टीम एबीएन, रांची। झारखंड के राज्यपाल रमेश बैस ने कहा कि लोगों को समाज के प्रति अपने दायित्वों का पालन करना चाहिये और उन्हें समाज के विकास के लिए अपना अधिक से अधिक योगदान चाहिये। राज्यपाल ने एनआईटी, जमशेदपुर में उन्नत भारत अभियान के तहत एकेडमिक सोशल रिस्पॉन्सबिलिटी पर आयोजित विचार मंथन व कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहा कि गांवों की समस्या को जानने के लिये हमें गांवों में जानना होगा। राज्यपाल ने कहा कि गांधी जी का ग्रामीण विकास व आत्मनिर्भर भारत स्वप्न था। वे कहा करते थे कि जब तक देश के ग्रामों का विकास नहीं होगा तब तक देश का विकास नहीं होगा। हम सभी ग्रामों के विकास की दिशा में मंथन करना होगा, आगे आना होगा। उन्होंने कहा कि पहले लोग ग्रामों में संतुष्ट रहते थे। छोटे किसान भी खेती करते थे और बड़े किसान भी खेती करते थे। लेकिन आज बड़ी विडंबना है कि लोग कार्य करने से पहले फल की चिंता करते हैं। पहले ग्रामों में सारी आवश्यकताएं पूरी हो जाती थी, सिर्फ नमक बाहर से खरीदना पड़ता था लेकिन अब स्थिति ऐसी नहीं है। राज्यपाल ने कहा कि भारत संयुक्त परिवार के लिए जाना जाता था, परंतु आज आज संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। लोग अपने परिवार के सदस्य को नहीं पहचानते। उन्होंने औद्योगिक प्रतिष्ठानों से कहा कि उनका दायित्व है कि आसपास के क्षेत्र के संदर्भ में सोचे। सीएसआर के तहत उनको उस क्षेत्र की आवश्यकताओं को जानकर कार्य करना चाहिये। गांव वालों की माँग पर काम किया जाय तो विज्ञापन की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि औद्योगिक प्रतिष्ठान आसपास के क्षेत्र में एहसान की भवना से कार्य नहीं करें बल्कि देश के विकास में योगदान व सहभागी बनने की भावना से कार्य करें। झारखंड की जनता भोले-भाले हैं, उन्हें प्यार चाहिए। राज्यपाल ने कहा कि झारखंड की धरती पृथ्वी का सबसे पुराना टुकड़ा है। यह बात शास्त्रों के साथ रिसर्च में भी सामने आ चुकी है। यह साबित हो चुका है कि साहिबंगज के फॉसिल्स डायनासोर के जमाने का है। देश की आजादी में भी झारखंड के सपूतों का महत्वपूर्ण योगदान है। वहीं, यह खनिज संपदाओं से भरा हुआ राज्य है। हमें गर्व होना चाहिए कि हम झारखंड के रहनेवाले हैं। हम सभी ऐसा प्रयास करें कि झारखंड राज्य देश के विकसित व अव्वल राज्यों में शुमार किया जा सके। राज्यपाल ने कहा कि शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का साधन नहीं है। उन्होंने कहा कि राज्य के विश्वविद्यालयों की समीक्षा बैठक में पाया कि यहां भारी रिक्तियां हैं। उन्होंने कहा कि भारत की शिक्षा पद्धति मैकाले की शिक्षा की पद्धति पर आधारित है। आज समाज मे अंग्रेजी जानने वाले को विद्वान माना जाता है और अंग्रेजी भाषा नहीं जानने वाले को हीन भावना से देखा जाता है। हम सभी को हमें अपनी राष्ट्रभाषा पर गर्व होना चाहिये, सबको राष्ट्रभाषा जानना चाहिये और उसका सम्मान करना चाहिए।
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