घोषणाओं के बाद साहसी और महत्त्वाकांक्षी समझी जा रहीं कंपनियां

 

एबीएन डेस्क (अजय सानी)। पिछले महीने कंपनी क्षेत्र में महज कुछ ही सप्ताहों के भीतर दो घोषणाएं हुर्इं। दोनों घोषणाओं का भारतीय उपभोक्ता बाजार के अतीत से संबंध था। टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स ने 5 मई को कहा कि वह व्यक्तिगत देखभाल खंड (पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स) खंड में दोबारा कदम रखने की योजना बना रही है। इसी तरह 25 मई को आई एक खबर में कहा गया कि हिंदुस्तान मोटर्स और प्यूजो के बीच संयुक्त उद्यम अगले दो वर्षों में एंबेसडर कार का नया और अधिक खूबियों वाला संस्करण पेश करेगा। इन घोषणाओं के बाद ये कंपनियां कम से कम साहसी और महत्त्वाकांक्षी अवश्य समझी जा सकती हैं। जब उपभोक्ता बाजार छोटा था उनका कारोबार काफी चमका था और ऊंचे शुल्क की वजह से भारतीय बाजार स्थानीय कंपनियों के लिए एक तरह से कारोबारी दृष्टिकोण से सुरक्षित था। हालांकि धीरे-धीरे बाजार की संरचना कारोबारी नियम-कायदों में काफी बदलाव हुआ है। नई ऐंबेसडर कार कैसी होगी इसकी कोई ठोस जानकारी किसी के पास नहीं है। हमें इतना जरूर मालूम है कि यह नई कार हिंदुस्तान मोटर्स के तमिलनाडु संयंत्र में बनेगी। इस नये संयंत्र पर अब सी के बिड़ला समूह की सहायक कंपनी का नियंत्रण है। यह परियोजना हिंदुस्तान मोटर्स की उस योजना से अलग है जिसके तहत वह इलेक्ट्रिक वाहन बनाएगी। हिंदुस्तान मोटर्स इलेक्ट्रिक वाहन कंपनी के पश्चिम बंगाल में उत्तरपाड़ा संयंत्र में बनाएगी। इस संयंत्र के लिए एक विदेशी साझेदार की तलाश कर रही है। पेट्रोल से चलने वाली पुरानी ऐंबेसडर कार 1950 के दशक की तकनीक पर आधारित थी। इस कार को उम्मीद से कहीं अधिक सफलता मिली थी मगर 2014 में इसका सुहाना सफर खत्म हो गया। हिंदुस्तान मोटर्स ने अपना यह ब्रांड प्यूजो को बेच दिया। प्यूजो भारत के कारोबारी बाजार में सबसे पहले कदम रखने वाली कुछ विदेशी कंपनियों में एक थी। ऐंबेसडर कार की दो विशेष खूबियां थीं। उनकी बनावट काफी मजबूत थी और दूसरी खासियत यह थी कि कोई खराबी आने पर मामूली से मामूली मैकेनिक भी उसे ठीक कर सकता था। बाद में स्पोर्ट्स यूटिलिटी व्हीकल(एसयूवी) के बाजार में उतरने के बाद तकनीक पेचीदा होती गई और मैकेनिकों के लिए भी नए हुनर सीखना जरूरी हो गया। एंबेसडर तेजी से सफलता की सीढ़ियां चढ़ रही थी और उस समय केवल प्रीमियर पद्मिनी उसे टक्कर देने वाली एकमात्र कार थी। प्रीमियर पद्मिनी फिएट तकनीक से बनाई गई थी। इसके बाद एक और कार आई जो छोटी थी और उसमें गियर बदलने के लिए कम ताकत का इस्तेमाल करना पड़ता था। इन खूबियों की वजह से यह ऐंबेसडर से उम्दा मानी जाने लगी थी। खरीदारों की लंबी कतार, जल्द डिलिवरी के लिए अतिरिक्त रकम और दूसरी कंपनियों को बाजार से दूर रखने की कवायद के बूते ये दोनों ही कंपनियां काफी मुनाफे में थीं। अपने शुरूआती दिनों में हिंदुस्तान मोटर्स का शेयर बाजार में सबसे महंगे शहरों में एक हुआ करता था। अस्सी के दशक की शुरूआत में मारुति ने बाजार में शानदार मुनाफे के साथ जब आगाज किया और हिंदुस्तान मोटर्स की बाजार हिस्सेदारी में सेंध लगाई तब भी ऐंबेसडर कार की खासी मांग थी। मगर धीरे-धीरे ऐंबेसडर की बाजार में पकड़ कमजोर होती गई। सरकार ने दूसरे मॉडल की कारें खरीदनी शुरू कर दी थी। यह ऐंबेसडर के प्रति घटते आकर्षण का एक स्पष्ट संकेत था। पहले ऐंबेसडर कारों के लिए एक ही बार में भारी भरकम आॅर्डर आते थे मगर बाद में यह सिलसिला कमजोर पड़ने लगा। ब्रिटेन और यूरोप में ऐंबेसडर की बिक्री बढ़ाने का पूरा प्रयास किया गया मगर यह ऐंबेसडर की रफ्तार बनाए रखने के लिए काफी साबित नहीं हुआ। इतिहास के पन्ने पलटने के बाद एंबेसडर के नए अवतार में लोगों की काफी दिलचस्पी हो सकती है। हो सकता है कि नया संस्करण एक बार फिर बाजार में छा जाए। आयशर के उदाहरण पर विचार किया जा सकता है जिसने रॉयल एनफील्ड ब्रांड के तहत मोटरसाइकिल उतारी और इससे कंपनी की किस्मत दोबारा चमक गई। एक प्रमुख अंतर यह है कि एनफील्ड एक अच्छा उत्पाद था मगर यह खराब प्रबंधन का शिकार हो गया। ऐंबेसडर के साथ जुड़ा एक पहलू यह भी था कि इसका कारोबार एक सीमित बाजार में होता रहा। ब्रांड की महत्ता दोबारा स्थापित करना ऐंबेसडर के नए संस्करण के लिए एक चुनौती होगी। देश में उदारीकरण के शुरूआती दिनों में ही टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट पर्सनल केयर कारोबार से बाहर निकल गई थी। टाटा आॅयल मिल कंपनी (टॉमको ) बेच दी गई और बाद में हिंदुस्तान यूनिलीवर ने लैक्मे कॉस्मेटिक ब्रांड खरीद लिया। उदारीकरण से पहले टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स के उत्पाद का लोगों में काफी रसूख हुआ करता था। वह ऐसा दौर था जब किसी को एक आयातित कैमे साबुन देना एक महंगा उपहार माना जाता था। टाटा आॅयल मिल कंपनी में बने साबुन जैसे हमाम और मोती उस समय कम दाम में अच्छे उत्पाद माने जाते थे और अच्छी पैकिंग में आते थे। तब एक मोटे ग्लास बोतल में नारियल तेल भी आया करता था और टाटा कुछ सुगंधित उत्पाद भी बनाया करती थी जो डियोड्रेंट की तरह भी काम करता था। उस समय भारत में डियोड्रेंट कर मिलना बड़ी बात हुआ करती थी। मोती साबुन उस समय महंगा समझा जाता था, खासकर सीमित पैसों में घर चलाने वाली महिलाओं के लिए यह एक बड़ा उत्पाद हुआ करता था। मगर किशोर एवं युवाओं को मोती साबुन रास नहीं आया करता था। अस्सी के दशक में पैदा हुए लोगों के लिए लैक्मे ब्रांड अब भी खासा मायने रखता है। विदेशी ब्रांडों की चमक के बावजूद मध्यम दायरे में आने वाला यह उत्पाद 80 के दशक के लोगों का पसंदीदा हुआ करता था। नमक एवं चाय की खुदरा बिक्री करने वाली टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स ने पर्सनल केयर श्रेणी को लेकर फिलहाल विस्तार से कुछ नहीं कहा है। मगर हम इतना जानते हैं कि यह टाटा ब्रांड के बूते बाजार में फिर अपनी धाक जमाना चाहती है। यह एक सुरक्षित दांव है, बशर्ते कंपनी नैनो की तरह कोई उत्पाद नहीं लाए जिसका अंत सुखद नहीं रहा। इलेक्ट्रिक वाहन अवतार में अपनी वापसी करने वाली चेतक स्कूटर की तरह ही दो पुराने स्थापित ब्रांडों का वापसी की योजना बनाना एक तरह से उन ब्रांडों का पुनर्जन्म हो सकता है जो आर्थिक सुधारों के बाद कमजोर या विलुप्त हो गए थे। ऊंचे शुल्क और आत्मनिर्भरता के नारे के बीच पुराने ब्रांडों को नए अवतार में उतारने के लिए पर्याप्त संभावनाएं नजर आ रही हैं।

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