एबीएन डेस्क। आखिरकार देर रात को अफगानिस्तान की जमीन को अमेरिकी सेना ने छोड़ दिया और जाते-जाते अफगानिस्तान को आठ लाख एक हज़ार इक्कीस ऐसे हथियार मुहैया करा दिए जिस पर हक्कानी नेटवर्क, अल-कायदा और आईएस समेत तमाम आतंकी संगठनों की नजरें लग गई हैं। विशेषज्ञों का कहना है इन हथियारों को पाने की होड़ में अफगानिस्तान की धरती खून से लाल होने वाली है। शायद यही वजह है कि कभी अल-कायदा के मुखिया ओसामा बिन लादेन के शार्प शूटर रहे डॉक्टर अमीन उल हक समेत कई आतंकियों की तालिबान में बीती शाम से एंट्री शुरू हो चुकी है। शुरुआत से ही इस बात को लेकर आशंका जताई जा रही थी कि अमेरिका जब अफगानिस्तान की जमीन छोड़ेगा तो उसके हथियार और गोला बारूद का इस्तेमाल कौन करेगा। जाहिर सी बात है जब सत्ता तालिबान को मिली है तो इन हथियारों का इस्तेमाल भी तालिबान ही करेगा। लेकिन विशेषज्ञों की राय में ऐसा मुश्किल लगता है। रक्षा मामलों के जानकार और खुफिया विभाग में कभी अपनी सेवाएं दे चुके एसएन शर्मा कहते है कि दरअसल तालिबान खुद इस वक्त बिखरा हुआ है। उसे सत्ता तो अमेरिका की शह पर अफगानिस्तान में मिल गई, लेकिन उसकी सत्ता में सेंध लगाने के लिए पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठन घात लगाए बैठे हुए हैं। दरअसल ये संगठन अफगानिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए ही उत्सुक नहीं है बल्कि उनकी नजरें लाखों की संख्या में मौजूद हथियारों पर कब्जा जमाने की लगी हुई है, जो अमेरिका जाते-जाते अफगानिस्तान को सौंप गया है। रक्षा विशेषज्ञ शर्मा कहते हैं कि तालिबान भी इसमें शुरुआत से ही गच्चा खाता हुआ नजर आ रहा है। उनके मुताबिक तालिबान ने जिस तरीके से काबुल समेत कई शहरों की सुरक्षा का जिम्मा हक्कानी को दिया उससे हक्कानी नेटवर्क के पास अमेरिकी हथियार और गोला-बारूद तक पहुंच के सारे अधिकार मिल गए। वे कहते हैं जब हक्कानी नेटवर्क के पास हथियारों को इस्तेमाल करने के अधिकार हैं तो एक नजरिए से यह माना जाए कि इन हथियारों की अधिकांश संख्या पर हक्कानी नेटवर्क का कब्जा हो गया है। उनका कहना है कि यहीं से सबसे घातक खेल शुरू होने वाला है। क्योंकि जो हथियार हक्कानी नेटवर्क के पास होंगे उनकी पहुंच हक्कानी नेटवर्क के सबसे चहेते आतंकी संगठन आईएस खोरासन को भी होगी। आईएस खोरासन के पास पहुंचने वाले हथियारों का इस्तेमाल तालिबान के खिलाफ यानी अफगानिस्तान में होगा या नहीं इसकी जिम्मेदारी कोई नहीं ले सकता। शर्मा के मुताबिक आतंकियों का खेल यहीं से शुरू होगा। क्योंकि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में पहले से मौजूद अल-कायदा कभी यह नहीं चाहेगा कि फ्री में मिलने वाले लाखों की संख्या में हथियारों और गोला बारूद का इस्तेमाल सिर्फ तालिबान, हक्कानी या आईएस करें। इसके लिए खतरनाक साज़िशें अभी से अफगानिस्तान की जमीन पर शुरू हो गई है। अलकायदा के शार्प शूटर और कभी ओसामा बिन लादेन के दाहिने हाथ रहे अमीन उल हक ने शाम को काबुल में एंट्री। जिस तरीके से अमीन उल हक का काबुल में एंट्री के वक्त स्वागत किया गया उससे एक बात स्पष्ट हो गई है कि अलकायदा और तालिबान के रिश्ते कैसे हैं। क्योंकि ओसामा बिन लादेन के दाहिने हाथ रहे हक के स्वागत ने तालिबान के लड़ाको के साथ-साथ हक्कानी नेटवर्क की सुरक्षा का पूरा घेरा उसके साथ था। तालिबानी लड़ाके हक के साथ न सिर्फ सेल्फी ले रहे थे बल्कि फोटो भी खिंचवा रहे थे। रक्षा मामलों के विशेषज्ञ शर्मा कहते हैं कि अमीन उल हक का अफगानिस्तान की जमीन पर आने का मतलब साफ तौर से अलकायदा का फिर से सिर उठाना ही है। वे कहते हैं कि अमेरिका के अफगानिस्तान छोड़ते ही यहां की लगती हुई सरहदों वाले मुल्कों से आतंकवाद की फसल बोई जानी शुरू हो जाएगी। हक्कानी नेटवर्क, आईएस खोरासन, अलकायदा और पाकिस्तान तालिबान के आतंकवादी घात लगाकर तालिबान को मिले अमेरिकी हथियारों को हड़पने के जुगाड़ में लगे हुए हैं। विदेश मामलों के जानकारों का कहना है जिस तरीके से अमेरिका ने अफगानिस्तान को सब कुछ संयमित तरीके से चलाने की नसीहत दी है वह एक बहुत बड़ा संदेश है। खुफिया विभाग में काफी लंबे वक्त तक मध्य एशिया के देशों में रहकर अपनी सेवाएं देने वाले एक वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी बताते हैं कि अमेरिका ने अफगानिस्तान को जो नसीहत दी है दरअसल वह दूर से ही सही लेकिन बताती है कि तालिबान को सत्ता चलाने के लिए पूरी ताकत अमेरिका देता रहेगा। कहने को तो अमेरिका ने काबुल से अपना दूतावास शिफ्ट कर लिया है लेकिन कतर से रहकर अफगानिस्तान में होने वाली हर हलचल पर नजर रखेगा। दरअसल अफगानिस्तान में सत्ता बदलने से लेकर तालिबान को सत्ता हासिल होने तक की पूरी रणनीति दोहा की जमीन पर तैयार की गई है। इसलिए यह जमीन अफगानिस्तान की निगरानी के लिए सबसे मुफीद भी है। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका के ऊपर अफगानिस्तान की जमीन छोड़ने का दबाव तो जरूर था लेकिन दूर से बैठ कर उसकी मॉनिटरिंग करना और हस्तक्षेप करना उसकी न सिर्फ मजबूरी होगी बल्कि जरूरत भी होगी। विशेषज्ञों का कहना है की अमेरिका ने अपने करोड़ों डॉलर के अपने रक्षा उपकरणों को ऐसे ही अफगानिस्तान में नहीं छोड़ दिया। इसके पीछे बहुत से राज हैं। अमेरिका ने अफगानिस्तान में लंबे समय तक सैन्य कार्रवाई को देखने वाले दूसरे नंबर के सबसे बड़े अधिकारी को दोहा मैं तैनात भी कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है काबुल और कतर के अमेरिकी दूतावास का कनेक्शन बना रहे इसीलिए पेंटागन के रणनीतिकारों की पूरी टीम इसकी निगरानी भी कर रही है।
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