टीम एबीएन, चौपारण (हजारीबाग)। प्रतिदिन स्नान करना यानि नहाना सेहत की दृष्टि से अनिवार्य होता है। लेकिन प्राचीन धर्मग्रंथों में स्नान के लिए सुनिश्चित समय निर्धारित है। पढ़ें विस्तार से... (1) मुनि स्नान : 4 से 5 बजे के बीच सुबह का स्नान सर्वोत्तम है। (2) देव स्नान : 5 से 6 बजे के बीच किया गया स्नान उत्तम है। (3) मानव स्नान : 6 से 8 के बीच सुबह किया गया स्नान सामान्य है। (4) राक्षस स्नान : 8 बजे के बाद स्नान करना नहीं चाहिए, वह राक्षस स्नान है, जो एकदम वर्जित है। उक्त बातें आज मुकुंद साव ने एक धार्मिक गोष्ठी में अपने संबोधन में कहा। उन्होंने कहा कि हर स्नान के अलग-अलग लाभ हैं। मुनि स्नान घर में सुख, शांति, समृद्धि, विद्या, बल, आरोग्य, चेतना प्रदान करता है। देव स्नान घर में यश, कीर्ति, धन, वैभव, सुख, शांति, संतोष प्रदान करता है। मानव स्नान कार्य में सफलता, भाग्य, अच्छे कर्मों की सूझ, परिवार में एकता प्रदान करता है परंतु राक्षसी स्नान घर में दरिद्रता, हानि, क्लेश, धन हानि और परेशानी लाता है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि किसी भी परिस्थिति में 8 बजे सुबह के पूर्व स्नान कर लें। श्री साव ने बताया कि स्नान करते समय कुछ और बातों को ध्यान में रखना चाहिए। सुसुम पानी से नहाना स्वास्थ्य वर्धक होता है। नहाने के पूर्व लघुशंका यानि पेशाब अवश्य करना चाहिए और नहाने के बाद 2 ग्लास स्वच्छ जल जरूर पियें। तीन कार्य करने के बाद स्नान करना अति अनिवार्य है। शव का अंतिम संस्कार में जाने के बाद, बाल कटवाने के बाद और शरीर में तेल मालिश करने के बाद। धार्मिक और आध्यात्मिक लाभ के साथ-साथ यह सेहत के लिए भी लाभदायक है। साथ ही शौच जाने के बाद बिना स्नान किए धार्मिक अनुष्ठानों में भाग नहीं लेना चाहिए। नहाते समय एक बात को और ध्यान में रखना चाहिए कि पहले पैर धोयें। फिर हाथ धोयें। फिर कंधा पर पानी डालें और अंतिम में माथा झुकाकर माथा में पानी डालें ताकि पहला पानी शरीर पर नहीं जाकर नीचे गिर जाये और तब अंतिम में पूरा शरीर पर पानी डालें। खड़ा होकर माथे पर बाल्टी से पानी डालकर नहाना एकदम नुकसान दायक है। उससे पानी भी ज्यादा बर्बाद होता है तथा लकवा का झटका आने की ज्यादा आशंका रहती है। नहाने के बाद खुला बदन में सूर्य की रोशनी पड़ना भी सेहत के लिए लाभदायक है।
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