एबीएन डेस्क, रांची। इस ऐतिहासिक परिघटना संथाल हूल को इतिहासकार संथाल विद्रोह मानते हैं जबकि सच्चाई यह है कि यह कोई विद्रोही आंदोलन नहीं था बल्कि ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ जंग था इसे समझने के लिए जंग और विद्रोह के बीच फर्क को समझना होगा विद्रोह किसी भी सत्ता से असंतुष्ट जन आंदोलन को कहा जा सकता है जबकि जंग दो सत्ताओं के बीच अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए होता है और संथाल हूल संथालो द्वारा अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ जंग था। 30 जून अट्ठारह सौ पचपन को शुरू हुआ भारत में प्रथम सशस्त्र जन संघर्ष जो बाद में चलकर प्रथम छापामार जंग भी बना 26 जुलाई अट्ठारह सौ पचपन को संथाल हूल के सृजनकर्ताओं में से प्रमुख व तत्कालीन संथाल राज्य के राजा सिद्धू और उनके सलाहकार व उनके सहोदर भाई कान्हू को वर्तमान झारखंड के साहिबगंज जिला के बरहेट प्रखंड में भोगनाडीह गांव में 1815 ईसवी को और सिद्धू का जन्म 1820 में हुआ था। संथाल विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभाने वाले इनके और दो भाई भी थे जिनका नाम चांद मुर्मू और भैरव मुर्मू था चांद का जन्म 1825 एवं भैरव का जन्म 1835 ईस्वी में हुआ था इनके अलावा इनकी दो बहने भी थी जिनका नाम फूलों मुर्मू और जानू मुर्मू था इन छह भाई-बहनों का पिता का नाम चुन्नी मांझी था। अपने वतन व जनचेतना की सुरक्षा हेतु वह निरंतर संघर्ष करता है बिहार जनजातीय समाज में अब तक जितने भी संघर्ष हुए उनका प्रमुख पहलू सामुदायिक पहचान बचाना रहा है जोत जमीन जल जंगल की रक्षा व समानता पर आधारित समाज निर्माण हेतु जमीन से जुड़े आदिवासियों के आंदोलन का एक लंबा इतिहास है। पाट,शोषण, बलात्कार जैसे उत्पीड़न व जुल्म से त्रस्त संथाल भागते फिर रहे थे लेकिन उनकी अधीनता स्वीकार करने को कतई तैयार नहीं थे इन तमाम घटनाक्रम को देखते हुए विद्रोह किया 1789 से 1831- 32 के बीच कई जनजातियां आंदोलन हुए हैं जिनके लिए खुंट - कट्टी व्यवस्था के विघटन के प्रति प्रतिशोध की भावना प्रमुख रूप से रही 1831 में मुख्य कोल विद्रोह हुआ मुंडा, हो, उरांव आदि सभी विद्रोह में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया मानसून में भूमिजो का विद्रोह हुआ इस विद्रोह के दौरान गांव लूटे गए जलाए गए तथा पुलिस सैनिकों सहित कई नागरिक मारे गए। रांची पलामू जिले विद्रोह के केंद्रबिंदु रहे। ब्रिटिश शासन के शुरू के 100 वर्षो में नागरिक विद्रोह का सिलसिला किसी खास मुद्दे व स्थानीय असंतोष के कारण चलता रहा 1763 से 1856 के मध्य देशभर में अंग्रेजो के खिलाफ 40 से अधिक बड़े विद्रोह में छोटे पैमाने पर तो इनकी संख्या बेशुमार है धार्मिक नेताओं के मौलवी पंडित ने भी विद्रोह के झंडे लहराए जनजातीय विद्रोह में उनकी जातीय हित की बुनियादी कारण रहे हैं जनजातियों में संथाल का विद्रोह ठोस, व्यापक और आक्रमक था भारत से अंग्रेजों को भगाने के लिए प्रथम जनक्रांति थी जो संथाल हुल के नाम से प्रसिद्ध हुई। संथालों में जनजातियों की संख्या सर्वाधिक है और उनका निवास संथाल परगना है उस समय छोटनागपुर के उत्तरी पूर्वी छोर पर स्थित है। इनकी अधिसंख्या के वजह ही संथाल परगना नाम दिया छोटनागपुर में दाखिल के बाद संथाल में इसी इलाके को अपना निवास स्थल बनाया संथाल परगना तब भागलपुर कमिश्नरी का अंग था हजारीबाग और वीरभूम जिले में संथाल बहुत पहले आ बसे थे इन्हीं इलाको से आकर ये मूल निवासी भोले भाले पहाड़िया की ओर से कोई खास विरोध नहीं हुआ। और कई गैर संथाली लोगों ने बड़ी हिस्सेदारी निभाई जिनमें मंगरा पूजोहर (पहाड़िया) गुरैया पुजहर (पहाड़ियां) हरदास जमादार (ओबीसी) ठाकुरदास (दलित) बेचू अहीर (ओबीसी) गंदू लोहरा, चुकू डोम दलित वर्ग से मानसिंह ओबीसी और गुरु चरण दास शामिल थे। जंगल को साफ कर खेती के लायक जमीन तैयार करते गए गांव बसाते गए सर्वप्रथम 1790- 1810 के बीच यहां बसे इनका आना-जाना जारी रहा 1836 तक 427 गांव से कम नहीं बसाए गए 1851 तक यहां संथालो के 1473 गांव बस चुके थे जिनकी आबादी लगभग 82795 हो गई थी। छोटनागपुर में अंग्रेजों का वर्चस्व 1756 से ही हो चुका था परंतु यहां की जनजातियों पर नहीं धीरे-धीरे शोषण, अत्याचार और जुल्म का शिकंजा जकड़ता गया 1850 तक यहां के चप्पे-चप्पे में शोषण छा चुका था संथाल भी इससे अछूता नहीं रहा। 71 साल बाद संथाल हूल का नेतृत्व भोगनाडीह निवासी चुन्नी मांझी के चार पुत्रों ने किया ये थे सिद्धू कान्हु चांद और भैरव हुल के समय कान्हु की उम्र 35, चांद की आयु 30 वर्ष और भैरव की उम्र 20 वर्ष बताई जाती है सिद्धू सबसे बड़ा था, जब सिधु कान्हू ने शोषण और अत्याचार के विरुद्ध विद्रोह करने का संकल्प ले लिया तो जनमानस तथा जनसमूह को एकजुट करने व अपने मुहिम को मुकाम तक पहुंचाने का अहद लेते हुए जनसमूह को एकजुट व संगठित करने तथा एकत्रित करने के लिए अंग्रेजों हमारी भूमि छोड़ो कि नारे से गूंज उठा और फिर सिद्धू ने ललकारा था करो या मरो अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ दो। अपने परंपरागत ढंग को अपनाया। डुगडुगी पिटवा दी और सालटहनी का संदेश गांव गांव में दिया। सिद्धू को अगस्त 1855 में पंचकठिया नामक स्थान पर बरगद के पेड़ पर फांसी दे दी गई वह पेड़ आज भी उसी स्थान पर स्थित है जिसे शहीद स्थल कहा जाता है जबकि कन्हू को भोगनाडीह ने फांसी दी गई पर आज भी वह संथालो के दिलों में आज भी जिंदा है और याद किए जाते हैं। (लेखक अखिल झारखंड प्राथमिक शिक्षक संघ झारखंड प्रदेश मुख्य प्रवक्ता हैं।)
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