धरती का तापमान 2 डिग्री भी बढ़ा तो गायब हो जायेंगी कई प्रजातियां

 

एबीएन नॉलेज डेस्क। जलवायु परिवर्तन की सच्चाई को लोग धीरे-धीरे अब स्वीकार कर रहे हैं। हालांकि, अब भी कुछ लोग हैं जो सवाल कर रहे हैं कि यह वास्तविक और मानव जनित है या नहीं। सच्चाई को जान चुकी संस्थाएं और देश इस आपदा की गति को धीमी करने की कोशिश कर रहे हैं। साथ ही समाधान और झूठी उम्मीदों के बीच के अंतर को भी समझ रहे हैं। जब तक तत्काल कदम नहीं उठाया जाता उत्सर्जन से अगले कुछ दशकों तक हमारे ग्रह के तेजी से गर्म होने की प्रक्रिया जारी रहने की आशंका है। जिससे पेरिस समझौते के तहत वैश्विक तापमान तय लक्ष्य के करीब पहुंच सकता है। बता दें कि पेरिस समझौते में वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री से दो डिग्री तक सीमित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसकी वजह से इस सदी के मध्य में उच्च तापमान की स्थिति होगी। फिर, विचार यह है कि वातावरण से ग्रीनहाउस गैसों को खींचने के लिए नई लेकिन अभी तक अप्रमाणित टेक्नोलॉजी और टेक्निक्स आखिरकार तापमान को एक सुरक्षित स्तर पर वापस लाएंगी। अब तक वैज्ञानिक इस बात को लेकर अनिश्चित हैं कि अस्थाई तौर पर पेरिस समझौते के तहत तापमान बढ़ने पर और उसके बाद दोबारा नीचे आने पर प्रकृति पर क्या असर होगा। टेंपरेचर बढ़ने के प्रभावों को समझने के लिए केपटाउन विश्वविद्यालय के रिसर्चर्स जोआन बेंटले, एंड्रियास एलएस मेयर और क्रिस्टोफर ट्रिसो ने रिसर्च स्टडी की है। शोधकर्ताओं ने पहली बार हमने धरती का तापमान इस एहतियाती सीमा से अधिक होने और दोबारा कम होने पर समुद्री और स्थलीय जीवों पर पड़ने वाले असर का अध्ययन किया। शोधकर्ता देख रहे हैं कि लक्षित तापमान दो डिग्री तक बढ़ने का सफर कितना हानिकारक होगा। नतीजों से संकेत मिलता है कि अस्थाई रूप से भी तापमान बढ़ने पर हजारों प्रजातियों के विलुप्त होने की लहर चलेगी और यह क्षति स्थाई होगी। अगर मानव इस दशक में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में बड़ी कटौती नहीं करता और बाद में उत्सर्जन को हटाने के लिए भविष्य की प्रौद्योगियों पर भरोसा नहीं करता है तो इस नतीजे की उम्मीद दुनिया कर सकती है। शोधकर्ताओं का अध्ययन मॉडल वर्ष 2040 से 2100 के बीच के 60 साल की अवधि में वैश्विक तापमान में दो डिग्री से अधिक वृद्धि का जलीय और स्थलीय जीवों की करीब 30 हजार प्रजातियों पर पड़ने वाले असर का आकलन करता है। उन्होंने देखा कि उनमें से कितनी प्रजातियां है जिनका प्रजनन और जीवन तापमान बढ़ने से प्रभावित होता है और उन पर यह खतरा कितना है। अगर तापमान में गिरावट भी आती है तो प्रकृति को नुकसान तेजी से होगा और धीरे-धीरे उसका असर समाप्त होगा। केवल कुछ वर्षों तक वैश्विक तापमान में वृद्धि दुनिया की अधिकतर प्रमुख पारिस्थितिकी को बदल सकती है। अमेजन घाटी का उदाहरण लें तो कुछ प्रजातियों पर वैश्विक तापमान स्थिर होने के बावजूद खतरा बना रहेगा जबकि कुछ प्रजातियां वर्ष 2300 के उत्तरार्ध तक इस खतरे का सामना करेंगी। यह इसलिए कि कुछ प्रजातियां जो उष्णकटिबंध के पास रहती है वे ऊष्मा को सहन करने की सीमा के नजदीक होते हैं और वे इसका सामना कर सकते हैं। इसलिए वे तापमान में मामूली बदलाव के प्रति संवेदनशील होते हैं और जब वैश्विक औसत तापमान वापस सुरक्षित स्तर पर आएगा तब स्थानीय तापमान में बदलाव देर से होगा। इस खतरे का परिणाम अपरिवर्तनीय होगा और उष्णकटिबंधीय वन सवाना घास के मैदान में तब्दील हो सकते हैं। दुनिया वैश्विक कार्बन को सोखने वाले अहम केंद्र को खो सकती है जिससे पृथ्वी के वायुमंडल में और अधिक गर्म करने वाली गैसों की मौजूदगी हो सकती है। पश्चिमी प्रशांत महासागर का कोरल त्रिकोण संपन्न समुद्री परिस्थिति की प्रजातियों का घर है जिनमें मूंगे की चट्टान बनाने वाली प्रजातियां, समुद्री कछुए, रीफ मछली और मैग्रोव के जंगल शामिल हैं। शोधकर्ताओं का मॉडल दिखाता है कि कुछ समुदाय, सभी या अधिकतर प्रजातियां इस खतरनाक स्थिति का एक साथ कम से कम कुछ दशकों और अधिकतर दो सदियों तक कर सकते हैं।

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