एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ मेरी ग्रेस)। मोदी सरकार कोरोना संक्रमण में बगैर किसी बहानेबाजी के अपने सुधार कार्यक्रम में लगी है। अभी 1986 में बनी शिक्षा नीति के अनुसार ही शिक्षा व्यवस्था को संचालित किया जा रहा था। 1992 में इस नीति में कुछ बदलाव जरूर किया गया, पर उसे पर्याप्त नहीं माना जा रहा था। इसलिए भाजपा ने 2014 के अपने चुनाव घोषणा-पत्र में नई शिक्षा नीति लाने का भी अहम वादा किया था। सत्ता में आने के बाद उसने इस दिशा में कदम भी उठा दिया था। आखिरकार व्यापक सलाह-मशविरों और सुझावों के बाद के. कस्तूरीरंगन समिति द्वारा तैयार नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति घोषित कर दी गई है। स्वाभाविक ही इससे शिक्षा के क्षेत्र में अपेक्षित बदलाव की उम्मीद जागती है। नई शिक्षा नीति का मकसद स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा तक समय की मांग के अनुसार पाठ्यक्रमों में बदलाव और उसके जरिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युवाओं को प्रतस्पिर्धी परिवेश के लिए तैयार करना है। इससे युवाओं में कौशल विकास, नवोन्मेषी अनुसंधान और रोजगार के नए अवसर पैदा करने में मदद मिल सकती है। नई शिक्षा नीति का जोर विद्यार्थियों के व्यक्तित्व और कौशल विकास के लिए शिक्षकों के प्रशिक्षण पर भी है। इसके अलावा शिक्षा खर्च को छह फीसद तक ले जाने का संकल्प है। अब मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदल कर फिर से शिक्षा मंत्रालय हो गया है। हमारी प्रतिस्पर्धा अब वैश्विक हो गयी है। यूपीए सरकार के समय ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था विकसित करने की बात उठी थी। उसके अनुसार शिक्षा क्षेत्र में बदलाव लाने और रोजगारोन्मुख शिक्षा प्रणाली बनाने का संकल्प लिया गया था। मगर इस दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो पाई थी। फिर हमारे देश में जिस तरह शिक्षा क्षेत्र में विषमता बढ़ती गई है, उसमें बुनियादी शिक्षा और फिर उच्च शिक्षा के स्तर पर व्यावहारिक बदलाव करने की मांग उठती रही है। फिलहाल सरकारी और निजी शिक्षण संस्थानों की पढ़ाई-लिखाई के स्तर और सुविधाओं में बहुत बड़ा अंतर नजर आता है। इसे लेकर व्यापक सामाजिक असंतोष भी देखा जाता है। इस अंतर को पाटना बहुत जरूरी है। फिर उच्च शिक्षा के स्तर पर हमारे देश के विश्वविद्यालय पढ़ाई-लिखाई के तरीके, अनुसंधान, सुविधाएं आदि के पैमाने पर दुनिया के विश्वविद्यालयों के सामने फिसड्डी साबित होते रहे हैं। इस स्थिति से उबरने की जरूरत भी रेखांकित की जाती रही है। अब उच्च शिक्षा केवल सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों के तहत विद्यार्थियों को एक से दूसरे देशों में भेजने का मामला नहीं रह गया है। यह व्यावसायिक मामला भी है। नई शिक्षा नीति में इसे ध्यान में रखते हुए सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों को प्रोत्साहित और विकसित करने की रूपरेखा तैयार की गई है। नई शिक्षा नीति में इस बिंदु पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित किया गया है। फिर पाठ्यक्रमों का स्वरूप रोजगार और विशेष योग्यता अर्जित करने, अनुसंधान आदि के आधार पर तैयार करने पर जोर दिया गया है। दरअसल, अब शिक्षा प्रणाली को न सिर्फ अपने देश की, बल्कि वैश्विक जरूरतों के मुताबिक ढालना बहुत जरूरी है, ताकि विज्ञान, तकनीकी शिक्षा, सामाजिक विज्ञान आदि क्षेत्रों में प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का मौका मिल सके। नई शिक्षा नीति से यह मकसद सध सकता है। संघ भी खुश और शिक्षाविद भी...: नई एजुकेशन पॉलिसी का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए इसरो के पूर्व प्रमुख के कस्तूरीरंगन की कमेटी ने देशभर की अलग-अलग संस्थाओं से जानकारियां लीं। इनमें एक बड़ी आवाज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की भी रही। बताया गया है कि आरएसएस से जुड़े कुछ लोगो भी शिक्षा नीति की ड्राफ्टिंग में शामिल रहे हैं। इसके लिए बकायदा संघ के कार्यकतार्ओं, भाजपा शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री, सरकार के प्रतिनिधि और शिक्षा नीति के ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष की मुलाकात भी हुई। भाषा के फॉर्मूले पर: हालांकि, केंद्रीय कैबिनेट ने जिस शिक्षा नीति को मंजूरी दी है, उसमें सरकार बीच का रास्ता अपनाती दिखी है। माना जा रहा है कि संघ के सुझाव के मुताबिक ही एचआरडी मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय करने पर सहमति बनी। संघ की अन्य कई मांगों पर केंद्र सरकार ने दूरी बना ली। खासकर बच्चों के लिए एक स्टेज पर तीन भाषाओं के फॉमूर्ले के प्रस्ताव पर। केंद्र सरकार ने उस प्रावधान को महत्व नहीं दिया है, जिसमें हिंदी को 6वीं क्लास के बाद अनिवार्य भाषा करार दिया गया था। खासकर तमिलनाडु के राजनीतिक दलों के विरोध के बाद, जिन्होंने इसे हिंदी को थोपने की तरकीब बताया था। लेकिन केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार को जिस ड्राफ्ट को मंजूरी दी, उसमें भाषाई मामलों के लिए राज्यों को ज्यादा छूट दी गई है और कहा गया है कि किसी भी राज्य पर कोई भाषा नहीं थोपी जाएगी। यानी छात्र जो भाषा सीखेंगे वो राज्य सरकार, क्षेत्र और खुद छात्रों का चुनाव होगा, जब तक तीन में से दो भाषाएं स्थानीय ही होंगी। विदेशी यूनिवर्सिटी के फॉर्मूले पर: दूसरी तरफ आरएसएस से जुड़े संगठन स्वदेशी जागरण मंच के कड़े विरोध के बावजूद नई शिक्षा नीति में विदेशी यूनिवर्सिटियों के लिए भारत में कैंपस खोलने का प्रावधान जोड़ा गया है। हालांकि, इसके साथ ही आरएसएस की भारत के प्राचीन ज्ञान पर जोर देने की बात को नई नीति में रखा गया है। ड्राफ्ट में कहा गया है कि इस तरह के तत्व छात्रों को स्कूली पाठ्यक्रम के जरिए सही और वैज्ञानिक जरियों से ही पढ़ाए जाएंगे। नई शिक्षा नीति पर आरएसएस से जुड़े लोगों ने कहा कि उनकी मांगों को माना गया और वे नई नीति से काफी खुश हैं। (लेखिका उर्सूलाइन इंटर कॉलेज की प्राचार्या हैं।)
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