भाषाई विवाद पैदा कर रही है हेमंत सरकार : युवा जागृति केंद्र पलामू

 

टीम एबीएन, रांची। भारत में भाषा के प्रति सार्वजनिक राजनीति के नजरिए का एक वह दौर भी था,जब दक्षिण में लोगों को स्वतंत्रता संघर्ष में उत्तर के लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के लिए अभिप्रेरित करने हेतु महात्मा गांधी ने भाषागत कठिनाइयों को दूर करने का निर्णय लिया और तमिलनाडु में हिंदी के प्रचार- प्रसार के लिए अपने पुत्र देवदास गांधी को चेन्नई भेजा। देवदास गांधी को इस प्रयोजन हेतु तमिलनाडु के सबसे बड़े सार्वजनिक चेहरे चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के यहां रहकर अपना काम करना था।वह न सिर्फ चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के यहां ठहरे बल्कि उनकी पुत्री  से भावनात्मक रूप से जुड़े और बाद में उन दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया। समसामयिक इतिहास के वर्तमान दौर में राजनीति लोगों को आपस में लड़ाने, बांटने का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहती।बंटवारा-धर्म संप्रदाय के नाम पर हो,जाति के नाम पर हो,अगड़ा-पिछड़ा के नाम पर हो,आदिवासी-गैर आदिवासी के नाम पर हो,भाषाई आधार पर हो या कोई और आधार हो। हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झारखंड सरकार ने अपने एक निर्णय से भाषाई विवाद पैदा कर दिया है। अभी तक झारखंड लोक सेवा आयोग द्वारा ली जाने वाली प्रतियोगिता परीक्षा के लिए भाषा के दो पत्र हुआ करते थे।एक पत्र राष्ट्रभाषा हिन्दी का होता है, दूसरा भाषाई पत्र मातृभाषा का होता है, जिसमें वैकल्पिक तौर पर हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू,बंगाली, उड़िया, मैथिली, संथाली, मुंडारी, कुड़ुख, हो आदि थी। हेमंत सोरेन सरकार ने अपने ताजा सरकारी निर्णय द्वारा हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत को भाषाओं की इस सूची से बाहर कर दिया है। जब विरोध हुआ तो जिला स्तरीय पदों की बहाली के लिए हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत को पुनर्स्थापित कर दिया गया,लेकिन झारखंड लोक सेवा आयोग से विज्ञापित होने वाले प्रदेश स्तरीय रिक्तियों के लिए हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत को पुनर्स्थापित नहीं किया गया,जो एक भाषाई विवाद का कारण बन रहा है। इस निर्णय का मूल्यांकन अलग झारखंड के लिए दशकों चले लंबे जनसंघर्ष के ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में जानने-समझने की जरूरत है। आदिवासी समुदाय के लिए अलग प्रदेश-झारखंड-की मांग सबसे पहले छोटानागपुर उन्नति समाज ने 1915 में की थी।1938 में जयपाल सिंह मुंडा ने आदिवासी महासभा का गठन किया था,जिसने अलग झारखंड प्रदेश की मांग की। इसके लिए जयपाल सिंह मुंडा ने झारखंड पार्टी का गठन भी किया, लेकिन 1963 में वे खुद कांग्रेस में शामिल हो गए। झारखंड संघर्ष के लिए एन ई होरो, सुशील कुमार बागे, बागुन सोंब्रई और रामदयाल मुंडा,निर्मल महतो जैसे नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।इस प्रयोजनार्थ आंदोलनात्मक सक्रियता के ल्ल2ष्टिकोण से झारखंड मुक्ति मोर्चा का सांगठनिक महत्व बहुत ज्यादा है,जिसके संस्थापक अध्यक्ष विनोद बिहारी महतो थे। झारखंड राज्य के गठन का सबसे ज्यादा श्रेय और राजनैतिक लाभ झारखंड मुक्ति मोर्चा, उसके नेता दिशोम गुरू यानि शिबू सोरेन और उनके परिवार को मिला।झारखंड आंदोलन के दौरान शिबू सोरेन ने समाज के एक वर्ग को दिकू घोषित कर निशाने पर रखा था। दिकू को उन्होंने सुपरिभाषित नहीं किया था, लेकिन वर्तमान झारखंड में रह रहे कई वर्ग आतंकित और आशंकित रहे कि कहीं उन्हें दिकू घोषित न कर दिया जाए। पलामू के साहित्यकार,पत्रकार, संस्कृतिकर्मी रामेश्वरम जी झारखंड आंदोलन के समानांतर पलामू को केन्द्र शासित प्रदेश घोषित करने के लिए बौद्धिक आंदोलन चलाते थे।उनको लगता था कि झारखंड आंदोलन में आदिवासियों का प्रभुत्व है, और भावी झारखंड में गैर-आदिवासी वर्गों की उपेक्षा का खतरा है। पलामू में उत्साही युवाओं की टीम का नेतृत्व राजन कुमार सिन्हा करते हैं।इस टोली ने 18दिसंबर,2010से छात्रों-युवाओं को युवा जागृति केन्द्र के बैनर तले संगठित करना शुरू किया था। यह संगठन किसी राजनैतिक दर्शन विशेष से प्रभावित नहीं है। रक्तदान शिविर से लेकर नेकी की दीवार शिविर के माध्यम से जाड़े के दिनों में गरीबों को नए-पुराने गर्म कपड़े उपलब्ध कराने तक, भगत सिंह शहादत समारोह के आयोजन से लेकर मेदिनीनगर (डाल्टनगंज) के स्तर पर चंपारण शताब्दी समारोह के आयोजन तक,या फिर छात्रों-युवाओं के मुद्दे पर विचार गोष्ठियों के आयोजन तक युवा जागृति केन्द्र की सकारात्मक और रचनात्मक भूमिका रही है। आरंभिक वर्षों में युवा जागृति केन्द्र की गतिविधियां प्रमंडलीय मुख्यालय मेदिनीनगर (डाल्टनगंज) तक सीमित थीं, लेकिन हाल के वर्षों में इसने अपनी गतिविधियों का प्रचार, प्रसार और विस्तार पलामू के सुदूर पंचायतों तक किया है। हेमंत सरकार की भाषाई नीति पर अपना नजरिया स्पष्ट करते हुए युवा जागृति केंद्र के अध्यक्ष राजन कुमार सिन्हा कहते हैं कि वह इस बात से पूर्णत: सहमत हैं कि झारखंड में संथाली, मुंडारी, कुड़ुख, हो, उड़ीया, बंगला, मैथिली, भोजपुरी, मगही,अंगिका जैसी क्षेत्रीय भाषाओं का विकास हो। लेकिन, झारखंड लोक सेवा आयोग द्वारा विज्ञापित होने वाले पदों के लिए होने वाली प्रतियोगिता परीक्षा से मातृभाषा के तौर पर हिन्दी का हटाया जाना उन छात्रों-युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ है,जो हिन्दी को मातृभाषा के रूप में प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करते हैं।वह कहते हैं कि यह हेमंत सरकार की भाषाई नीति का इसलिए विरोध कर रहे हैं कि हिन्दी को मातृभाषा के तौर पर अस्वीकार किया जाना कहीं न कहीं राष्ट्रभाषा के तौर पर हिन्दी का अपमान है और सरकार की इस नीति से संथाली, मुंडारी, कुड़ुख, हो, उड़ीया, बंगला, मैथिली भाषाओं का कोई कल्याण, प्रचार, प्रसार और विस्तार कतई नहीं हो रहा है।तमाम भारतीय भाषाओं के बीच राष्ट्रभाषा के तौर पर हिन्दी की भूमिका बड़ी बहन की है और तमाम अन्य मातृभाषाएं उसकी छोटी बहनें हैं।र ाष्ट्रभाषा के तौर पर हिन्दी का प्रचार, प्रसार और विस्तार में अन्य मातृभाषाओं का कल्याण अन्तर्निहित है। हिन्दी की उपेक्षा अन्य मातृभाषियों के प्रति एक विद्वेष पैदा कर रहा है। आशीष भारद्वाज स्पष्ट करते हैं कि उनका किसी अन्य भाषा अथवा बोली से कोई विरोध नहीं है, उन सभी भाषाओं के प्रचार,प्रसार और विस्तार में उनकी गहरी अभिरुचि है।उनका विरोध सिर्फ इस बात से ही हिंदी को मातृभाषा के तौर पर तैयारी कर रहे प्रतियोगियों को अन्य मातृभाषा में तैयारी करने के लिए बाध्य न किया जाए।वह बताते हैं कि विगत 8मार्च को युवा जागृति केन्द्र के बैनर तले ढाई-तीन हजार छात्रों-युवाओं ने एक प्रभावशाली रैली निकाली थी, प्रमंडलीय मुख्यालय के विभिन्न सड़कों से यह मार्च गुजरा और इसने आमजनों का ध्यान आकृष्ट किया है। पलामू के स्तर पर लोग युवा जागृति केन्द्र की भाषाई नीति का पुरजोर समर्थन कर रहे हैं।यह सहयोग, समर्थन और शुभकामना युवा जागृति केन्द्र को प्रदेश सरकार की भाषाई नीति के खिलाफ आन्दोलन करने के लिए अभिप्रेरित कर रहा है।रविवार 3अप्रैल,2022को आयोजित गोष्ठी पलामू के साहित्यकारों, पत्रकारों,संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों का सहयोग,समर्थन और शुभकामना प्राप्त करने की विनम्र कोशिश मात्र है।इन विशिष्ट गुरुजनों से आशानुकूल रिस्पांस मिला है।अब युवा जागृति केन्द्र का आन्दोलन अगले चरण में प्रवेश करेगा।

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