जैसी दुर्घटनाएं हुईं, तो निश्चित ही इसमें कहीं न कहीं प्रशासनिक व्यवस्था की चूक है। राज्य के एक पूर्व मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद होनी चाहिए। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि प्रशासन ने न यह अनुमान लगाया कि सभा में कितने लोग पहुंच सकते हैं, न किसी अप्रिय स्थिति से निपटने की तैयारी थी। कायदे से राज्य सरकार को इस लापरवाह इंतजाम की समीक्षा करनी चाहिए। लेकिन भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों, इसका उपाय करने के लिए जगनमोहन रेड्डी की सरकार ने इस सोमवार को पुलिस कानून, 1861 के प्रावधानों के तहत निषेधाज्ञा जारी कर दी है।
आदेश में कहा गया है कि सार्वजनिक सड़कों पर जनसभा करने का अधिकार पुलिस कानून, 1861 की धारा 30 के तहत नियमन का विषय है। सरकारी आदेश में संबंधित जिला प्रशासन और पुलिस तंत्र से ऐसे स्थानों की पहचान करने के लिए कहा है जो जन सभाओं के लिए सार्वजनिक सड़कों से दूर हों, ताकि यातायात, लोगों की आवाजाही, आपात सेवाओं, आवश्यक सामान की आवाजाही आदि बाधित न हो। आंध्र प्रदेश के प्रधान सचिव ने कहा है कि प्राधिकारियों को सार्वजनिक सड़कों पर जनसभाओं की अनुमति देने से बचना चाहिए। केवल दुर्लभ और असाधारण परिस्थितियों में ही सार्वजनिक सभाओं की अनुमति देने पर विचार किया जा सकता है और इसकी वजहें लिखित में दर्ज होनी चाहिए।
देश में लोकतंत्र के लिए घटते स्थान पर चिंता करने का अब एक और कारण बढ़ गया है। दो साल पहले नीति आयोग के अमिताभ कांत ने भारत में टू मच डेमोक्रेसी यानी जरूरत से अधिक लोकतंत्र का फिकरा कसा था। अब आंध्र प्रदेश के प्रधान सचिव दुर्लभ और असाधारण परिस्थितियों में सार्वजनिक सभा की अनुमति देने की बात कह रहे हैं। अगर भारत में राजशाही या किसी और किस्म का शासन तंत्र होता, तब तो इन शब्दों की व्याख्या की जा सकती थी, लेकिन लोकतंत्र में टू मच या असाधारण परिस्थिति जैसे शब्द ही अलोकतांत्रिक भावना के परिचायक लगते हैं। यह अंग्रेजों का गुलाम भारत नहीं है, जहां गांधीजी को मजबूर होकर सविनय अवज्ञा आंदोलन करना पड़े। यह आजाद भारत है, जिसमें हरेक नागरिक को अपनी बात कहने, सरकार से विरोध प्रकट करने का संवैधानिक अधिकार है। याद दिला दें कि खुद जगन मोहन रेड्डी ने साल 2018 में प्रजा संकल्प यात्रा निकाली थी। इस दौरान जगन मोहन रेड्डी ने 125 निर्वाचन क्षेत्रों का दौरा किया। आंध्र प्रदेश का एक भी तटीय इलाका नहीं बचा था जहां जगन ना पहुंचे हों।
उन्होंने लोगों के बीच जाकर उन्हें एक मौका देने की अपील की थी। इसका फायदा उन्हें 2019 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में मिला। राज्य की 175 विधानसभा सीटों में से जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाय एस आर कांग्रेस ने 151 सीटों पर जीत दर्ज की और राज्य की 22 लोकसभा सीटों में से सभी पर जीत मिली थी। अगर जगन मोहन रेड्डी की यात्रा पर जनसुरक्षा या किसी और बहाने की आड़ देकर रोक लगाई जाती तो ऐसी बड़ी जीत वे शायद ही दर्ज कर पाते।
रहा सवाल लोगों की हिफाजत या यातायात में आने वाली बाधाओं का, तो इससे निपटने के दूसरे उपायों पर विचार करना चाहिए। भगदड़ केवल जनसभाओं में नहीं मचती, धार्मिक स्थलों, मेलों या अन्य सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी भगदड़ की दुर्घटनाएं हुई हैं। लेकिन सरकार ऐसी जगहों पर होने वाली उमड़ने वाली भीड़ को न रोक सकती है, न इन्हें गैरकानूनी करार दे सकती है। इसी तरह जनसभाओं और रैलियों पर भी रोक नहीं लगना चाहिए। भगदड़ या अन्य किस्म की अव्यवस्था पर रोक लगाने का एक ही तरीका है कि भीड़ को धैर्य से संभाला जाये, जगह के अनुपात में ही लोगों को प्रवेश की अनुमति दी जाये, प्रवेश और निकासी के वक्त सख्ती से लोगों को निर्देश दिये जायें। इस तरह दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है। विपक्ष तो इस आदेश का विरोध कर रहा है, लेकिन भाजपा सांसद जीवी एल नरसिम्हा राव ने सरकार के इस फैसले का सशर्त समर्थन किया है।
गौरतलब है कि पांच साल पहले 2018 में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने जंतर मंतर के आसपास सभी तरह के प्रदर्शन और धरने आयोजित करने पर प्रतिबंध लगा दिया था और कहा था कि ऐसी गतिविधियां पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन करती हैं। इस प्रतिबंध को मजदूर किसान शक्ति संगठन, पूर्व कर्मचारी आंदोलन और अन्य ने चुनौती देते हुए कहा था कि प्रदर्शन करना उनका मौलिक अधिकार है। इसके बाद उच्चतम न्यायालय ने भी आदेश दिया था कि जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने या धरना देने पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लग सकता है। अदालत ने कहा था कि नागरिकों के प्रदर्शन करने और शांत जीवन जीने के दोनों परस्पर विरोधी अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता है। आज ऐसा ही संतुलन आंध्र प्रदेश सरकार को भी बरतने की जरूरत है।
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