टीम एबीएन, पटना। जदयू से राज्यसभा नहीं भेजे जाने के कारण मोदी मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे चुके रामचंद्र प्रसाद सिंह अथवा आरसीपी सिंह ने शुक्रवार को पटना पहुंचकर अपने तेवर से बता दिया है कि भले ही वह राज्यसभा से रिटायर हो गए हों, लेकिन राजनीति से रिटायर नहीं हुए हैं। पटना में उन्होंने कहा, मैं जमीन का आदमी हूं, संगठन का आदमी हूं और संगठन में काम करूंगा। ग़ौरतलब है कि पिछलें माह राज्यसभा चुनाव में बिहार से दो सीटें नीतीश क़े खाते से थीं। यह दो सीटें राज्यसभा के जदयू सदस्य महेंद्र प्रसाद की मृत्यु और पार्टी के दूसरे सदस्य, केंद्रीय इस्पात मंत्री आरसीपी सिंह का छह वर्ष का कार्यकाल जुलाई में समाप्त होने के कारण खाली हुई थीं। नीतीश ने एक सीट से अनिल हेगड़े और आरसीपी की जगह पार्टी के झारखंड प्रदेश अध्यक्ष खीरू महतो को उम्मीदवार बनाकर यह जाहिर कर दिया कि उनका मोदी सरकार में मंत्री के रूप में शामिल आरसीपी सिंह को फिर से राज्यसभा भेजने का कोई इरादा नहीं है। नीतीश के पिछले 25 वर्षों में सबसे विश्वासपात्र रहे आरसीपी को तीसरी बार राज्यसभा नहीं भेजने का उनका फैसला भाजपा क़े लिए भी चौंकाने वाला था। नीतीश कुमार जब अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री बने तब उत्तर प्रदेश कॉडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी आरसीपी सिंह उनके सम्पर्क में आए। नीतीश के मुख्यमंत्री बनने के बाद आरसीपी सिंह बिहार में उनके प्रमुख सचिव बने और 2010 में सरकारी सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृति लेकर जदयू के टिकट पर राज्यसभा गए। पिछले 12 वर्षों से वे नीतीश के बाद जदयू में राजनैतिक रूप से सबसे प्रभावशाली नेता माने जाते रहे। 2019 क़े लोकसभा चुनाव में जदयू को 16 लोकसभा सीटों पर विजय मिली थी, लेकिन भाजपा केंद्रीय मंत्रिमंडल में अपने सभी सहयोगियों को संख्याबल को किनारे रखकर सिर्फ एक सीट की पेशकश कर रही थी। नीतीश ने अपने दो भरोसेमंद नेताओं, आरसीपी और ललन सिंह का नाम आगे किया था। हालांकि, जब नए मंत्रियों के नामों की घोषणा हुई तो उनमें सिर्फ आरसीपी सिंह का नाम शामिल था। आरसीपी सिंह के मंत्री बनने के बाद से ही ये खबरें दिल्ली से पटना पहुंच रही थीं कि आरसीपी भाजपा के करीब हो गए हैं और भाजपा उनकी मदद से जदयू में टूट करा सकती है। आरसीपी सिंह को राज्यसभा के लिए पुनः नामित नहीं करके नीतीश ने गेंद भाजपा के पाले में डाल दी। आरसीपी सिंह का राज्यसभा कार्यकाल 7 जुलाई को समाप्त होने क़े बाद भी वह अगले छह महीने तक संसद के किसी सदन का सदस्य नहीं रहने के बावजूद प्रधानमंत्री की इच्छा से मंत्री बने रह सकते थे लेकिन उन्होंने एक दिन पहले इस्तीफ़ा दे दिया। मोदी ने आरसीपी सिंह का इस्तीफ़ा स्वीकार कर साफ़ बता दिया है कि वह फ़िलहाल नीतीश से टकराना नहीं चाहते हैं। कुछ ही दिनो में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं और बिहार में तेजस्वी यादव और नीतीश के बीच लगातार हो रहीं मुलाक़ातों क़े कारण भाजपा के लिए नीतीश को नाराज कर आरसीपी सिंह को मंत्री बनाये रखना आसान नहीं था। राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा को अपने उम्मीदवार की जीत तय करने के लिए जदयू के सहयोग की ज़रूरत है। नीतीश ने पिछले दो राष्ट्रपति चुनावों में गठबंधन धर्म से इतर विरोधी पक्ष के उम्मीदवारों को मत दिया था। 2012 में जब वे एनडीए के साथ थे तो उन्होंने यूपीए उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी के लिए मतदान किया, जबकि 2017 में जब वे महागठबंधन में राष्ट्रीय जनता दल के साथ थे तो वे एनडीए के रामनाथ कोविंद के समर्थन में सामने आए। नीतीश के ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए भाजपा कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहती थी, जिसका राष्ट्रपति चुनाव और बिहार में गठबंधन सरकार पर कोई प्रतिकूल असर हो। भाजपा नीतीश को चुनौती देने वाले जॉर्ज फ़र्नांडिस, शरद यादव, दिग्विजय सिंह और जीतनराम माझी का हाल देख चुकी है। इसके अलावा, भाजपा के लिए कम से कम 2024 के आम चुनाव तक नीतीश का साथ वैसे भी जरूरी है, क्योंकि बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से एनडीए को पिछली बार 39 सीटें मिली थीं। बिहार चंद बड़े राज्यों में से एक है जहां भाजपा को 2024 में केंद्र की सत्ता में लगातार तीसरी बार काबिज होने के लिए अच्छे प्रदर्शन की दरकार है और नीतीश के साथ न होने से इस पर असर पड़ सकता है। बिहार में भाजपा लालू राजद के साथ नहीं जा सकती है लेकिन नीतीश भाजपा क़े अलावा लालू के साथ भी जा सकते हैं। भाजपा और आरजेडी दोनों को सरकार बनाने के लिये नीतीश की जरूरत है। पिछले 17 साल में हर विधानसभा और लोकसभा चुनाव में जदयू को 15 से 25 प्रतिशत तक मत प्राप्त हुए हैं। 2020 में भले ही जदयू को विधानसभा की मात्र 43 सीटों पर जीत मिली, उसका मत प्रतिशत राजद के 23.11 और भाजपा के 19.46 के मुकाबले 15.39 प्रतिशत रहा है। जाहिर है, प्रदेश में जदयू जिसके साथ रहेगी उसी की सरकार बनेगी। यही कारण है कि गठबंधन के भीतर नीतीश के साथ अपने एजेंडे पर तमाम अंतर्विरोध और तनाव के बावजूद भाजपा के लिए जदयू के साथ डबल इंजन की सरकार चलाने की सियासी जरूरत भी है और शायद विवशता भी। इस कारण से भी आरसीपी सिंह क़ो मोदी मंत्रिमंडल से बाहर जाना पड़ा। आरसीपी सिंह आगे क्या करते है देखना दिलचस्प होगा। वो जमीनी संघर्ष की बात तो कर रहे हैं लेकिन बिहार में आरसीपी सिंह क़े पास ज़्यादा विकल्प नहीं है। नीतीश अब आरसीपी सिंह को फिर से उनका पुराना रुतबा देंगे, यह संभव नहीं लगता। आरसीपी सिंह खुद की पार्टी बनाकर ख़म ठोकें, यह भी मुमकिन नहीं। प्रशांत किशोर क़े बिहार में किए जा रहे प्रयोग के साथ आरसीपी सिंह जाएं, इतना धैर्य उनमें हो ऐसा लगता नहीं। ऐसे में भाजपा ही आरसीपी सिंह के लिए सबसे मुफ़ीद पार्टी है। फ़िलहाल, भाजपा ने आरसीपी सिंह से दूरी बनाकर रखी है। आगे क्या होगा यह अभी रहस्य है। लेकिन बिहार की राजनीति में अभी बहुत कुछ उलटफेर होना बाक़ी है।
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