राष्ट्रपति चुनाव : अर्जुन मुंडा ने जनजातीय विधायकों व सांसदों से किया द्रौपदी मुर्मू के समर्थन का अनुरोध

 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। राष्ट्रपति पद की दौड़ में द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी को केवल ‘राजनीतिक चश्मे’ से नहीं देखे जाने पर जोर देते हुए केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा ने सभी आदिवासी विधायकों और दलों से राजनीति से ऊपर उठने और उनका समर्थन करने की अपील की। इस सप्ताह की शुरुआत में, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने देश के शीर्ष संवैधानिक पद के लिए भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के उम्मीदवार के रूप में 64 वर्षीय मुर्मू के नाम की घोषणा की थी। झारखंड की राज्यपाल मुर्मू निर्वाचित होने पर भारत की राष्ट्रपति बनने वाली पहली आदिवासी नेता होंगी, उनके चुने जाने की प्रबल संभावना है क्योंकि आंकड़े राजग के पक्ष में हैं। खुद एक आदिवासी नेता मुंडा ने मुर्मू के नामांकन को आदिवासी समुदाय के लिए बेहद खुशी और गर्व की बात करार दिया। मुंडा ने बताया, मुझे लगता है कि यह हमारी आजादी के 75वें वर्ष में देश के पूरे आदिवासी समुदाय के लिए सबसे बड़ा सम्मान है। मैं सभी आदिवासी विधायकों, सांसदों और आदिवासियों की राजनीति करने वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा जैसी दलों से अपील करता हूं कि उनका समर्थन करें। मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि उनके समर्थन की घोषणा करने में देरी क्यों हो रही है। शीर्ष संवैधानिक पद के लिए एक आदिवासी महिला को नामित करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नड्डा को धन्यवाद देते हुए, मुंडा ने कहा, यह निर्णय उन राजनीतिक दलों को बेनकाब करता है, जिन्होंने आदिवासियों के बारे में बहुत सारी बातें कीं और खुद के आदिवासी कल्याण के ध्वजवाहक होने का दावा किया, लेकिन उनके लिए किया कुछ नहीं। हमारे प्रधानमंत्री उनके बारे में बेहद संवेदनशील हैं। मुर्मू की उम्मीदवारी को राजनीति के चश्मे से नहीं देखने की नेताओं से अपील करते हुए मंत्री ने कहा, उन्हें पहले आदिवासी के रूप में देखा जाना चाहिए, और इसलिए, सभी को आगे आना चाहिए और अपना सम्मान व्यक्त करना चाहिए...। ओडिशा के पिछड़े क्षेत्र मयूरभंज से आने वाली मुर्मू को मृदुभाषी और मिलनसार नेता माना जाता है। मुर्मू ने पार्टी में विभिन्न पदों पर कार्य किया है और राज्य में बीजू जनता दल के साथ पार्टी के गठबंधन के दौरान वह मंत्री भी रहीं। संयोग से, उनके नाम पर 2017 में भी शीर्ष संवैधानिक पद के लिए भाजपा की संभावित पसंद के रूप में चर्चा हुई थी लेकिन तब पार्टी ने राम नाथ कोविंद को इस पद के दावेदार के तौर पर चुना था।

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