एबीएन एडिटोरियल डेस्क (ए. सानी)। वेदांता ग्रुप ने घोषणा की है कि वह भारत में सेमीकंडक्टर, डिस्पले उत्पादन इकाई और सेमीकंडक्टर असेंबलिंग-कम-टेस्टिंग सुविधा गुजरात के अहमदाबाद जिले में स्थापित करेगा। इस घोषणा ने दो वजहों से ध्यान खींचा है। निवेश की मात्रा (1.54 लाख करोड़ रुपये) और नई इकाई लगाने के लिए गुजरात का चुनाव, जबकि पहले महाराष्ट्र में लगाने के संकेत थे। तथापि, अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वेदांता ने ताईवान के हॉन हाइ टेक्नोलॉजी ग्रुप (फॉक्सकॉन) को बतौर साझीदार जोड़ा है। फिलहाल ताईवान दुनियाभर में सेमीकंडक्टर उत्पादन का धुरा है और कोविड महामारी से चिप्स आपूर्ति व्यवधान ने वैश्विक स्तर पर अनेकानेक उद्योगों का उत्पादन ठप कर दिया था। इस आपूर्ति शृंखला भंग और विभिन्न क्षेत्रों पर इसके असर ने दुनिया को सेमीकंडक्टर आपूर्ति में केवल एक-दो स्रोतों पर अत्यधिक निर्भरता की हकीकत से जगा डाला, चाहे यह कार हो या वॉशिंग मशीन में प्रयुक्त सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट। इसलिए मुख्य उपभोक्ता वस्तु निर्माताओं ने ताईवानी इकाइयों पर अत्यधिक निर्भरता कम करने का मन बनाया। मौजूदा चिप डिजाइनिंग के डिसएग्रिगेटेड मॉडल और फैब्रिकेशन पर पुनर्विचार किया जा रहा है। जुलाई माह में, अमेरिका सरकार ने चिप्स (क्रिएटिंग हेल्पफुल इन्सेंटिव टू प्रोड्यूस सेमीकंडक्टर्स) एक्ट से अमेरिकी कंपनियों को 52 बिलियन डॉलर की सब्सिडी देकर सेमीकंडक्टर निर्माण, अनुसंधान एवं विकास प्रोत्साहन पैकेज घोषित किया है। यूरोपियन यूनियन भी चिप उत्पादन को बढ़ावा देने की योजना बना रही है। उधर दक्षिण कोरिया ने 540 बिलियन डॉलर सब्सिडी योजना से दुनिया में सेमीकंडक्टर निर्माण का मुख्य केंद्र बनाने की शुरुआत की है। भारत के सेमीकंडक्टर मिशन में सरकार चिप एवं डिस्पले निर्माण इकाइयों को 10 बिलियन डॉलर (76000 करोड़ रुपये) सब्सिडी देगी। निजी कंपनियों को उत्पादन इकाई स्थापित करने में आए खर्च का 50 फीसदी तक अनुदान मिल सकता है। भारत में सेमीकंडक्टर निर्माण की यात्रा वर्ष 1974 में पंजाब से शुरू हुई थी, जब इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग ने महसूस किया कि देश के अंदर सेमीकंडक्टर डिजाइन और निर्माण होना चाहिए, पहले-पहल विदेशी मदद से सही। केंद्रीय मंत्रिमंडल के अनुमोदन के बाद सेमीकंडक्टर कॉम्पलैक्स लिमिटेड (एससीएल) बनाना स्वीकृत हुआ। 1976 में विशेषज्ञ पैनल ने दो संभावित जगहें सुझाईं झ्र मोहाली और मद्रास। इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग की तरजीह हवाई अड्डे की सुविधा वाले मद्रास पर थी। किंतु पंजाब के मुख्यमंत्री जैल सिंह को भनक लगी और उन्होंने प्रधानमंत्री पर जोर डालकर निर्णय मोहाली के पक्ष में करवा लिया। हालांकि इंदिरा गांधी ने इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग के अधिकारी अशोक पार्थसारथी को मुख्यमंत्री जैल सिंह को यह समझाने का काम सौंपा कि इस इकाई से पंजाब के स्थानीय लोगों को शायद ही रोजगार मिले क्योंकि इसमें बहुत अधिक प्रवीणता की जरूरत होती है। लेकिन जैल सिंह अड़े रहे और मोहाली को देश की पहली सेमीकंडक्टर निर्माण इकाई मिली। इस परियोजना पर 15 करोड़ रुपये लगे थे और 1983 में उत्पादन शुरू हुआ, अमेरिका की माइक्रोसिस्टम्स इन्कॉपोर्रेशन से प्राप्त तकनीक से चिप्स बनने लगीं। लगभग उसी समय, एससीएल की तरह, किंतु स्वतंत्र सेमीकंडक्टर डिजाइन गतिविधियां भारत में शुरू हुईं। इसकी अगुवाई आईआईटी कानपुर से पढ़े प्रभाकर गोयल ने की थी, जिन्होंने अमेरिका में बतौर चिप डिजाइनर अच्छा-खासा नाम कमाया था। उनके स्टार्टअप गेटवे डिजाइन आॅटोमेशन (जीडीए) की विशेषज्ञता चिप्स उत्पादन में प्रयुक्त टेस्टिंग टूल वेरीलॉग बनाने में थी। इसने करोड़ों डॉलर्स की आमदनी करवाई और गोयल के ग्राहकों में जापान और ताईवान के उच्चतम चिप निर्माण उद्योग थे। चूंकि वेरीलॉग बनाने में कुछ कामों जैसे कि लाइब्रेरीज में बहुत श्रम खपता था, इसलिए उन्होंने इकाई भारत में स्थानांतरित करने की सोची और इंजीनियरों की एक छोटी टीम बनाकर 1985 में नोएडा में उत्पादन शुरू किया। चार साल बाद सिलिकॉन वैली, अमेरिका की कंपनी काडेन्स डिजाइन सिस्टम्स ने जीडीए का अधिग्रहण कर लिया, इसमें नोएडा वाली इकाई भी थी। इस तरह भारत में काडेन्स के रूप में अग्रणी कंपनी का आगमन हुआ। इसके बाद दो और सेमीकंडक्टर डिजाइन कंपनियों, टेक्सास इंस्ट्रूमेंट्स और एसटी माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक्स ने 1980 के दशक के आखिर में भारत में अपने दफ्तर खोले। आगे लगभग एक दशक में इंटेल समेत उच्चतम कोटि की 25 चिप्स डिजाइन कंपनियों में 17 ने भारत में केंद्र खोले और देश चिप्स डिजाइनिंग क्षेत्र में एक बड़ी शक्ति बन गया। बढ़ती मांग पूरी करने हेतु अमेरिकी और यूरोपियन सेमीकंडक्टर कंपनियों ने भारतीयों की डिजाइन प्रतिभा और ताईवान में व्यापक स्तर की उत्पादन क्षमता का फायदा लेकर चिप्स निर्माण किया। लेकिन दूसरी ओर, भारत चिप्स उत्पादन में पिछड़ता गया क्योंकि एससीएल में उत्पादन तकनीक को अपग्रेड करने की प्रक्रिया के दौरान भयंकर आग लग गई। नए सिरे से सबकुछ बनाने में लंबा वक्त लगा और कंपनी पूरी तरह उबर नहीं पाई। हालांकि भारत पर लगे तकनीक-हस्तांतरण प्रतिबंध वाले काल के दौरान सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण परियोजनाओं जैसे कि अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र में प्रयुक्त सेमीकंडक्टरों की आपूर्ति करती रही। अब भारत ने एससीएल को व्यावसायिक इकाई की तरह से चलाने का फैसला लिया है। किंतु इसके लिए धन, तकनीक और नेतृत्व प्रदान करने की जरूरत है। शुरुआत काफी पहले करने के बावजूद भारत सेमीकंडक्टर लहर का पूरी तरह फायदा उठाने से चूक गया। गैरवाजिब निवेश, कमजोर स्वदेशी मांग, वैश्विक धंधे की बदलती गतिशीलता इत्यादि से हम पिछड़ते गए। इस क्षेत्र में तकनीक बहुत तेजी से बदलती है और इससे कदम मिलाना एक सामरिक जरूरत है। वेदांता की प्रस्तावित इकाई 28 नैनो नॉड्स तकनीक पर आधारित होगी। इससे सीपीयू, ग्राफिक प्रोसेसर्स, नेटवर्क चिप्स, स्मार्टफोन्स, कार और इंटरनेट में प्रयुक्त होने वाली चिप्स बनाई जा सकेंगी। हालांकि ताईवान और दक्षिण कोरियाई कंपनियां पहले ही कहीं ज्यादा सूक्ष्म नॉड्स यानि 3 नैनोमीटर पर काम कर रही हैं। एससीएल ने काम 5 माइक्रॉन्स (5000 नैनोमीटर) से शुरू किया था और स्वदेशी संवर्धन तकनीक से 1.2 माइक्रॉन (1200 नैनोमीटर) करने की प्रक्रिया चली हुई थी, जब आग लगी। उस समय विश्व की अग्रणी चिप्स निर्माण इकाई केवल एक पीढ़ी आगे यानी 0.8 माइक्रॉन (800 नैनोमीटर) पर काम कर रही थी। अगले एक दशक से कम समय में एससीएल ने विदेशी तकनीक अपनाई और तकनीक-अंतर कम होता गया क्योंकि आरंभ से ही इसका अपना अनुसंधान एवं विकास विभाग बहुत सुदृढ़ था। इस विधा में किसी इकाई का खुद की तकनीकी क्षमता के बिना बाजार की दौड़ के मुताबिक चाल बनाए रखना संभव नहीं है। इसके लिए बहुत बड़े स्तर पर अनुसंधान एवं विकास पर निवेश की आवश्यकता होती है। फिलहाल वेदांता का प्रस्तावित संयुक्त उपक्रम अनुसंधान एवं विकास को लेकर खामोश है। अभी यह ज्ञान नहीं है कि क्या इसमें किसी तरह का तकनीक-हस्तांतरण है या नहीं। उम्मीद करें कि भारत दूसरी बार मौका नहीं चूकेगा। (लेखक विज्ञान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं।)
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