टीम एबीएन, पटना/रांची (बासुकीनाथ पाण्डेय)। नीतिश कुमार ने बिहार में मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। इस खबर से अधिक महत्वपूर्ण है कि उन्होंने राजद से समझौता कर फिर से सीएम बनने का रास्ता भी साफ कर लिया है। वे आठवीं बार बिहार का मुख्यमंत्री बन रहें हैं। अगर महाराष्ट्र की तर्ज पर अंतिम समय में वे तेजस्वी यादव को आगे कर सीएम बना दें तो यह बहुत चौकाने वाला होगा जिसकी उम्मीद न के बराबर है। नीतिश कुमार भाजपा गठबंधन के सबसे मजबूत स्तंभ माने जाते थे। जब इससे पहले वे भाजपा को छोड़ कर गये थे और राजद से गठबंधन किया था, तब भाजपाई सरकार में शामिल राजद के मंत्रियों पर ही अधिक हमला करके अपनी राजनैतिक संभावना बचाकर रखते थे। आखिर ऐसा क्या हुआ जो भाजपा को नीतिश ने किनारे कर दिया? निश्चित तौर पर भारतीय जनता पार्टी 2024 की तैयारी में लग गयी है। यह मोदी की गतिशीलता का परिचायक है। लेकिन दुर्भाग्य से मोदी के सिपहसलार अधिक उत्साह में सेल्फ गोल करने से नहीं चूक रहें हैं। सरकार बनाना और गिराना राजनीति का खेल है और इस खेल में कौन कितना माहिर है यह सत्ता में रहते और सत्ता के बाहर रहते नेताओं की चतुराई पर निर्भर करता है। महाराष्ट्र में आॅपरेशन लोटस सफल होने के बाद उत्साहित भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और गृह मंत्री अमित शाह ने पटना में आयोजित भाजपा के कार्यक्रम में जो नारा लगाया वह उनका अति आत्मविश्वास है या फिर सुनियोजित योजना यह समय तय करेगा लेकिन अभी बिहार उनके हाथ से निकल चुका है। बिहार एक गरीब राज्य है। समस्याग्रस्त भी। लेकिन बिहार के बारे में कहा जाता है कि बिहार जो सोचता है राजनीति में वह देश वर्षो बाद सोचता है। भाजपा ने महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के शिव सेना को जिस प्रकार से छिन्न-भिन्न कर दिया उससे नीतिश कुमार के कान खड़ें हो चुके थे। नीतिश विधानसभा चुनाव में ही चिराग पासवान की सिर्फ जद यू के खिलाफ उम्मीदवार उतारकर जिस प्रकार जद यू के उम्मीदवारों को हराने का काम किया उसी प्रकरण से नीतिश की नाराजगी बढ़ा दी। उसके बाद से लगातार नीतिश की परेशानी बढ़ती गयी। दो उप मुख्यमंत्री के घेरे में से उनके अतिविश्वसनीय सुशील मोदी को हटाकर भाजपा ने उन्हें छोटे-छोटे झटके देने आंरभ कर दिया। दूसरी ओर राष्ट्रीय जनता दल का राजनैतिक दबाव और सबसे बड़ी पार्टी होने से उत्पन्न स्थिति में नीतिश का असहज होना स्वाभाविक था। इतिहास के पन्नों को तत्काल घट रही घटनाओं से जोड़ें तो एक महत्वाकांक्षी और राजनीति में बिहार के चाणक्य नीतिश को आरसीपी सिंह के ब्यान से भी समझा जा सकता है? आरसीपी सिंह ने कहा कि नीतिश सात जनमों ने पीएम नहीं बनेंगे सपने में भी न सोचें। सवाल यह है कि पीएम बनने की बात आखिर आई कहां से? इसके पहले जब पीएम के लिये भाजपा ने नरेन्द्र मोदी का नाम सामने किया था तब सबसे अधिक विरोध नीतिश कुमार ने किया था और इसी मुद्दें पर साथ छोड़ दिया था। तब यह कयास लगाये जा रहे थे कि केन्द्र में पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं बनेगी और भाजपा किसी भी हाल में सत्ता में नहीं आने जा रही है। ऐसे मेें एक गैर भाजपाई ईमानदार और सशक्त राजनेता के रुप में नीतिश कुमार अपनी संभावना तलाश रहे थे। लेकिन मोदी मैजिक ने इनके सपनों को समाप्त कर दिया। उसके बाद की राजनीति में 2024 एक ऐसा साल होगा, जिसमें भाजपा अति आत्मविश्वास के कारण बहुत कठिनाई में हो सकती है। भाजपा सत्ता में उस ताकत का प्रदर्शन नहीं कर पाई है जिसकी उम्मीद आम लोगों को है। भाजपा का सबसे बड़ा संकट बिहार-झारखंड में है नेत्त्व की कमी है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व उसी राजनीतिकरण का शिकार है जिसका शिकार कभी कांग्रेस रही थी। अब जब डेढ़ साल पहले भाजपा 2024 की तैयारी कर रही है उसमें बिहार जैसे राज्य को खोना उसके लिये कड़वी घूट की तरह है। अंदर खाने से आती आवाज यह भी कह रही है कि भाजपा किस दंभ से 2024 में जीत का दावा कर रही है? क्या नीतिश को आरसीपी सिंह ने जो पीएम के सपने देखने से मना किया है वह सपना फिर से नीतिश नहीं देख सकते हैं। सात बार बिहार का सीएम बनने के बाद अब राजनीति की महत्वाकांक्षा क्या हो सकती है? आखिर राजनीति इसी का नाम है। सड़क पर झंडा ढोने की चर्चा भाजपा के कई नेता लगातार करते हैं और सड़क के आदमी को पीएम बनने की कहानी भी सुनाते हैं। फिर नीतिश कुमार का एक कोण यह भी जिंदा है। बिहार में भाजपा के पास नेता ही नहीं है। भूपेंद्र यादव नित्यानंद राय का नाम अवश्य आगे करते रहे लेकिन तेजस्वी का राजनीतिक सितारा अधिक उज्जवल जान पड़ता है अगर उन पर चल रहे मामलों को छोड़ दिया जाए। बिहार में एक मजबूत महागठबंधन की सरकार बन रही है। इस सरकार में तमाम विरोधाभास होगा यह भी तय है। लेकिन जिस प्रकार छोटे से बहुमत जिसमें सिर्फ छह सीटों का संतुलन था और भाजपा की प्रताड़ना दोनों सहना पड़े तो नीतिश का निर्णय 2024 के लोकसभा चुनाव भी प्रभावित करेगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि भाजपा भी विशेषकर बिहार झारखंड सहित कई बड़ें राज्यों में अब जनता का विश्वास खो रही है। भाजपा के नेता भी बयान बहादुर हो गये हैं और उनका भरोसा सिर्फ मोदी और हिंदुत्व पर है जिसकी एक सीमा है। बिहार में भाजपा को कभी बहुमत नहीं मिला क्योंकि वह जद यू के सहारे ही अपना पालन करती रही। भाजपा की हालत खिसियाई बिल्ली की तरह हो गयी है जिससे दूध की प्याली छीन ली गयी है। आखिर पार्टी विथ डिफरेंस का जो तगमा भाजपा ने अपने गले में लटका रखा था वह टूट चुका है। नीतिश ने जिस गठबंधन को कबूल किया है वह बिहार की राजनीति नहीं देश की राजनीति को भाजपा के खिलाफ एक बड़ी मजबूती देगा। राजद, कांग्रेस, तीनों साम्यवादी दल का विशुद्ध सेक्यूलर गठबंधन से बिहार में नेता विहिन भाजपा कैसे ठकरा सकेगी इसकी चिंता भाजपा को करना चाहिए। नीतिश की इस झटके को झेलना आसान नहीं होगा। (Editor @ abnnews24.com)
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