एबीएन डेस्क, रांची। रांची का प्रेस क्लब इन दिनों सुर्खियों में है। जिसपर कभी वसूली तो कभी अय्यासी का अड्डा होने का आरोप भी लगाया जा रहा है। हालांकि एबीएन न्यूज़ 24 की टीम ने जब इस बवाल का सच जानने की कोशिश की तो माजरा कुछ और निकला। प्रेस क्लब की कमेटी के एक सदस्य ने बताया कि द रांची प्रेस क्लब एक हजार पत्रकारों की संस्था है। प्रेस क्लब के अस्पताल संचालक, पैसे की उगाही जैसी खबरें गांडीव अखबार में प्रकाशित हुई हैं। गांडीव ने 4 जून के अंक में प्रेस क्लब में चल रहे अस्पताल के इंतजाम व वसूली की खबर प्रकाशित की। बताया गया कि अस्पताल में वैंटिलेटर या आईसीयू जैसी सुविधाएं नहीं हैं। यहां स्पष्ट करना चाहूंगा कि अप्रैल महीनें में अस्पतालों में बेड, आक्सीजन की कमी थी। ऑक्सीजन वाले बेड नहीं मिलने से कई लोग मरे। दूसरी लहर में मरने वालों में 30 पत्रकार थे।ऐसे में क्लब के सदस्यों का भारी दबाव था कि प्रेस क्लब में कोविड सेंटर खोला गया। सरकार से पत्राचार के बाद क्लब को पत्रकारों के लिए सुविधाएं नहीं मिली। ऐसे में एनजीओ मिशन ब्लू फाउंडेशन इस दिशा में सामने आया। पत्रकार व उनके परिजनों को बेड की कमी के कारण जान न गवानी पड़े व हेल्थ सपोर्ट सिस्टम के तौर पर हम काम करें, इसके लिए 40 ऑक्सीजन युक्त बेड तैयार किया गया। 11 मई को क्लब के सदस्य सुनील सिंह की मौत के बावजूद विषम परिस्थितयों में 12 मई को अस्पताल खोला गया। 4 जून की खबर में जिक्र था कि अस्पताल में कोई मरीज नहीं था, जाहिर है जब रिम्स और सदर जैसे अस्पतालों में मरीज नहीं जा रहे, कोविड की लहर कमजोर पड़ चुकी है तब प्रेस क्लब में भला मरीज कैसे रहते। क्या संपादक जी चाहते हैं कि पत्रकार साथी बीमार रहते और अस्पताल में पड़े रहते। वसूली पर अखबार से मांगा गया जबाव, लेकिन जवाब नहीं : गांडीव ने खबर प्रकाशित की है कि प्रेस क्लब अस्पताल के नाम पर वसूली हो रही है। लेकिन अबतक एक ऐसा शख्स नहीं आया, जिसने ये कहा हो कि प्रेस क्लब को किसी ने पैसे दिए या प्रेस क्लब के अस्पताल के नाम पर किसी से ठगी की गई हो। आम लोगों पाठकों और पत्रकारों से ही अपील है कि अगर उन्हें कोई व्यक्ति या संस्था मिले जिससे क्लब ने उगाही की हो, तो उसकी जानकारी क्लब के अध्यक्ष या सचिव जरूर दें। अखबार से भी प्रेस क्लब ने ये जानकारी मांगी थी, लेकिन वसूली के संबंध में अखबार ने कोई तथ्य उपलब्ध नहीं कराया। अखबार के संपादक ने पंकज सोनी के एकाउंट में एक संस्था के द्वारा पैसे डालने संबंधी एक मैसेज उपलब्ध कराया है, जाहिर है एनजीओ ने चेक के जरिए पैसे लिए हैं, लेकिन प्रेस क्लब को वसूली संबंधी साक्ष्य चाहिए जो अखबार या उसके संपादक मुहैया नहीं करा रहे। अब बात कमरे में रासलीला के प्रचार की : प्रेस क्लब के द्वारा 3 कमरे डाक्टरों व मेडिकल स्टाफ के इस्तेमाल के लिए दिए गए थे। अस्पताल के एमडी व उनके साथ की स्टाफ एक कमरे में थे। क्लब के कैंटीन संचालक कृष्ण गोपाल तिवारी ने इसकी सूचना क्लब के कैंटीन ग्रुप में दी थी। इस सूचना पर क्लब के कोषाध्यक्ष जयशंकर मौके पर पहुंचे।लेकिन वहां पहुंचने के बाद उन्होंने कुछ आपत्तिजनक नहीं पाया, इसकी सूचना भी उन्होंने कमेटी के ग्रुप में दी। ये प्रोपोगेंडा क्यों : प्रेस क्लब की दूसरी कमेटी मे कई युवा साथी है, कोविड में संक्रमित होने के बाद भी साथियों ने पूरे जज्बे से अपनी सक्रियता दिखायी। 30 पत्रकारों की मौत के बाद पत्रकारों को फ्रंट लाइन वारियर घोषित करने को लेकर क्लब आंदोलन कर रहा था। जाहिर है आंदोलन को तोड़ने वाली शक्तियां भी यहां सक्रिय थीं। विभिषण, जयचंद और मीरजाफर हमारे बीच ही हैं। कहां से आए पैसे : कोविड के दूसरे लहर के बाद बेरमो विधायक अनूप सिंह ने मृत पत्रकारों के परिजनों की सहायता के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के जरिए 5 लाख की डीडी सौंपी थी। 1.50 लाख रुपये की मदद असर संस्था ने की थी, वहीं 51 हजार का चेक रांची के समाजसेवी मुनचुन राय ने क्लब को सौंपा था। अगर ये वसूली है तो क्लब ने वसूली की।
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