योग और योगियों को ही ईश्वर मानते योगेश्वर

 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (नंदकिशोर)। योगियों की दुनिया विचित्र है। अद्भुत रहस्यों से भरी हुई। जिसे बिना समझे विचारे आँकना वैसा ही है जैसे काले गौगल्स पहन कर प्रकाश की न्यूनता पर टिप्पणी करना। और याद रहे, श्री कृष्ण योगेश्वर हैं—समस्त योग व योगियों के ईश्वर। श्री कृष्ण के परे क्या : जब श्री कृष्ण को योगेश्वर कहते हैं तो हमें उन्हें योग व योगियों का ईश्वर मानना ही होगा। उनसे बड़ा कोई नहीं, वे स्वयं कहते हैं मत्त: परतरं नास्ति कीन्चित अस्ति धनन्जय— मुझसे परे व बड़ा कोई नहीं, कोई नहीं, धनन्जय। तो अपने को विशिष्ट क्यों समझते हो? जब तक यह आत्म विशिष्टता रहेगी, तब तक आप आध्यात्म से कोसों दूर हो, भलेही सारा दिन राम-राम रटते हो। मैं और मेरा के वन में तुम्हारा राम भटक रहा है। ये मैं और मेरा जब भगवान के लिये हो जाता है तो आप अथाह समुद्र में कूप की भाँति हो जाते हो—यह समुद्र मैं हूँ या कहो मैं समुद्र में हूँ अब एक ही बात हो जाती है। यह ईश्वर मैं हूँ या मैं ईश्वर में हूँ में कहां अनंतर है। हाँ, एक को अद्वैत कहते हैं और दूसरे को भक्ति भाव और मेरे स्पष्टता के इस प्रयास को ज्ञान कहेंगे व इसके क्रीयान्वयन को योग। बात एक ही है, इसलिये भाषा के भेद जाल में ना फँसकर, सहजता से आत्मभाव में स्थिर रहो। जैसे गाड़ीवान के बैल को मारने पर रामकृष्ण परमहंस करहा कर गिर गये और उनकी पींठ पर डण्डे के निशान उभर आये। यह है आत्मभाव, जो शृष्टि के कण-कण के साथ आपकी सहज एकात्मता को अभिव्यक्त करता है। यही है श्री कृष्ण के कथन—सर्वभूतस्थत्मात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन: का सही अर्थ। मात्र कहने के लिये समदर्शन नहीं, उसे प्रत्यक्ष जीना है समदर्शन। यह तभी सम्भव है जब आप सकल ब्रह्माण्ड के साथ एकात्मा हौं, कहने के लिये नहीं, वास्तव में, प्रत्यक्ष रूप से। परन्तु अपने परिवार में ही तुम्हारा छोटा-मोटा समभाव है, उसके परे नहीं। कुछ एक का जीवों के साथ है पर समस्त जीवों के साथ नहीं। कोई कुत्ता देख बिदकता है, कोई साँप देख, कोई कौकरोच देख, और कोई छिपकली देख। वाह रे, तुम्हारा समभाव! अपने बच्चे और पत्नि से परे जा ही नहीं पाता है, और करुणावश चला भी जाए तो, वह दो पल से अधिक नहीं ठहरता, और भगवान को भजते हो, जिसका सबमें समभाव है। ये द्वन्द्व ही तुम्हें ईश्वर के सही स्वरूप से दूर रखे है। ईश्वर बस हमारे परिवार को आगे बढ़ाये, उसकी रक्षा करे और दूसरे का परिवार जाये भाड़ में । वाह रे आपका आध्यात्मिक ज्ञान। बोध व बुधत्त्व : जितना तुम्हारा बोध है उतने बुद्ध तुम हो। अपने बुद्धत्व को जाने बिना आप बुद्ध को नहीं समझ सकते। अपने बुद्धत्व को नकार कर किसी बाहरी बुद्ध की खोज तुम्हें अपने तक लाती रहेगी जब तक कि तुम स्वयं अपने बुद्धत्व को नहीं समझ लेते। अपनी बुराइयों को जानकर उनसे मुक्त होने का भाव बोध है।उनसे मुक्त हो जाना बुद्धत्व है। इसे जो शत प्रतिशत करता है, वह महावीर है, और जो हृदय से करने का प्रयास कर रहा है, वह संघ गामी है। संघ गामी का आशय, बुद्ध के भौतिक संघ की ओर गमन करने वाला नहीं, वरन प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष बुद्ध के सत्संग में जाने वाला है। सत्संग की सही व्यख्या श्री कृष्ण ने मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्त: परस्परं सूत्र द्वारा की है। संघ सत्संग है, जो मुझमें चित्त व अपनी ऊर्जा को लगाते हुये परस्पर मेरी ही बात करते हैं वे मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च —मुझमें, मेरे साथ ही सन्तुष्ट रहते हुये रमण करते हैं। यह है बुद्ध शरणं गच्छामि का सही अर्थ। शंखप्रक्षालन की एक क्रिया है। सभी प्रकार के उदर रोग तथा कब्ज मंदागिनी, गैस, अम्ल पित्त, खट्टी-खट्टी डकारों का आना एवं बवासीर आदि निश्चित रूप से दूर होते हैं। आंत, गुर्दे, अग्नाशय तथा तिल्ली सम्बन्धी सभी रोगों में लाभप्रद है। सर्वांगासन सर्वांगासन स्थिति:- दरी या कम्बल बिछाकर पीठ के बल लेट जाइए। विधि : दोनों पैरों को धीरे -धीरे उठाकर 90 अंश तक लाएं. बाहों और कोहनियों की सहायता से शरीर के निचले भाग को इतना ऊपर ले जाएँ की वह कन्धों पर सीधा खड़ा हो जाए। पीठ को हाथों का सहारा दें ... हाथों के सहारे से पीठ को दबाएं . कंठ से ठुड्ठी लगाकर यथाशक्ति करें फिर धीरे-धीरे पूर्व अवस्था में पहले पीठ को जमीन से टिकाएं फिर पैरों को भी धीरे-धीरे सीधा करें। लाभ:- थायराइड को सक्रिय एवं स्वस्थ बनाता है। मोटापा, दुर्बलता, कद वृद्धि की कमी एवं थकान आदि विकार दूर होते हैं। लाभ: मोटापा कम करने के आयुर्वेदिक उपाय एड्रिनल, शुक्र ग्रंथि एवं डिम्ब ग्रंथियों को सबल बनाता है। स्वस्तिकासन स्थिति:- स्वच्छ कंबल या कपड़े पर पैर फैलाकर बैठें। विधि : बाएं पैर को घुटने से मोड़कर दाहिने जंघा और ंिपडली (घुटने के नीचे का हिस्सा) और के बीच इस प्रकार स्थापित करें की बाएं पैर का तल छिप जाये उसके बाद दाहिने पैर के पंजे और तल को बाएं पैर के नीचे से जांघ और ंिपडली के मध्य स्थापित करने से स्वस्तिकासन बन जाता है। ध्यान मुद्रा में बैठें तथा रीढ़ सीधी कर श्वास खींचकर यथाशक्ति रोकें। इसी प्रक्रिया को पैर बदलकर भी करें। लाभ : पैरों का दर्द, पसीना आना दूर होता है। पैरों का गर्म या ठंडापन दूर होता है.. ध्यान हेतु बढ़िया आसन है। गोमुखासन गोमुखासनविधि:- दोनों पैर सामने फैलाकर बैठें। बाएं पैर को मोड़कर एड़ी को दाएं नितम्ब के पास रखें। दायें पैर को मोड़कर बाएं पैर के ऊपर इस प्रकार रखें की दोनों घुटने एक दूसरे के ऊपर हो जाएं। दायें हाथ को ऊपर उठाकर पीठ की ओर मुड़िए तथा बाएं हाथ को पीठ के पीछे नीचे से लाकर दायें हाथ को पकडेÞें.. गर्दन और कमर सीधी रहे। एक ओ़र से लगभग एक मिनट तक करने के पश्चात दूसरी ओर से इसी प्रकार करें। जिस ओ़र का पैर ऊपर रखा जाए उसी ओ़र का (दाए/बाएं) हाथ ऊपर रखें। लाभ : अंडकोष वृद्धि एवं आंत्र वृद्धि में विशेष लाभप्रद है। धातुरोग, बहुमूत्र एवं स्त्री रोगों में लाभकारी है। यकृत, गुर्दे एवं वक्ष स्थल को बल देता है।

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