वैश्विक सनातन मूल्यों को समृद्ध करता विहिप

 

एबीएन डेस्क। विश्व हिंदू परिषद ने पूज्य संतो के आदेश से विश्व का सहस्त्राब्दी का सबसे बड़ा अहिंसक जनांदोलन प्रारंभ की। श्री राम जन्मभूमि आंदोलन के अनतर्गत देश के साढ़े तीन लाख गांवों में श्रीरामशिला पूजन हुई। 9 नवंबर 1989 को श्री कामेश्वर चौपाल जी के हाथों राम मन्दिर का शिलान्यास किए। 30 अक्टूबर,1990 को तत्कालीन मुख्यमंत्री की गर्वोक्ति को चूर कर हजारों कारसेवकों ने रामजी की नगरी में प्रवेश किया परन्तु अवध की इस पावन धरती पर रामभक्त्तों ने जल्लाद सरकार के द्वारा चलाए गए गोली खाकर अपने पवित्र रक्त से लाल करते हुए हिंदू समाज के लिए सैकड़ों कारसेवक सर्वोच्च बलिदान दे दिए। गीता जयंती (6 दिसंबर,1992) को देशभर से एकत्रित कारसेवक के आंखों में मन्दिर निर्माण का संकल्प ने न्यायालय का अवरोध को परवाह किए बगैर 1528 से हिन्दू पौरुष को चुनौती दे रहा कलंक का प्रतीक ढांचा कारसेवकों के कोप से ढह गया। यह हिंदू समाज का शौर्यावतार था। उसी दिन से टाट के मन्दिर में विराजमान रामलला, प्रस्तावित मंदिर के 60 प्रतिशत पत्थर और गांव-गांव से पूजित शिलाएं भव्य राममंदिर निर्माण की प्रतीक्षा श्रीअयोध्या जी में कर रहीं थीं। परिषद ने जागरण के महाभियान के साथ साथ कानूनी लड़ाई भी लड़ी। 30 सितम्बर, 2010 को न्यायालय ने भी रामलला की जन्मभूमि यही है यह मान तो लिया लेकिन जन्मभूमि का विभाजन कर दिया। हिंदू समाज को नैतिक विजय तो मिली लेकिन जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सका। देश की सर्वोच्च अदालत में अपील हुई। 6 वर्ष तक मामला जस का तस। एक बार तो न्यायालय ने यह तक कह दिया यह विषय हमारी प्राथमिकता में नहीं है। पूज्य संतो ने एक बार पुन: आह्वान किया हिन्दू समाज को। देश में 5 विराट सहित सैकड़ों हिन्दू सम्मेलन हुये। 25 नवम्बर 2018 को रामलला की नगरी में एक बार फिर आन्दोलन के प्रारंभिक काल का दृश्य दिखाई पड़ा। जनज्वार उमड़ा। हिन्दू ने अपनी प्राथमिकता बता दी राम जी के जन्मस्थान पर ही भव्य मंदिर बने। अंतत: वह शुभ घड़ी आ ही गयी मुख्य न्यायाधीश गोगोई जी की अध्यक्षता में खण्ड पीठ ने सर्वसम्मत निर्णय सुनाया जहां रामलला टाट के मन्दिर में विराजमान हैं, वही रामलला की जन्मभूमि है। मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो गया। 76 लड़ाइयों में हमारे लाखों पुरखों के बलिदान का सुफल हिंदू हृदय सम्राट माननीय अशोक सिंघल जी के प्रेरक नेतृत्व, महंथ अवैद्यनाथ जी,परमहंस रामचन्द्र दास जी जैसे हजारों पूज्य संतो के मार्गदर्शन का सुफल हिन्दू समाज के त्याग, साधना व बलिदान का सुफल 5 अगस्त, 2020 को भव्य मंदिर का भूमिपूजन से हुई। विगत 1000 वर्ष में हिंदू समाज के सबसे बड़ी विजय का महापर्व और हिंदू के स्वर्ण युग का पुनरारंभ हुआ। हमारी पीढ़ी भाग्यवान है, हम इस सुदिन के साक्षी रहे। विहिप के अह्वान पर 1996 में काश्मीर के आतंकवादियों की विरोध के चुनौतियों को स्वीकार कर लाखों हिंदुओं की अमरनाथ यात्रा, 2007 में श्रीरामसेतु को बचाने हेतु सड़क पर उतरना, बुढ़ा अमरनाथ यात्रा करना इत्यादि कई बड़े जनआंदोलन हुआ है। महर्षि देवल, परशुरामाचर्य, स्वामी रामानंद तथा स्वामी दयानन्द की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए विश्व हिंदू परिषद अपने स्थापना काल से ही धर्मांतरित बंधुओं के घर वापसी के सत्कार्य में लगा है। मठ मंदिर,अर्चक-पुरोहित तीर्थ और संस्कृत की पुनर्प्रतिष्ठा का कार्य भी परिषद् सफलता पूर्वक कर रहा है। गिरिवासी वनवासी अंचलों में अपने बंधुओं के बीच 1 लाख से अधिक एकल विद्यालयों के माध्यम से सेवा कार्य में निरंतर लगा हुआ ह। प्रतिवर्ष हजारो गोवंश की रक्षा, जेहादियों के चंगुल से हिंदू बहनों को मुक्त कराने सहित अनेक धर्मिक व सांस्कृतिक जनजागरण का कार्य निरन्तर चलाया जा रहा है। कर्नाटक स्थित हिंदू सम्मेलन में पूज्य संतगणों और पूज्य श्री गुरुजी की उपस्थिति में पूज्य संतों द्वारा हिंदू समाज में पराधीनता के लंबे कालखंड के दुष्परिणाम से व्याप्त अश्पृश्यता के विरुद्ध प्रस्ताव पारीत किए गए जो हिन्दू समाज के लिये ऐतिहासिक क्षण था। पूज्य संतो ने घोषणा की कि छुआछूत शास्त्रसम्मत नहीं, जन्म के आधार पर कोई बड़ा अथवा छोटा नहीं, कोई पावन नहीं, कोई अपवित्र नहीं, हम सब ऋषिपुत्र हैं, भारतमाता की सन्तान हैं व सहोदर भाई हैं। यहां हम हिंदू समाज को हिंदव: सोदरा: सर्वे,न हिन्दू पतितो भवेत। मम दीक्षा हिन्दू रक्षा,मम मन्त्र समानता।। एवं धर्मो रक्षति रक्षित: ध्येयवाक्य मिला। विश्व भर में निवास कर रहे हिन्दू समाज को जाति, मत, पंथ, भाषा, भौगोलिकसीमा से ऊपर उठकर आग्रही, संगठित, सशक्त, श्रद्धालु, अपने पूर्वज परम्परामान्यता - मानबिन्दुओं पर गौरव रखने वाले तथा इनकी पुनर्प्रतिष्ठा करने के लिये सर्वस्व न्योछावर करने का संकल्प लेने वाले हिन्दू को खड़ा करना विश्व हिन्दू परिषद मुख्य उद्देश्य है। विहिप के द्वारा गोवंशरक्षा, अपने ही देश में हिन्दू शरणार्थी, बांग्लादेशी घुसपैठिये, जेहादी आतंकवाद, लव जेहाद, नक्सलवाद, विदेशी धन से ईसाईकरण, सिमटती पतिपावनी गंगा तथा पर्यटन केंद्र में बदलता देवतात्मा हिमालय , मुस्लिम तुष्टिकरण, एक ही देश में दो विधान आदि विषयों पर निरन्तर चिन्तन कर समाधान के मार्ग ढुंढे जा रहे है तथा चुनौतियों का सामना करने के लिए अनथक श्रम कर गिरिवासी, वनवासी, नगरवासी,ग्रामवासी हिन्दू समाज में से लक्षाधिक कार्यकर्त्ता खड़ा कर गांव- गांव तक संगठन के तंत्र को फैला रहा है। झारखंड प्रांत के सभी पंचायतों में विहिप स्थापना दिवस कार्यक्रम 6 सितम्बर, 2021 तक मनाया जायेगा।

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