एबीएन हेल्थ डेस्क। भारत बायोटेक के इंट्रानेसल (नाक के जरिये दिये जाने वाले) कोरोना वैक्सीन को भारत के औषधि महानियंत्रक ने आपात इस्तेमाल की मंजूरी दी है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ मनसुख मंडाविया ने इसका ऐलान किया है। नाक के जरिए दी जाने वाली ये पहली कोरोना वैक्सीन है। तकरीबन एक पखवाड़े पहले कोरोना की इइश्-154 इंट्रानैसल वैक्सीन का तीसरा क्लीनिकल ट्रायल पूरा कर लिया है। उस वक्त भारत बायोटेक ने बताया था कि नाक के जरिये दिए जाने वाले कोविड-19 टीके इइश्154 तीसरे फेस के नियंत्रित क्लीनिकल ट्रायल में सुरक्षित, बेहतर तरीके से सहन करने योग्य और प्रतिरक्षाजनक साबित हुआ है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया ने लिखा है कि भारत बायोटेक की इंट्रानैसल (नाक के जरिए दी जाने वाली) कोरोना वैक्सीन के लिए ऊउॠक से इमरजेंसी उपयोग के लिए मंजूरी मिल गई है। कोरोना के लिए भारत का पहला नाक से दिए जाने वाला टीका होगा। यह कदम महामारी के खिलाफ हमारी सामूहिक लड़ाई को और मजबूत करेगा। उन्होंने आगे कहा है कि भारत पीएम मोदी के नेतृत्व में उडश्कऊ-19 के खिलाफ लड़ाई में अपने विज्ञान, अनुसंधान एवं विकास और मानव संसाधनों का उपयोग किया है। भारत बायोटेक ने बताया था कि बीबीवी154 को सेंट लुइस स्थित वाशिंगटन विश्वविद्यालय की पार्टरनशिप में तैयार किया गया है। प्री क्लीनिकल सुरक्षा आकलन, बड़े पैमाने पर निर्माण, फॉमूर्ला और इंसानों पर क्लीनिकल परीक्षण सहित वितरण प्रणाणी पर काम भारत बायोटेक ने किया। केंद्र सरकार ने जैव प्रौद्योगिकी विभाग के कोविड सुरक्षा कार्यक्रम के तहत उत्पाद के विकास और क्लीनिकल परीक्षण के लिए आर्थिक सहायता दी। बयान के मुताबिक बीबीवी154 के पहली डोज (शुरूआती दो खुराक) के तौर पर प्रभाव और कोविड-19 के अन्य टीके की दो शुरूआती खुराक लेने वालों को तीसरी खुराक पर बीबीवी154 को देने पर होने वाले असर का आकलन किया गया। क्या है नैजल वैक्सीन : नैजल वैक्सीन नाक से दी जाने वाली वैक्सीन है। व्यक्ति की नाक में वैक्सीन की कुछ बूंदे डालकर उसका टीकाकरण किया जाता है। इसे इंजेक्शन से देने की जरूरत नहीं है और न ही पोलियो की खुराक की तरह यह वैक्सीन पिलाई जाती है। यह एक प्रकार से नेजल स्प्रे जैसी होती है। इस वैक्सीन का लक्ष्य नाक के जरिए डोज को सांस के रास्ते तक पहुंचाना है। डॉक्टरों के मुताबिक, कोई भी वायरस सबसे पहले हमारे शरीर में नाक के जरिए जाता है। कोरोना के भी हमारे शरीर में पहुंचने का सबसे अहम रास्ता नाक ही है। ऐसे में ये वैक्सीन कोरोना को फेफड़ों या शरीर के अन्य हिस्सों में जाने से रोक सकती है। अध्ययनों में टीका सुरक्षित पाया गया था : जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) ने इस साल अगस्त में बताया था कि 18 साल से 60 साल के आयु वर्ग के समूह में पहले चरण का क्लीनिकल ट्रायल पूरा हो चुका है। डीबीटी ने कहा था कि पहले चरण के परीक्षण में शामिल हुए लोगों पर वैक्सीन की काफी अच्छी प्रतिक्रिया देखी गई थी। किसी में भी टीके के बाद कोई गंभीर प्रतिकूल प्रभाव सामने नहीं आया था। पशुओं पर हुए अध्ययन में टीका एंटीबॉडी का उच्च स्तर बनाने में सफल रहा था।
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