छोटे शेयर, बड़ा नुकसान...

 

एबीएन डेस्क (मृत्युंजय कुमार विधि सह वित्त संवाददाता एबीएन न्यूज)। दुनिया भर के शेयर बाजारों में बिकवाली जारी है। जैसा कि मंदी के दिनों में अक्सर होता है, मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों की कीमत में लार्जकैप शेयरों की तुलना में ज्यादा गिरावट आई है। जनवरी 2022 से निफ्टी में 11 फीसदी की गिरावट रही जबकि मिडकैप सूचकांक में 14.5 प्रतिशत तथा स्मॉलकैप सूचकांक में 19 प्रतिशत की गिरावट आई है। मूल्यांकन के संदर्भ में बाजार 19-20 के मूल्य-आय अनुपात के साथ संचालित है लेकिन एनएसई 500 के करीब दो तिहाई शेयरों की कीमत 30 प्रतिशत तक घटी है। स्मॉलकैप और मिडकैप शेयर बुनियादी रूप से गिरावट के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं और इसकी कई वजह हैं। एक कारण तो यही है कि आधारभूत संदर्भों में एक बड़ी कंपनी के पास ज्यादा संसाधन होने की संभावना होती है जो मंदी से निपटने में उसकी मदद करती है। दूसरी वजह यह है कि संस्थानों के पास छोटे शेयर कम होते हैं। संस्थागत निवेशक चक्रीय मंदी से निजात पाने के लिए शेयर खरीद कर इंतजार भी कर सकते हैं। वहीं खुदरा निवेशकों के पास मिडकैप और स्मॉलकैप शेयर ज्यादा होते हैं और उन्हें भारी पूंजीगत नुकसान होने की भी आशंका अधिक होती है। जाहिर है मंदी के दिनों में वे घबराहट में बिकवाली करते हैं। इसके विपरीत तेजी के दिनों में वे अत्यधिक आशावादी हो जाते हैं। यही कारण है कि स्मॉलकैप और मिडकैप शेयर तेजी के दिनों में लार्जकैप शेयरों पर भारी पड़ते हैं। अधिकांश विश्लेषक मानते हैं कि अल्पावधि से मध्यम अवधि में मूल्य- अस्थिरता और बिकवाली की आशंका अधिक रहती है। मुद्रास्फीति निरंतर ऊंची बनी हुई है और हर प्रमुख केंद्रीय बैंक मौद्रिक सख्ती जारी रख सकता है। इतना ही नहीं आपूर्ति श्रृंखला की बाधा, चीन में लगे लॉकडाउन और यूक्रेन युद्ध के कारण वैश्विक वृद्धि के अनुमानों में भी कमी की गई है। बीते नौ महीनों में भारी बिकवाली के बाद विदेशी निवेशक सुरक्षा चाह रहे हैं। उभरते बाजारों को लेकर उन्हें निरंतर नकारात्मक सलाह दी जा रही है। इस श्रेणी के मूल्यांकन की दृष्टि से भारत का शेयर बाजार अब तक सबसे अधिक महंगा है। रुपये पर भी लगातार दबाव बना हुआ है क्योंकि व्यापार घाटा अधिक है और विदेशी निवेशक बिकवाली कर रहे हैं। सामान्य हालात में कमजोर रुपया निर्यात में तेजी लाता। बहरहाल निर्यात का प्रदर्शन बेहतर है और धीमी वैश्विक वृद्धि का अर्थ यह है कि मांग भी सहज होगी। सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों की शिकायत है कि मार्जिन पर दबाव है और उनके ग्राहक विवेकाधीन व्यय में कटौती कर रहे हैं। फार्मा उद्योग भी आपूर्ति श्रृंखला के मसलों से निपटने के लिए संघर्ष कर रहा है। धातु उत्पादकों की मांग में भी कमी आई है जबकि निर्यात कर ने भी उन्हें प्रभावित किया है। कुल मिलाकर भारत के निवेशक सतर्कता और आशावाद के मिलेजुले रुख का प्रदर्शन कर रहे हैं। घरेलू संस्थान इक्विटी म्युचुअल फंड और बीमा योजनाओं की बदौलत कुछ हद तक भारी भरकम विदेशी बिकवाली का मुकाबला करने में सफल रहे हैं। यह आवक जारी है जिससे पता चलता है कि कुछ खुदरा निवेशक दीर्घावधि में शेयरों को लेकर प्रतिबद्ध हैं। लेकिन खुदरा निवेशकों ने शेयरों की सीधी बिक्री भी जमकर की है। खुदरा निवेशकों के लिए एक दिक्कत यह है कि आकर्षक वैकल्पिक निवेश सीमित हैं। वास्तविक ब्याज दरें अभी भी नकारात्मक हैं जिससे डेट अनाकर्षक हुआ है। सोने की कीमतें भी अस्थिर हैं और डॉलर की मजबूती के कारण वे दबाव में रह सकती हैं। अगर खुदरा निवेशकों को और पूंजीगत नुकसान होता है तो भी उन्हें स्वयं पर नियंत्रण रखना होगा। वे लार्जकैप शेयरों पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं या गिरते बाजार में अच्छे शेयर चुन सकते हैं और सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) के माध्यम से विविध शेयरों में निवेश कर सकते हैं। व्यापक मंदी अक्सर व्यापक सुधार की ओर ले जाती है और एसआईपी इसलिए आदर्श हैं क्योंकि वे औसत मूल्य पर व्यापक शेयर पहुंच मुहैया कराते हैं।

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