एबीएन एडिटोरियल डेस्क (पवन)। 75वें स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ संकल्प, आजादी के सौवें साल में भारत की तस्वीर और विरासत पर गर्व जैसी कुछ बातें इस बार कहीं। महंगाई, बेरोजगारी, काला धन जैसी समस्याएं देश में नहीं हैं, ऐसा वे मानते होंगे, इसलिए इस बारे में उन्होंने कुछ नहीं कहा। परिवारवाद उन्हें दंश की तरह चुभता है, सो इस बारे में उन्होंने जरूर कुछ बातें कहीं। आजादी के अमृतकाल में प्रधानमंत्री मोदी ने देश से कुछ अमृत वचन कहे, जिसमें एक महत्वपूर्ण बात नारी शक्ति के सम्मान की थी। यह बात अपने आप में बड़ी अजीब और दुखदायी है कि महिला का आदर जैसी बातें जो स्कूली पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाकर बच्चों को शुरू से पढ़ाई जानी चाहिए, उनका ज्ञान नागरिकों को लाल किले से देने की जरूरत पड़ रही है। वैसे मोदी सरकार जो नयी शिक्षा नीति लेकर आई है, उसमें अगर अभी से प्राथमिक कक्षा में स्त्री सम्मान, महिलाओं से बराबरी का व्यवहार जैसी बातों की सीख दी जाए, तो शायद आजादी के सौवें बरस में ऐसी कोई नसीहत लालकिले से देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। बहरहाल, प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में कहा कि किसी न किसी वजह से हमारे अंदर यह सोच आ गई है कि हम अपनी वाणी से, अपने व्यवहार से, अपने कुछ शब्दों से महिलाओं का अनादर करते हैं। उन्होंने लोगों से रोजमर्रा की जिंदगी में महिलाओं को अपमानित करने वाली हर चीज से छुटकारा पाने का संकल्प लेने का आग्रह किया। इसके साथ ही उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महान महिला नेताओं के योगदान की भी सराहना की और लोगों से ‘मानसिकता में बदलाव’ की अपील की। हमें नहीं पता कि मोदीजी की अपील में इतनी ताकत है कि नहीं कि रातों रात मानसिकता में बदलाव आ जाए। प्रधानमंत्री इससे पहले बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे नारे भी दे चुके हैं। उत्तरप्रदेश चुनाव के वक्त उन्होंने मातृशक्ति महाकुंभ का आयोजन भी प्रयागराज में किया था। इन सबके बावजूद महिलाओं के साथ छेड़खानी, अपराध या हिंसा में कोई कमी आयी हो, ऐसे आंकड़े नहीं आए हैं। कांग्रेस समेत कई दलों ने तो प्रधानमंत्री मोदी के भाषण में नारीशक्ति की बात सुनकर उनकी पिछली कई बातों का लेखा-जोखा सोशल मीडिया पर फिर से याद दिला दिया। अभी पिछली बातों का राजनैतिक हिसाब-किताब चल ही रहा था कि इस बीच खबर आई कि गोधरा कांड के बाद बिलकिस बानो से सामूहिक बलात्कार और उनके परिवार के 7 सदस्यों की हत्या करने वाले 11 अभियुक्तों को गुजरात सरकार की माफी नीति के तहत 15 अगस्त के दिन रिहा कर दिया गया है। इन 11 लोगों की रिहाई के बाद उन्हें तिलक लगाकर, मिठाई खिलाने की तस्वीरें सोशल मीडिया पर चल रही हैं, जिन्हें देखकर रुह कांप जाती है। क्या एक समाज के तौर पर हमारा इतना नैतिक पतन हो चुका है कि अब बलात्कारियों और हत्यारों का जेल के बाहर स्वागत होने लगेगा। 2008 में मुंबई में सीबीआई की एक विशेष अदालत ने इन 11 लोगों को उम्र कैद सुनाई थी। जिस पर बॉम्बे हाईकोर्ट की मुहर भी लगी थी। ये सभी अभियुक्त 15 साल की सजा काट चुके हैं, इस आधार पर इनमें से एक ने सजा में छूट की अपील की थी। गौरतलब है कि उम्रकैद की सजा पाए कैदी को कम से कम चौदह साल जेल में बिताने ही होते हैं। इसके बाद कैदी की फाइल की समीक्षा की जाती है। उम्र, अपराध की प्रकृति, जेल में व्यवहार वगैरह के आधार पर सजा घटाई जा सकती है। अगर सरकार को ऐसा लगता है कि कैदी ने अपने अपराध के मुताबिक सजा पा ली है, तो उसे रिहा भी किया जा सकता है। बिलकिस बानो के परिवार, शरीर और आत्मसम्मान को चोट पहुंचाने वाले इन 11 लोगों की माफी की मांग पर बाकायदा कमेटी बनाकर, विचार-विमर्श कर रिहाई का फैसला लिया गया। कानूनन इसमें कमियां नहीं निकाली जा सकतीं। लेकिन क्या कानून के फैसले नैतिकता से परे लिए जाने लगे हैं, इस पर तो समाज में मंथन हो ही सकता है। बिलकिस बानो ने अपने साथ हुए गंभीर अपराध और अत्याचार के बावजूद दोषियों को सलाखों के पीछे पहुंचाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। छलनी शरीर और मन के साथ उन्होंने इंसाफ की लौ अपने मन में जलाए रखी। लंबे संघर्ष के बाद पहले बिलकिस बानो के दोषियों को सजा हुई और फिर अप्रैल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को बिलकीस बानो को 50 लाख रुपये का मुआवजा, सरकारी नौकरी और आवास देने का आदेश दिया था, उस समय बिलकीस ने कहा था, सुप्रीम कोर्ट ने मेरे दर्द, मेरी पीड़ा और 2002 की हिंसा में गंवाए गए मेरे संवैधानिक अधिकारों को वापस पाने के संघर्ष को समझा। किसी भी नागरिक को सरकार के हाथों पीड़ा नहीं झेलनी चाहिए, जिसका कर्तव्य हमारी रक्षा करना है। अब अपने दोषियों के माथे पर तिलक लगा देखकर बिलकिस फिर खुद को हारा हुआ महसूस कर रही होंगी। लेकिन ये अकेले उनकी हार नहीं है। ये एक सभ्य समाज के तौर पर हम सब के पतन की पराकाष्ठा है।
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