क्या बिहार में जरूरी है जातीय जनगणना?

 

एबीएन सेंट्रल डेस्क (त्रिपुरारी पाण्डेय)। इस वक़्त बिहार की राजनीति में बड़ी ही गर्मजोशी के साथ जातीय आधारित जनगणना हेतु मंथन चल रही है। सूबे के मुखिया के आवाहन पर सभी दलों के साथ सर्वदलीय आपात बैठक की गयी है। इस बैठक में सभी दलों की सहमति से बिहार में जातीय जनगणना करवाने पर आपसी सहमति बन गयी है। इस सर्वदलीय बैठक पर केबिनेट की अंतिम मुहर भी लग गयी है। बिहार के मुखिया श्री नीतीश कुमार जी ने यह घोषणा की है की यदि केंद्र इस जाति जनगणना पर होने वाले व्यय का वाहन नहीं करेगी तो बिहार में राज्य सरकार स्वयं जाति आधारित जनगणना पर होने वाले खर्चों का भार स्वयं उठाएगी। अब एक प्रश्न के साथ कई प्रश्न एकसाथ आ जाती है जैसे कि 1) क्या बिहार में इस वक़्त जाति आधारित जनगणना ही करवाना अति आवश्यक था? 2)आखिर क्यों जाति जनगणना पर केंद्र सरकार की असहमति के बावजूद भी राज्य सरकार स्वयं के खर्च पर जाति जनगणना कराना अत्यंत आवश्यक समझ रही है 3) जनगणना का आधार जाति क्यों, आर्थिक क्यों नहीं 4) क्या जाति आधारित जनगणना से लोगों में जाति आधारित भावना विकसित नहीं होगी 5)क्या राज्य के बेरोजगारों की संख्या से ज्यादा जाति की संख्या जानना जरूरी था 6) क्या राज्य में रोजगार के मुद्दे पर अथवा कल कारखानों के विकास पर आपात बैठक बुलाना जरूरी नहीं था? राज्य के अनुमान से जाति आधारित जनगणना से 500 करोड़ से भी खर्च आएगी। क्या इस खर्च को शिक्षा बजट में जोड़कर शिक्षक और पुस्तकालयाध्यक्ष के रिक्त पदों पर बहाली प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती थी? बिहार विधानसभा चुनाव में विपक्षी दल द्वारा सत्ता में आने पर दस लाख रोजगार देने की घोषणा की गयी। विपक्षी दल द्वारा जब दस लाख रोजगार देने की घोषणा की तब राज्य की वर्तमान सरकार सत्ता में आने पर 19 लाख रोजगार देने की घोषणा की किन्तु इस वक़्त राज्य में बेरोजगारी एक बहुत बड़ी गंभीर समस्या बनी हुई है। साल 2011-12 में बिहार में आयोजित शिक्षक पात्रता परीक्षा की नियुक्ति प्रक्रिया आज भी छठे चरण के रूप चल रही है। अब यह अत्यंत ही विचारणीय बात है की जो परीक्षा 2011-12 में हुई थी उसकी बहाली ग्यारह साल में भी संपन्न नहीं हो पाई? आखिर इतने साल क्यों लग गए? वर्ष 2019 की बिहार माध्यमिक शिक्षक पात्रता परीक्षा का परिणाम मार्च 2021 में घोषित तो हुई परन्तु इनका परीक्षा परिणाम ही विवादों में रहा। अभ्यर्थी सड़क से सदन तक आंदोलन करते रहे परिणाम शून्य रहा? वर्ष 2008 में ही राज्य के हाई स्कूलों में पुस्तकालयाध्यक्षों की नियुक्ति हुई थी। परन्तु 2008 के बाद आजतक लगभग चौदह साल से बिहार के हाई स्कूलों में पुस्तकालयाध्यक्षों की बहाली नहीं हो पायी है? इस वक़्त जरूरत थी बिहार में रोजगार के मुद्दे पर आपात बैठक करने की जिससे की राज्य के शिक्षित युवा को रोजगार मिलती! जाति आधारित जनगणना से लोगों में पुन: जातिवादी भावना का विकास होगा और राज्य जातिवाद की और अग्रसर होगा! अगर सरकार जाति आधारित जनगणना ना करवाकर आर्थिक जनगणना करवाती है तो सरकार को राज्य के गरीबी का सही आकलन का पता चलता जो की बेरोजगारी एवं गरीबी दूर करने में सहायक सिद्ध होती! एक ओर सरकार जहां वाहवाही लूट रही होती है की हमने इतना को रोजगार दिया जबकि दूसरी ओर बिहार के शिक्षित बेरोजगार युवा सड़क, सदन, आंदोलन में लगे हैं।

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