खुद को पहचानें, आत्मबल सम्पादित करें...

 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। दूरदर्शिता का तकाजा यह है कि हम अपने स्वरूप और जीवन के प्रयोजन को समझें। शरीर और मन रूपी उपकरणों का उपयोग जानें और उन प्रयोजनों में तत्पर रहें, जिनके लिए प्राणिजगत का यह सर्वश्रेष्ठ शरीर, सुरदुर्लभ मानव जीवन उपलब्ध हुआ है। आत्मा वस्तुतः परमात्मा का पवित्र अंश है । उसकी मूल प्रवृत्तियां वही हैं, जो ईश्वर की। परमात्मा परम पवित्र है, श्रेष्ठतम उत्कृष्टताओं से परिपूर्ण है। उसका समस्त क्रियाकलाप लोकमंगल के लिए है। वह लेने की आकांक्षा से दूर, प्रेम की, उदात्त भावना से परिपूर्ण है। आत्मा को इसी स्तर का होना चाहिए और उसके क्रियाकलापों में उसी प्रकार की गतिविधियों का समावेश होना चाहिए। परमेश्वर ने अपनी सृष्टि को सुंदर, सुसज्जित, सुगंधित और समुन्नत बनाने में सहयोगी की तरह योगदान करने के लिए मानव प्राणी को अपने प्रतिनिधि के रूप में सृजा है। उसका चिंतन और कर्तव्य इसी दिशा में नियोजित रहना चाहिए। यही है आत्मबोध, यही है आत्मिक जीवनक्रम। इसी को अपनाकर हम अपने अवतरण की सार्थकता सिद्ध कर सकते हैं। यह सर्वथा अवांछनीय है कि हम अपने को शरीर मान बैठें और इन्हीं की सुख-सुविधाओं और मर्जी जुटाने के लिए अनुचित मार्ग तक अपनाने में न हिचकें। (साभार : अखण्ड ज्योति मई १९७२पृष्ठ २१, पं.श्रीराम शर्मा आचार्य)

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