एबीएन डेस्क, रांची। पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के प्रभारी रहे नेता जितिन प्रसाद के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने पर न तो कांग्रेस विचलित दिखी और न ही उसमें कोई बेचैनी देखने को मिली। तमिलनाडु के एक कांग्रेस सांसद कहते हैं, वह लगातार तीन चुनाव हारे। अंतिम चुनाव में तो उनकी जमानत तक जब्त हो गई। इसके बावजूद पार्टी ने उन्हें महत्त्वपूर्ण दायित्व सौंपा। उनका बाहर जाना बहुत बड़ी बात नहीं है। लेकिन उन्होंने कहा कि पार्टी के चिंतित होने की दूसरी बड़ी वजह है। वह पूछते हैं, मुकुल रॉय भाजपा से तृणमूल कांग्रेस में एक चुंबकीय शक्ति की वजह से लौटे। वह चुंबक हैं ममता बनर्जी। हमारा चुंबक कहां है? लगभग इसी समय पार्टी अध्यक्ष पद का चुनाव होना था (इसकी तय मियाद 30 जून तक थी)। कोविड-19 संकट के बीच यह कवायद अनियतकाल के लिए टाल दी गई और कांग्रेस कार्य समिति ने भी प्रक्रिया रोकने पर मुहर लगा दी। नेतृत्व परिवर्तन चाहने वाले कांग्रेस के 23 नेताओं के समूह की मुख्य मांग अब तक लंबित पड़ी है। समूह में शामिल एक पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा, हमें एक निर्वाचित कांग्रेस कार्य समिति की तत्काल जरूरत है, न कि मौजूदा की तरह नामित समिति की। हमने कभी अध्यक्ष को बदलने की बात नहीं की, हम केवल एक पूर्णकालिक नेतृत्व चाहते हैं जो दिखाई दे। यही कारण है कि पार्टी मनमाने निर्णयों की शिकार है और जवाबदेही पूरी तरह अनुपस्थित है। उदाहरण के लिए पार्टी सूत्रों का कहना है कि पश्चिम बंगाल में भारी हार के बावजूद किसी को जवाबदेह नहीं ठहराया गया। अधीर रंजन चौधरी अभी भी पीसीसी प्रमुख और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बने हुए हैं। एक साक्षात्कार में उन्होंने साफ कहा कि कांग्रेस की हार की एक वजह यह भी थी कि प्रचार अभियान में शीर्ष नेतृत्व अनुपस्थित था। उन्होंने कहा, दो रैलियों के बाद राहुल गांधीजी ने पश्चिम बंगाल आना बंद कर दिया क्योंकि कोविड के कारण हालात बिगड़ रहे थे। दूसरी ओर पार्टी नेता और केरल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रमेश चेन्निथला ने वीडी सतीशन को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने के बाद शिकायत की कि उन्हें पीठ पीछे पद से हटा दिया गया और शमिंर्दा किया गया। हालिया चुनाव के बाद विधानसभा में कांग्रेस के सदस्यों की तादाद कम हुई है। परंतु चेन्निथला पीसीसी प्रमुख नहीं थे, वह केवल नेता प्रतिपक्ष थे। उन्हें एक कद्दावर और प्रभावशाली कांग्रेस नेता माना जाता है जिसे कांग्रेस की राजनीति के मौजूदा दौर में अपने प्रतिद्वंद्वी उम्मेन चांडी का भी समर्थन हासिल है। चांडी ने नेता प्रतिपक्ष बने रहने के उनके दावे का समर्थन किया था। पार्टी पर्यवेक्षकों को इसमें राहुल गांधी के सहयोगी केसी वेणुगोपाल का हाथ नजर आता है जो स्वयं केरल से ताल्लुक रखते हैं। ठीक एक वर्ष पहले राजस्थान के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ बगावत का झंडा उठाया था और वह लगभग भाजपा में जाने ही वाले थे। यदि ऐसा होता तो गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार का गिरना तय था। हालात तब संभले जब उन्हें आश्वासन दिया गया कि उनकी चिंताओं को दूर किया जाएगा और उनके समर्थकों को मंत्रिपरिषद में जगह दी जाएगी। 10 महीने बाद अब पायलट दिल्ली में हैं और पार्टी से कह रहे हैं कि उनसे किए गए वादे निभाए जाएं। गहलोत मंत्रिमंडल में नौ जगह खाली हैं और पायलट उनमें से ज्यादातर मांग रहे हैं। जबकि खबरों के अनुसार गहलोत ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से कहा है कि वह स्वतंत्र विधायकों और उन अन्य लोगों की अनदेखी नहीं कर सकते जिन्होंने गत वर्ष पायलट की बगावत के समय उनका साथ दिया था। दूसरे शब्दों में कहें तो जुलाई 2020 का घटनाक्रम दोहराया जा सकता है। गहलोत को लगता है कि पार्टी के बाहर के लोग उनके प्रति पार्टी के लोगों से अधिक वफादार हैं। पायलट और उनके समर्थक इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे। कांग्रेस की राजस्थान इकाई के प्रमुख गोविंद सिंह डोटासरा ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा, पायलट कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं और पार्टी में कोई समस्या नहीं है। पार्टी के राजस्थान प्रभारी अजय माकन ने कहा है कि प्रदेश में जल्दी ही मंत्रिमंडल परिवर्तन होगा। परंतु हाल ही में एक सप्ताह से दिल्ली में डेरा डाले पायलट कहते हैं, 10 महीने बीत चुके हैं। मुझे यही कहा गया कि कदम उठाए जाएंगे लेकिन अब आधा कार्यकाल तो बीत चुका है और मुद्दे जस के तस हैं। बहुत खेद की बात है कि ढेर सारे पार्टी कार्यकर्ता जिन्होंने काम किया और जनादेश दिलाने में मदद की उनमें से अधिकांश की सुनवाई नहीं हो रही है। पंजाब का किस्सा भी ऐसा ही है। नेतृत्व परिवर्तन की मांग कर रहे नाराज नेता नवजोत सिंह सिद्धू के क्षेत्र अमृतसर में रातोरात ऐसे पोस्टर लग गए जिनमें उनकी मांग को खारिज करते हुए लिखा है: पंजाब दा इक ही कैप्टन यानी पंजाब का एक ही कैप्टन है। इन पोस्टर में मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह का जिक्र करते हुए लिखा है: हैशटैग कैप्टन फॉर 2022। इस बीच सिंह के प्रभाव वाले पटियाला में सिद्धू समर्थकों के पोस्टर नजर आए जिन पर लिखा है: सारा पंजाब सिद्धू दे नाल यानी सारा पंजाब सिद्धू के साथ और किसाना दी आवाज मांगदा है पंजाब गुरु दी बेअदबी दा हिसाब यानी किसानों की आवाज पंजाब गुरु की बेअदबी का हिसाब मांगता है। आलाकमान द्वारा नियुक्त राज्य सभा के नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खडगे के नेतृत्च वाली समिति जिसमें वरिष्ठ नेता जेपी अग्रवाल और पंजाब के प्रभारी महासचिव हरीश रावत शामिल हैं, वह अब तक दिक्कतों को दूर नहीं कर सकी है और न ही उसने रिपोर्ट सार्वजनिक की है। पंजाब में अगले वर्ष फरवरी/मार्च में चुनाव होने हैं। जी 23 के एक नेता कहते हैं, यह हालत उन राज्यों में है जहां हम सत्ता में हैं या मजबूत हैं। हमें सोचना होगा कि हम कहां जा रहे हैं।
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