एबीएन एडिटोरियल डेस्क (त्रिपुरारी पाण्डेय)। महेंद्रपुर गांव में भोला नाम का एक किसान रहता था। उसकी दो बेटियां थीं जिया और खुशी। उसकी दोनों बेटियां बहुत ही सुंदर, सुशील, आज्ञाकारी और मेहनती थी। भोला अपनी बेटियों को गांव के ही स्कूलों में शिक्षा ग्रहण हेतु भेजता था। जिया और खुशी अपनी पढ़ाई के साथ-साथ खेती के कामों में भी अपने पिताजी को सहयोग करती थी। भोला को बेटा न होने की कमी ये दोनों बेटियां खलने नहीं देती थी। भोला भी अपनी दोनों बेटी जिया और खुशी को बहुत प्यार करता था। जब भी गांव के लोग भोला को बेटा न होने का ताना देते थे, तब वह कहता- मेरी दोनों बेटियां बेटों से कम नहीं है। जिया और खुशी अपने बापू के साथ खेत की मिट्टी काटती और हल भी चलाती थी। दोनों बेटियों के साथ भोला को खेत पर काम करते देख लोग ताने भी मारते थे। मगर... इन सब बातों से इतर भोला एक मेहनती किसान की तरह अपने खेती कार्यों में लगा रहता था। जिया और खुशी काफी लगनशील लड़की थी। दोनों समय पर स्कूल जाती और पढ़ाई में लगी रहती थी। भोला की पत्नी पार्वती भी अपनी दोनों बेटियों को खूब दुलार-प्यार करती थी। समय बीतता गया। जिया और खुशी बड़ी हो गयी। साथ ही दोनों ऊंचे वर्गों में पहुंच गयी। उच्च शिक्षा के लिए महाविद्यालय उसके गांव से दूर था। अब दोनों गांव से दूर कॉलेज जाकर उच्च शिक्षा ग्रहण करने लगी। गांव की औरतें भोला की पत्नी को कोसती और कहती, सुनो...। तुम्हारी बेटियां अब शयानी हो गयी हैं। ये पढ़ाई वगैरह छोड़ो और अच्छा सा लड़का देखकर दोनों का ब्याह करा दो। गांव से दूर शहर जाकर पढ़कर आना ठीक बात नहीं? जिया और खुशी की मां बस चुपचाप सब बातें सुनती और कहती। मेरी बेटियां अफसर बनेंगी। गांव की औरतें ये बातें सुनते ही मुंह बनाकर चली जाती थी। गांव के पुरुष साथी भी भोला को कहते- अरे भोलवा...। गांव की कोई लड़की गांव से बाहर नहीं है और एक तुम हो, जो अपनी बेटियों को शहर भेजते हो पढ़ने के लिए? कहीं तुम्हारी बेटियां गांव की सभी बेटियों को बिगाड़ न दें? भोला चुपचाप सुनता और धीरे से कहता था, मेरी बेटी जिया और खुशी एक दिन मेरा नाम रोशन करेगी। भोला के साथी भोला की बातें सुनकर ठहाके लगाकर हंसते थे और कहते थे... ये सपना छोड़ और अपने जैसा खेतीबाड़ी करने वाला कोई लड़का देखकर दोनों की शादी कराकर दोनों को घर से विदा कर दो। शयानी लड़की को घर में कुंवारी रखना अच्छी बात नहीं है? अब तुम ही बताओ भोलवा तुम्हारी बेटियों की उम्र की कोई लड़की इस गांव में कुंवारी है? भोला ये सब सुनकर मुस्कुराकर अपने खेत की और चल देता है। इधर, जिया और खशी दिन-रात मेहनत कर पढ़ाई कर रही थी। देखते-देखते जिया और खुशी स्नातक प्रतिष्ठा की परीक्षा बहुत अच्छे अंकों के साथ प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण भी हो गयी। जिया और खुशी के माता-पिता अपनी बेटियों की सफलता पर काफी खुश थे। दूसरी ओर, गांव के लोग अपने मन की भड़ास और जलन जाहिर करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। भोला की दोनों बेटियां प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करने लगी। एक दिन दोनों बेटियों की मेहनत रंग लायी। दोनों बेटियों के परीक्षा परिणाम जैसे ही सामने आये, तो पूरा घर हर्षोल्लास से झूम उठा। क्योंकि भोला की बेटियां राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा में सफलता प्राप्त कर दोनों अफसर बन चुकी थी। भोला की पत्नी पार्वती अपने आंचल से अपने खुशी की आंसू पोछते हुए बोली... तुम दोनों हम सब का मान बढ़ाया है। मेरी बेटियां अब अफसर बन गयी है। गांव के वे लोग बस मुंह लटकाये खड़े थे, जो बेटियों की शिक्षा के विरोधी थे। जिया और खुशी अब तो पूरे गांव की आंखों का तारा बन चुकी थीं। वे दोनों जिधर से गुजरती लोग कहते... वह देखो, हमारी अफसर बिटिया। इन दोनों बेटियों की सफलता ने पूरे गांव का दृश्य ही बदलकर रख दिया। उस गांव में बेटा और बेटी के बीच में जो असमानताएं मौजूद थी वो बिलकुल अब समाप्त हो चुकी थी। लोग अब अपनी बेटियों को घर से दूर शिक्षा प्राप्ति हेतु भेजने लगे। गांव के लोग शिक्षा के प्रति अब बहुत जागरूक हो चुके थे, जिसका परिणाम यह हुआ कि अब महेंद्रपुर गांव सबसे शिक्षित गांव हो गया। भोला की दोनों बेटियां पूरे गांव के लिए आदर्श थी। जब भी ये दोनों बिटिया अपनी नौकरी की छुट्टियों पर घर आती थी, तो गांव के लोग बड़े ही उमंग के साथ कहते थे, लो आ गयी हमारी अफसर बिटिया...। (लेखक मलयपुर, जमुई बिहार के निवासी हैं।)
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