एबीएन हेल्थ डेस्क। बीमार होने पर डॉक्टर अलग अलग तरह की दवाएं देते हैं। कोई दवा गोली के रूप में पेट में जाती है तो कई बार इंजेक्शन रूप में लेना होता है तो कभी दवा को सीधे ही प्रभावित स्थान पर लगाया जाता है। लेकिन कई बार शरीर के किसी खास हिस्से में समस्या होने के लिए दवा ही खाई जाती है जो पेट में जाने के बाद उसी हिस्से में असर दिखाती लगती हैं। इसमें दर्द की दवाएं प्रमुख होती हैं। आखिर दवाओं को पता कैसे चलता है कि उन्हें शरीर के किस विशेष ही में जाना है। दवा विशेषज्ञ ने इस प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि आखिर होता क्या है। क्या खास हिस्से में ही जाती हैं दवाएं : क्या वाकई ऐसा होता है कि सिर दर्द या पीठ दर्द के लिए ली गई दवाएं सिर या पीठ में ही जाकर अपना असर दिखाती हैं। इसका स्पष्ट उत्तर नहीं में तो है, लेकिन दवाओं में खास तरह के रसायन डाल कर यह सुनिश्चित किया जाता है कि वे शरीर के किसी विशेष हिस्सों ज्यादा असर दिखा सकें और बाकी में कम। कुछ दूसरे तत्व भी : दरअसल दवाओं में केवल प्रभावित हिस्सों के लिए सक्रिय दवा के अलावा भी बहुत से दूसरे तत्व भी होते हैं। इनमें ये निष्क्रिया तत्व भी शामिल होते है, जो स्थिरता, दवा के अवशोषण, रंग, स्वाद, और अन्य गुणों को मजबूत करने के लिए डाले जाते हैं, जिससे दवा प्रभावी रूप से काम कर सके। मिसाल के तौर पर सिरदर्द के लिए ली जाने वाली मशहूर दवा एस्प्रिन में ऐसे तत्व भी होते हैं, जिससे ढुलाई के दौरान दवा टूटकर बिखरती नहीं है, जबकि ऐसी दवाएं मुंह में लेते ही घुलने लगती हैं। खास तरह से डिजाइन : कोलोराडो यूनिवर्सिटी में फार्मस्यूटिकल्स साइंसेस के प्रोफेसर टॉम एंकार्डोक्वे ने कंवर्शेसन्स में अपने लेख में बताया कि दवाओं में अन्य तरह के घटकों को डिजाइन कर विकसित कर दवा को शरीर के खास हिस्से में ज्यादा प्रभाव देने के लिए बनाया जाता है। इसे समझने के लिए दवाएं शरीर में जाकर कैसे काम करती हैं यह समझना जरूरी है। क्या होता है दवा के साथ : जब भी हम को दवा निगलते हैं, तो वह सबसे पहले पेट और आंतों में जाकर घुलती है। इसके बाद दवा के अणु खून के प्रवाह में मिल जाते हैं जिससे वे शरीर के हर अंग और ऊतकों में चले जाते हैं। दवा के अणु कोशिकाओं के उन बाध्यकारी रिसेप्टर्स को प्रभावित करते हैं, जो किसी विशेष प्रतिक्रिया को शुरू करते हैं। दवाओं के दुष्प्रभाव भी : हालांकि दवाओं को खास तरह के रिसेप्टर्स को ध्यान में रख कर ही डिजाइन किया जाता है, जिससे वांछनीय नतीजे मिल सकें, उन्हें खून के जरिए शरीर के अन्य हिस्सों में जाने से रोकना संभव ही नहीं होता है। इसी वजह से गैर जरूरी जगहों पर जाने से हमें दवा के साइडइफेक्ट्स देखने को मिलते हैं। दवा का असर समय के साथ हलका हो जाता है और वह पेशाब के जरिए बाहर भी निकल जाती है, इसीलिए कई दवाओं को खाने का बाद पेशाब में बदबू आती है तो कुछ दवाओं के लेने पर पेशाब का रंग ज्यादा पीला हो जाता है। खून के जरिए भी दवा : कुछ दवाएं ऐसी भी होती है जो पेट में घुलती ही नहीं है तो कुछ दवाएं बहुत ही धीमी गति से घुलती हैं। तो कुछ कम घुल पाती हैं जिससे उन्हें बार बार लेने की जरूरत होती है, तो वहां पेट की पाचन प्रक्रिया से गुजरने से बचाने के लिए कुछ दवाओं को सीधे खून में इंजेक्शन के जरिए डाला जाता है। जैसे कैंसर की ट्यूमर कोशिकाओं को मारने के लिए मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज में खास प्रोटीन होता है। अगर इस दवा को पेट के जरिए शरीर में पहुंचा जाए तो पेट अन्य प्रोटीन से उसे अलग नहीं देख पाता है। वहीं ओन्टमेंट्स यानि त्वचा के लिए क्रीम, आंखों के लिए आईड्रॉप या फेफड़ों के लिए इन्हेलर आदि से भी सीधे प्रभावित हिस्सों तक दवा को पहुंचाया जाता है। वहीं खाने वाली दवाओं को सही समय और सही मात्रा में लेना बहुत जरूरी होता है। ऐसे में डॉक्टर ही मरीज की स्थिति के अनुसार सही डोज क निर्धारण कर सकता है। वहीं कुछ दवा तभी लेना चाहिए जब मरीज को उसकी जरूरत महसूस होती है।
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