आज भी कराह रहे हैं प्रेमचंद के पात्र...

 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (मुरलीधर)। हमारी कसौटी पर वह साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाईयों का प्रकाश हो, जो हम में गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है। साल 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन में प्रेमचंद द्वारा दिए थे। देश में प्रेमचंद ही ऐसे पहले शख्स थे, जिन्होंने हिंदी साहित्य को रोमांस, तिलिस्म, ऐय्यारी, जासूसी कथानकों से बाहर निकालकर आम जन की जिंदगी से जोड़ा। दलित, अल्पसंख्यक और महिलाओं के अफसानों, जज्बात को अपनी कहानियों में ढाला। उन्हें अपनी आवाज दी। साहित्य को यथार्थ से जोड़ने और समाजोन्मुखी बनाने में प्रेमचंद का अहम योगदान है। पूस की रात, सद्गति, कफन, ईदगाह, पंच परमेश्वर, बूढ़ी काकी, शतरंज के खिलाड़ी, नमक का दरोगा आदि उनकी अनेक कहानियों में सामाजिक यथार्थ के दृश्य बहुतायत में मिलते हैं। घीसू, होरी, अमीना बी, जुम्मन, सूरदास, बूढ़ी काकी हमारे अपने समाज की देन और बेलाग चरित्र हैं, जिन्हें उन्होंने अपनी कहानियों का मुख्य किरदार बनाया। वरदान, सेवा सदन, रंगभूमि, प्रेमाश्रम और कर्मभूमि वगैरह उनके कई उपन्यासों की कहानी किसानों की जिंदगानी और उनके संघर्षों के ही इर्द-गिर्द घूमती है। भारतीय गांवों का जो सजीव, मार्मिक चित्रण प्रेमचंद ने अपने उपन्यास गोदान में किया है, हिन्दी साहित्य में वैसी कोई दूसरी मिसाल हमें ढूंढे नहीं मिलती। साल 1917 में रूस की अक्टूबर क्रांति से प्रेमचंद भी बेहद प्रभावित थे। अपने दोस्त के नाम एक खत में उन्होंने इसका साफ जिक्र किया है- मैं बोल्शेविकों के मतामत से कमोबेश प्रभावित हूं। वर्गविहीन समाज का सपना प्रेमचंद का सपना था। ऐसा समाज जहां वर्ण, वर्ग, लिंग, रंग, जाति, भाषा और धर्म का कोई भेद न हो। शुरुआत में गांधीजी के आंदोलन में अपार श्रद्धा रखने वाले प्रेमचंद का आदर्शवाद उनके आखिरी काल में लिखे हुए साहित्य में टूटता दिखता है। यही नहीं आगे चलकर अपने उपन्यास के एक पात्र के मुंह से जब वे यह वाक्य बुलवाते हैं कि-शिकारी से लड़ने के लिए हथियार का सहारा लेना जरूरी है, शिकारी के चंगुल में आना सज्जनता नहीं कायरता है। तब हम यहां उपन्यास सेवासदन, रंगभूमि, कायाकल्प, कर्मभूमि के लेखक से इतर एक दूसरे ही प्रेमचंद को साकार होता देखते हैं। गोया कि इसके बाद ही प्रेमचंद गोदान जैसा एपिक उपन्यास, कफन जैसी कालजयी कहानी और दिल को झिंझोड़ देने वाला अपना आलेख महाजनी सभ्यता लिखते हैं। उनकी इन रचनाओं से पाठक पहली बार भारतीय समाज की वास्तविक और कठोर सच्चाईयों से सीधे-सीधे रु-ब-रु होता है। प्रेमचंद का युग हमारी गुलामी का दौर था। जब हम अंग्रेजों के साथ-साथ स्थानीय जागीरदारों, सामंतों की दोहरी गुलामी भी झेल रहे थे। वे दोनों को ही एक समान अवाम का दुश्मन समझते थे। प्रेमचंद घर में उपरोक्त किताब के एक अंश में वे अपनी पत्नी शिवरानी देवी से कहते हैं कि शोषक और शोषितों में लड़ाई हुई, तो वे शोषित, गरीब किसानों का पक्ष लेंगे। बिला शक प्रेमचंद की कहानी, उपन्यासों में यह पक्षधरता और प्रतिबद्धता हमें साफ दिखलाई देती है। उपन्यास प्रेमाश्रम में वे जहां सामूहिक खेती और वर्गविहीन समाज की वकालत करते हैं, तो वहीं दूसरी ओर विदेशी शासन और शोषणकारी जमींदारी गठबंधन का असली चेहरा बेनकाब करते हैं। उनकी नजरों में आजादी का मतलब दूसरा ही था, जो शोषणकारी दमनचक्र से सर्वहारा वर्ग की मुक्ति के बाद ही मुमकिन था। साल 1933 में समाचार पत्र जागरण के अपने एक संपादकीय में प्रेमचंद लिखते हैं- अधिकांश भारतीय स्वराज इसलिए नहीं चाहते कि अपने देश के शासन में उनकी ही आवाज, बहसें सुनी जाएं बल्कि स्वराज का अर्थ उनके प्राकृतिक उपज पर नियंत्रण, अपनी वस्तुओं का स्वच्छंद उपयोग और अपनी पैदावार पर अपनी इच्छा अनुसार मूल्य लेने का स्वत्व। स्वराज का अर्थ केवल आर्थिक स्वराज है। यानी उनके मतानुसार आर्थिक आजादी के बाद ही वास्तविक आजादी मुमकिन है। उपन्यास प्रेमाश्रम में अपने पात्रों से प्रेमचंद कहलाते हैं- रूस देश में कास्तकारों का ही राज्य है, वह जो चाहते हैं, करते हैं। और कादिर कौतूहल से कहता है- चलो ठाकुर उसी देश में चलें। यही नहीं उपन्यास रंगभूमि में उनका एक पात्र कहता है- ईर्ष्या की व्यापकता ही साम्यवाद का सर्वप्रिय कारण है। प्रेमचंद ने अपनी छोटी सी जिंदगानी में बेशुमार लेखन किया। साहित्य की शायद ही कोई ऐसी विधा बची, जिसमें उन्होंने अपना लेखन नहीं किया हो। कहानी और उपन्यासों के अलावा उन्होंने कर्बला, रूहानी शादी, संग्राम, प्रेम की वेदी जैसे नाटक और कुछ विचार, कलम, महात्मा शेख सादी, दुगार्दास, त्याग और तलवार आदि सैंकड़ों निबंध लिखे। टालस्टाय की कहानियों का अनुवाद किया। साहित्यिक पत्रिका हंस और समाचार-पत्र जागरण के संपादन का जिम्मा संभाला। गोया कि हर क्षेत्र में वे कामयाब रहे। प्रेमचंद ने भारतीय समाज का गहन और व्यापक अध्ययन किया था। विश्व की प्रमुख घटनाओं, साहित्य से भी वे अछूते नहीं थे। साम्राज्यवाद, सामंतवाद, जातिवाद, साम्प्रदायिकता को वे इंसानियत का सबसे बड़ा दुश्मन समझते थे। मौजूदा दौर में जिस तरह से देश की कुछ सियासी पार्टियां और कट्टरपंथी संगठन धर्म और संस्कृति का इस्तेमाल अपने निजी फायदे के लिए करने में बाज नहीं आते, प्रेमचंद इसके बरखिलाफ थे। उनका ख्याल था, धर्म को राजनीति से गडमड न कीजिए, क्योंकि धर्म ईश्वर और मनुष्य के सम्बंध की वस्तु है।

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