जानलेवा सफाई... जरूरी है सफाई कर्मियों का गरिमापूर्ण पुनर्वास

 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। 21वीं सदी में यह शर्मनाक स्थिति है कि तमाम वैज्ञानिक-तकनीकी उन्नति के बावजूद बीते पांच सालों में सीवर व सैप्टिक टैंकों की सफाई के दौरान चार सौ अनमोल जिंदगियां हमने गंवा दीं। इस साल भी 48 लोगों के मरने की बात कही जा रही है। निस्संदेह, इसके मूल में जहां तंत्र की विफलता निहित है, वहीं समाज की संवेदनहीनता भी है। 

विडंबना है कि स्थानीय निकाय और सफाई करवाने वाले लोग इस दौरान मरने वाले सफाई कर्मियों के आश्रितों के पुनर्वास की जवाबदेही से मुक्त रहते हैं। निस्संदेह, ऐसी मौतें बेहद कष्टकारी हैं और विसंगति के समाज के मुंह पर तमाचा है। हाल ही में केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता राज्यमंत्री रामदास आठवले ने जब यह जानकारी लोकसभा में दी तो सूचना कई सवालों को जन्म दे गई। 

ये आंकड़े हमारे विकास के थोथे दावों की हकीकत बताते हैं। आखिर क्यों कुछ लोग अपने परिवार के भरण-पोषण के लिये अपना जीवन दांव पर लगाते हैं। आखिर खतरे की आशंका के बावजूद क्यों वे अपना जीवन जोखिम में डालने को बाध्य हैं। क्यों हम ऐसी तकनीकों का प्रयोग नहीं कर पाये जो सफाईकर्मियों को चेता सकें कि सीवर या सैप्टिक टैंक में जहरीली गैस विद्यमान है। क्यों सफाई कर्मी पर्याप्त सुरक्षा व जीवन रक्षा उपकरणों के न होने के बावजूद मौत के कुओं में उतरते हैं। कई बार खतरे में फंसे व्यक्ति को बचाने के प्रयास में कई लोग जान गवां बैठते हैं। यदि समय रहते बचाव व राहत के उपाय अमल में लाये जाएं तो कई जानें बचायी जा सकती हैं। 

निस्संदेह, यह राहत की बात है कि लंबे सामाजिक आंदोलनों व कतिपय राजनेताओं की सार्थक पहल के बाद देश हाथ से मैला ढोने के कलंक से मुक्त हो पाया है। दरअसल, हाथ से मैला ढोने के रोजगार निषेध और पुनर्वास अधिनियम 2013 के अमल में आने से इसे रोका जा सका है। इसके बावजूद यह प्रश्न परेशान करता है कि क्यों आज भी लाखों लोग सैप्टिक टैंकों व सीवर की सफाई के जोखिम भरे कार्य को करने के लिए बाध्य हैं।

दूसरी ओर केंद्र सरकार दावा कर रही है कि मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने के बाद, श्रमिकों के पुनर्वास के लिए स्वरोजगार योजना के तहत वर्ष 2021-22 में 39 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया है। साथ ही यह भी कि इन हादसों में मरने वाले श्रमिकों के अधिकांश परिवारों को मुआवजा भी दिया गया है। इसके बावजूद जरूरी है कि सफाई कर्मियों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाये ताकि भविष्य में ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति न हो। 

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए सीवर लाइन व सैप्टिक टैंकों में उतरने वाले सफाई कर्मचारियों को सुरक्षा मास्क और ऑक्सीजन सिलेंडर जैसे सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराने को कहा था। ताकि जहरीली गैस होने पर उनके प्राणों की रक्षा की जा सके। साथ ही जरूरी है कि समाज से असमानता को दूर करते हुए सफाई कर्मियों के मानवाधिकारों की रक्षा भी की जाये। यह व्यवस्था कर्म प्रधान होनी चाहिए। इस चुनौतीपूर्ण काम करने वालों को पर्याप्त वेतन और सुविधाएं भी दी जानी चाहिए। ताकि वे गरिमापूर्ण ढंग से अपने कार्य को अंजाम दे सकें। 

ऐसा नहीं होना चाहिए कि समाज में सफाई जैसे महत्वपूर्ण कार्य करने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाये। सही मायनों में यह वर्ग संरक्षण का हकदार है। जिससे इनके बच्चों की बेहतर परवरिश व पढ़ाई हो सके। इसके साथ ही पूरे देश में प्रयास होने चाहिए कि मशीनीकृत सफाई को प्राथमिकता मिले। इसका उद्देश्य रोजगार कम करके मशीनों पर निर्भरता बढ़ाने के बजाय सफाई कर्मियों की जीवन सुरक्षा होना चाहिए। साथ ही सफाई के दौरान जान गंवाने वाले कर्मियों के परिवार की पहचान करने तथा भरण-पोषण के लिये दस लाख रुपये का मुआवजा देने का जो आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया था, उसका संवेदनशीलता के साथ अनुपालन सुनिश्चित होना चाहिए। ऐसा न हो कि पीड़ित सफाईकर्मी के आश्रित मुआवजा पाने की जद्दोजहद में लालफीताशाही का शिकार बनें। सवाल यह भी है कि अमृतकाल का उत्सव मनाते देश में कुछ लोगों के हिस्से में विष क्यों आया है?

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