विहिप का मुख्य उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित और जागृत करना

 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ वीरेंद्र साहू)। भारतीय संस्कृति अनादि काल से विश्व बंधुत्व की भावना को लेकर ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ की उद्धार विचारधारा को जन-जन में प्रतिष्ठित करने का कार्य करते रही है, इसी कारण प्राचीन काल से ही भारत के प्रति विश्व समुदाय का आदर और श्रद्धा का भाव रहा है। हिंदू समाज समरस एवं समृद्ध था अपितु मुस्लिम आक्रांताओं के आगमन के बाद हिन्दू समाज की एकता व अखंडता को तार-तार कर उसे जातिवादी, क्षेत्रवादी, भाषावादी व मत-पंथ-संप्रदाय वादी विभेदों में बांट कर पहले मुगलों (मुस्लिमों) ने और फिर अंग्रेजों (ईसाइयों) ने भारत पर शासन किया। विपत्ति चाहे अनगिनत आईं, किंतु यहां के हिंदू समाज में न तो ज्ञान की, न वीरता व पौरुष की, न धैर्य की और न धर्म की कभी न्यूनता हुई। हिंदू समाज ने विधर्मियों के विरुद्ध क्षमता से भी अधिक प्रतिकार व वीरता का परिचय दिया, फिर भी आक्रांताओं के दमन से अपने आपको नहीं बचा पाए एवं सैकड़ों वर्ष तक पराधीनता का दंश झेलते रहे। 1925 में परम पूज्य डॉ केशवराव बलिराम हेडगेवार ने समाज को एक सूत्र में बांधने के लक्ष्य को लेकर शाखा प्रारंभ की। इन शाखाओं में कर्मठ कार्यकतार्ओं का निर्माण होता रहा। भारत 1947 में स्वाधीन भी हुआ। हमें भौतिक स्वाधीनता तो मिली परंतु सांस्कृतिक स्वाधीनता नहीं मिल पाई। परिणामत: देश के अंदर हिंदू एवं हिंदुत्व पर कई प्रकार की विपत्तियां आते रही है। आक्रमण के कारण मानबिंदुओं पर लगे कलंक हिंदू समाज को उद्वेलित करता रहा, परंतु इसके लिए एक नेतृत्वकर्ता संगठन की आवश्यकता थी। 29 अगस्त, 1964 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर पवई, मुम्बई स्थित पूज्य स्वामी चिनमयानन्द जी के आश्रम सांदीपनि साधनालय में बुलाई एक बैठक गई। बैठक में पूज्य स्वामी चिनमयानन्द, राष्ट्रसंत तुकडो जी महाराज, सिख सम्प्रदाय से माननीय मास्टर तारा सिंह, जैन सम्प्रदाय से पूज्य सुशील मुनि, गीता प्रेस गोरखपुर से हनुमान प्रसाद पोद्दार, के एम मुंशी तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक के द्वितीय सरसंघचालक परम पूज्य माधव सदाशिव राव गोलवलकर श्री गुरुजी सहित 40-45 अन्य विशिष्टजन एवं साधु-संत गण उपस्थित थे। महापुरुषों के सानिध्य में विश्व हिंदू परिषद की स्थापना की गई। विश्व हिंदू परिषद स्थापना का मुख्य उद्देश्य हिन्दू समाज को संगठित और जागृत करने, उसके स्वत्वों, मानबिन्दुओं तथा जीवन मूल्यों की रक्षा व संवर्धन करने तथा विदेशस्थ हिंदुओं से संपर्क स्थापित कर उन्हें सांस्कृतिक रूप से सुदृढ़ बनाने व उनकी सहायता करना था। विश्व हिंदू परिषद का प्रथम सम्मेलन 22 से 24 जनवरी 1966 को कुम्भ के अवसर पर प्रयाग में आयोजित किया गया, जिसमें 12 देशों के 25 हजार प्रतिनिधियों के साथ, 300 प्रमुख संतों की सहभागिता रही। पहली बार भारत के प्रमुख शंकराचार्य भी एक साथ आए और धर्मांतरण पर रोक तथा परावर्तन (घर-वापसी) का संकल्प लिया गया। मैसूर के महाराज मा० चामराज जी वाडियार को अध्यक्ष व दादासाहब आप्टे को पहले महामंत्री के रूप में घोषित कर विहिप की प्रबंध समिति की घोषणा भी हुई। इस सम्मेलन में जहां परावर्तन को मान्यता देने का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित हुआ वहीं विहिप के बोधवाक्य ‘धर्मो रक्षति रक्षित:’ और बोध चिह्न अक्षय वटवृक्ष तय हुआ। हिन्दू समाज में व्याप्त अस्पृश्यता समाज के सामने एक बड़ी चुनौती थी। इस चुनौती को स्वीकारते हुए एक समरस समाज के पुन: निर्माण हेतु विहिप ने अपनी व्यापक कार्ययोजना बनाई। इस दुर्गम लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु संगठन ने अपने 58 वर्षों की तपश्चर्या में अनेक कार्य किए, जो तत्कालीन परिस्थियों में बेहद दुरूह कहे जा सकते थे, किन्तु उनकी सफलता ने आज हिन्दू समाज की दशा व दिशा दोनों को बदलने में अभूतपूर्व योगदान किया है। 13-14 दिसम्बर, 1969 के उडुपी (कर्नाटक )धर्म संसद में संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरूजी के विशेष प्रयासों के परिणाम स्वरूप, भारत के प्रमुख संतों ने एकस्वर से ‘हिन्दव: सोदरा सर्वे, न हिन्दू: पतितो भवेत्’ के उद्घोष के साथ सामाजिक समरसता का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया। सभी ने ‘मम दीक्षा हिंदू रक्षा, मम मंत्र समानता’ का संकल्प लिया। 27 से 29 जनवरी 1979 को प्रयाग में सम्मेलन हुआ जिसमें 18 देशों के 60 हजार प्रतिनिधि सहभागी हुए। इस सम्मेलन का उद्घाटन पूज्य दलाई लामा जी ने किया। उनका स्वागत पूज्य ज्योतिष पीठ के शंकराचार्यजी ने किया,यह एक ऐतिहासिक प्रसंग है। 1982 में श्री अशोक सिंघल जी विश्व हिन्दू परिषद के पदाधिकारी बने। व्यापक जनजागरण के कार्यक्रम होने लगे। हिन्दू समाज को एकाकार करने वाली 1983 में हुई एकात्मता यात्रा में तो देश के लाखों गांव में संपर्क हुए। इस यात्रा में 6 करोड़ लोग सहभागी हुए। अप्रैल 1984 में नई दिल्ली में प्रथम धर्म संसद का अधिवेशन संपन्न हुआ, जिसमें लगभग 125 संप्रदायों के हजारों साधु-संतों सहभागी हुए। इसी वर्ष श्री राम जन्मभूमि आंदोलन भी प्रारंभ हुआ। 8 अक्टूबर 1984 को का युवा शाखा बजरंग दल के रूप में स्थापना किया गया। 1994 में काशी में हुई धर्म संसद का निमंत्रण डोम राजा को देने पूज्य संत न सिर्फ स्वयं चलकर गए बल्कि उनके घर का प्रसाद ग्रहण किया तथा अगले दिन डोम राजा धर्म संसद के अधिवेशन में संतों के मध्य बैठे और संतों ने उन्हें पुष्प हार पहनाकर स्वागत किया। इस धर्म संसद में 3500 संत उपस्थित थे। वनवासी, जनजाति, अति पिछड़ी व पिछड़ी जाति के हजारों लोगों को ग्राम पुजारी के रूप में प्रशिक्षण देकर मंदिरों में पुरोहित के रूप में दायित्व सौंपा गया। 1996 में जब आतंकियों ने बाबा अमरनाथ की यात्रा को बंद करने की धमकी देते हुए यह कहा कि यदि कोई आएगा तो वापस नहीं जाएगा। बजरंगदल के आह्वान पर 51 हजार बजरंगी व एक लाख अन्य शिव भक्तों ने जय भोले की हुंकार भरते हुए उस दुर्गम यात्रा की ओर जब कूच किया तो उस यात्रा को रोकने का कोई आज तक दुस्साहस नहीं कर पाया। 1984 में प्रारंभ हुए श्री राम जन्म भूमि मुक्ति आन्दोलन ने देश के 3 लाख गाँवों के 16 करोड़ लोगों को जोडा। विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व एवं साधु संतों के मार्गदर्शन में 1992 में गीता जयंती के पावन दिवस पर राम जन्मभूमि पर हिंदुओं के कलंक के रूप में खड़ा बाबरी ढांचा को कारसेवकों ने हटा दिया एवं भगवान श्री राम लला के लिए टाट का छत बना दिया। सड़क से संसद व सर्वोच्च न्यायालय तक अपनी आवाज बुलंद कर 492 वर्षों के संघर्ष के उपरांत, देश के स्वाभिमान की पुन: प्रतिष्ठा करते हुए, 5 अगस्त 2020 के अयोध्या में भूमि पूजन के ऐतिहासिक दिवस को स्वर्णाक्षरों में दर्ज करा दिया। अगले वर्ष तक रामलला अपने भव्य मंदिर में प्रतिष्ठित हो जाएंगे। विहिप की युवा शाखा बजरंग दल तथा दुर्गा वाहिनी देश-धर्म संस्कृति व राष्ट्र-रक्षा व समरस समाज के निर्माण हेतु अग्रणी भूमिका निभाई है। सेवा, सुरक्षा व संस्कार इनके मूल मंत्र रहे हैं। पूंछ जिले के सीमांत क्षेत्र को हिन्दू विहीन करने के जिहादी षड्यंत्र को भांपते हुए बजरंग दल ने 2005 में बाबा बूढ़ा अमरनाथ की यात्रा को जब पुन: प्रारम्भ कराया तो वहां से हिन्दुओं का पलायन भी रुका और समाज व सुरक्षा कर्मियों का आत्मविश्वास भी बढ़ा। 2007 में रामसेतु रक्षा आंदोलन का प्रारंभ हुआ तथा अद्वितीय चक्का जाम के साथ दिल्ली में महारैली हुई, रामस्वरूप आज भगवान श्री रामसेतु सुरक्षित है। हरियाणा के मेवात में गत वर्ष पुन: प्रारंभ हुई बृजमण्डल (मेवात) जलाभिषेक यात्रा भी समरस भारत की दिशा में एक अनुपम प्रयास है। देशभर में भगवान वाल्मीकि, संत रविदास तथा संविधान निमार्ता डॉ भीमराव अम्बेडकर इत्यादि महापुरुषों, जिन्होंने देश की समरसता में योगदान दिया, की जयन्तियां व्यापक रूप से मनाई जा रही हैं। इन सब कार्यक्रमों के परिणाम स्वरूप अब संत समाज सहज रूप से कमजोर समाज की बस्तियों में प्रवास, प्रवचन व सह-भोज करते हैं। समग्र ग्राम विकास अभियान जिसे एकल अभियान के रूप में भी जानते हैं, के अंतर्गत एक पंचमुखी परियोजना से अब तक 55 लाख से अधिक बच्चे लाभान्वित हो चुके है तथा लगभग 30 लाख विद्यार्थी अभी भी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। उन्हें एक साथ दी जा रही प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य, ग्राम विकास (गौ-पालन, जैविक कृषि, कौशल विकास), संस्कार (हरिकथा व सत्संग) व जागरण शिक्षा (ग्रामीण विकास योजनाओं की जानकारी व उनका उपयोग) के माध्यम से देश के सुदूर क्षेत्रों में बड़े परिवर्तन देखने को मिले हैं। इसमें आने वाले अधिकांश विद्यार्थी कमजोर समाज से ही आते हैं। 26 फरवरी 2019 को भारत के राष्ट्रपति माननीय श्री रामनाथ कोविंद एवं माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस एकल अभियान को ‘गांधी शांति पुरस्कार-2017’ द्वारा राष्ट्रपति भवन में सम्मानित कर उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की गई। देश के मठ-मंदिरों में पुरोहित प्रशिक्षित हों तथा ऊनमें समाज के हर वर्ग की भागीदारी हो। इस संबंध में विहिप के प्रयास अनुकरणीय हैं। देश भर में अब तक हजारों अर्चक-पुरोहित या पुजारियों को धार्मिक कर्मकांडों की शिक्षा-दीक्षा देकर विभिन्न मठ-मंदिरों में भगवान की सेवार्थ लगाया गया है। 50 हजार प्रशिक्षणार्थियों में से लगभग 60% अनुसूचित जाति के तथा 15% अनुसूचित जनजाति के बंधु -भगिनियां हैं, जो आज भी अनेक छोटे बड़े मंदिरों के माध्यम से समाज में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ‘एक गांव, एक मंदिर, एक कुआं व एक शमसान’ का नारा भी विहिप ने ही दिया था। विश्व हिंदू परिषद द्वारा समाज के सहयोग से देश भर में 90 हजार से अधिक अन्य सेवा प्रकल्प भी चलाए जा रहे हैं। इनमें से लगभग 70 हजार संस्कार केंद्र, दो हजार से अधिक शिक्षा केंद्र, 1800 स्वास्थ्य केन्द्र, 1500 स्वावलंबन केंद्र तथा शेष लगभग 15 हजार केन्द्रों में आवासी छात्रावास, अनाथालय, चिकित्सा केंद्र, कम्प्यूटर, सिलाई, कढ़ाई प्रशिक्षण केंद्र, विवाह केंद्र, महा-विद्यालय, कॉलेज इत्यादि प्रमुख हैं। सामाजिक चेतना के जागरण कर विहिप ने अभी तक लगभग 63 लाख हिन्दुओं के धर्मांतरण को रोकने के साथ-साथ लगभग 9 लाख की घर-वापसी भी कराई है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, वनवासी व गिरिवासी समाज के बीच सेवा, समर्पण व स्वावलंबन के मंत्र के साथ देश दर्जन भर राज्यों में छल-बल पूर्वक धर्मान्तरण के विरुद्ध कठोर दण्ड की व्यवस्था वाले कानून विहिप के सतत प्रयासों के कारण ही बन पाए हैं। भारत धर्म यात्राओं का देश है जिसकी आत्मा तीर्थों में वास करती है। इन यात्राओं के माध्यम से ही देश, धर्म व समाज की एकता, अखण्डता और समरसता प्रतिबिम्बित होती है। बात चाहे कांवड़ यात्रा की हो या कैलाश मान सरोवर की, अमर नाथ यात्रा हो या गोवर्धन परिक्रमा, जगन्नाथ की नव कलेवर यात्रा हो या सिन्धु यात्रा, श्रीराम जानकी विवाह बारात यात्रा हो या बाबा अमरनाथ की यात्रा, इन सभी को सस्ती, सफल, सुखद, संस्कारित व आध्यात्मिक स्वरूप देने में विश्व हिंदू परिषद की अहम भूमिका रही है। (लेखक विश्व हिंदू परिषद के प्रांत प्रभारी हैं।)

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