यूएन में खरी-खरी : सुधारों से ही भारत की बड़ी भूमिका संभव

 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता करने के अवसर का सदुपयोग करते हुए भारत ने प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से आतंकवाद को प्रश्रय देने वाले पाकिस्तान व चीन को कड़ा संदेश दिया है। गाहे-बगाहे कश्मीर के मुद्दे पर भारत को घेरने की कोशिश करने वाले पाक को एक अंतर्राष्ट्रीय मंच से सख्त संदेश देना वक्त की जरूरत थी। वहीं दूसरी ओर यह तथ्य किसी से नहीं छिपा है कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर व पंजाब की सीमाओं के जरिये लगातार आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देता रहा है। 

हाल के दिनों में भारतीय सेना और सुरक्षा बलों की मुस्तैदी से घुसपैठ रोकने में मिली कामयाबी के बाद पाक लगातार ड्रोन के जरिये अपने घातक मंसूबों को अंजाम दे रहा है। इतना ही नहीं, वह लगातार नशे व नकली नोटों की खेप भारत भेज रहा है। वहीं चीन अपने मोहरे पाक के अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के निशाने पर आये कुख्यात आतंकवादियों को वीटो की ताकत से संरक्षण देता रहा है। हाल के वर्षों में पाक पोषित कुख्यात आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद व लश्कर-ए- तैयबा के कुख्यात आतंकवादियों पर प्रतिबंध लगाने के भारतीय व अमेरिकी प्रयासों में चीन बाधा डालता रहा है। ये अतिवादी भारत में बड़ी आतंकवादी घटनाओं में प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से शामिल रहे हैं। 

यही वजह है कि अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक जगत में प्रतिष्ठा पाने वाले विदेश मंत्री जयशंकर ने चीन को दो टूक शब्दों में स्पष्ट संदेश भी दिया कि कोई भी देश संयुक्त राष्ट्र जैसे प्रतिष्ठित व बहुपक्षीय मंच का उपयोग कूटनीतिक व सामरिक हितों को साधने के लिये नहीं कर सकता। फिलहाल, एक वर्ष तक जब तक सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता का अवसर भारत के पास है, हमारे लिए चीन-पाक के अपवित्र गठबंधन को तार्किक ढंग से बेनकाब करना समय की जरूरत है।

भारत संयुक्त राष्ट्र पर सात दशक बाद भी मुट्ठीभर देशों के वर्चस्व को लगातार चुनौती देता रहा है। भारत का मानना रहा है कि संयुक्त राष्ट्र और इसके आनुषंगिक संगठनों का स्वरूप लोकतांत्रिक होना चाहिए। दरअसल, आज भी इस बहुपक्षीय मंच पर चुनींदा स्थायी सदस्यता वाले देशों ने कब्जा बना रखा है। बदलते वक्त की मांग है कि दुनिया के बड़ी आबादी व विशाल अर्थव्यवस्था वाले देशों को भी स्थायी सदस्य बनने का मौका मिलना चाहिए। यही वजह है कि भारत दुनिया के तमाम देशों में अपनी दावेदारी के समर्थन में लंबे समय से लगातार मुहिम चलाता रहा है। 

निस्संदेह, भारत को मिली सुरक्षा परिषद की अस्थायी अध्यक्षता का पूरा लाभ संयुक्त राष्ट्र में सुधारों के लिए विश्व जनमत तैयार करने के लिए किया जाना चाहिए। हालांकि, यह महत्वपूर्ण है कि वैश्विक पटल पर विदेश मंत्री एस जयशंकर जोरदार ढंग से अपनी बात को रखते हैं। वे बिना किसी लाग-लपेट के खरी-खरी कहने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि गहराई से देखें तो वैश्विक परिदृश्य में नाटकीय बदलाव सामने आये हैं। लेकिन संयुक्त राष्ट्र में सुधारों पर होने वाली बहस लक्ष्यहीन हो चली है। 

यही वजह है कि सुधारों के लिये वर्किंग ग्रुप के गठन के तीन दशक बाद भी अपेक्षित लक्ष्यों को हासिल नहीं किया जा सका है। जिसकी मूल वजह यह है कि स्थायी सदस्यता वाले देशों ने नई व्यवस्था में ताकतवर बनकर उभरे देशों को आगे आने का मौका देने के प्रति ईमानदारी नहीं दिखाई है। निस्संदेह, बदलाव के लक्ष्यों के प्रति दृढ़ इच्छा शक्ति का अभाव हमें आगे नहीं बढ़ने दे रहा है। इसके बावजूद भारत बदलाव के लक्ष्यों के प्रति पूरी तरह समर्पित है। विदेश मंत्री ने पाक द्वारा कश्मीर का मुद्दा यूएन में उठाये जाने पर चीन के वीटो के दुरुपयोग पर दो टूक टिप्पणी की थी। उन्होंने पाक विदेश मंत्री को भी खरी-खोटी सुनाई कि जो देश ओसामा बिन लादेन की मेजबानी करता है और पड़ोसी लोकतांत्रिक देश की संसद पर हमला करने वालों को प्रश्रय देता हो, उसे ऐसे मुद्दों पर बोलने का नैतिक अधिकार नहीं है। 

निस्संदेह, समकालीन वास्तविकताओं के मद्देनजर संयुक्त राष्ट्र के ढांचे में परिवर्तन अपरिहार्य हैं। सवाल यह भी है कि कोरोना संकट के बाद उपजे हालातों तथा रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच यह संस्था प्रभावी भूमिका क्यों नहीं निभा पा रही है।

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