टीम एबीएन, रांची। सरहुल का महीना महज एक त्योहार के रूप में सामने नहीं आता है। बल्कि एक पूरी सामाजिक जिंदगी इस दौरान बदलाव के दौर से गुजरती है। राजधानी समेत राज्यभर के ग्रामीण इलाकों में इस दौरान मिट्टी के घरों की रौनक देखते ही बनती है। आइये जानते हैं कि आखिर रांची के ग्रामीण इलाकों में मिट्टी के घरों से क्या है सरहुल का कनेक्शन। दरअसल, जो प्रकृति के साथ चलता है, प्रकृति हमेशा उसके साथ चलती है, कुदरत के साथ इंसान के इसी रिश्ते को जाहिर करता है सरहुल। रांची के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों आदिवासी परिवार अपने मिट्टी के घरों को एक नया रूप नयी शक्ल देने की कोशिश में जुट गये हैं। कोई सालभर बाद अपने घरों की खपरैल को बदलता नजर आ रहा है तो कोई मिट्टी के घरों की अंदर और बाहर से लिपाई और पुताई करता हुआ मग्न दिख रहा है। दरअसल, ये तैयारी 4 अप्रैल को प्रकृति पर्व सरहुल को लेकर है। रांची के नगड़ी प्रखंड के आदिवासी बहुल कोटा गांव की रेणु तिर्की बताती हैं कि में घर के पुरुष जहां घरों की छत को दुरुस्त करने में जुटे हैं तो महिलाएं घरों की दीवारों पर मिट्टी लेप चढ़ाती नजर आ रही है। वे बताती हैं कि कोरोना का संक्रमण कम होने के बाद इस बार की सरहुल खास है। क्योंकि गांव में सभी लोग एक-दूसरे के घर जाकर उनकी मदद कर रहे हैं। इन मिट्टी के घरों की खासियत ये भी है कि बढ़ती गर्मी में भी इस घर के अंदर बेहद ही शीतलता का एहसास होता है। आपको पक्के मकानों की तरह मिट्टी के घरों में एसी की जरूरत नहीं पड़ती। बाहर से धूप लगने के बाद भी अंदर प्रवेश करने पर आपको अचानक ठंड का एहसास होता है। रांची के नगड़ी प्रखंड के आदिवासी बहुल कोटा गांव में तमाम मिट्टी के घरों को मिट्टी से ही मजबूती देने का काम जोर शोर से चल रहा है। ग्रामीण आदिवासी महिलाएं विरासत में मिली परंपरा की सीख को दीवार पर उकेरती नजर आ रही हैं। ये घर गुजरे हुए कल की तस्वीर भी खूबसूरती से पेश करते हैं। घर में बने मिट्टी के चूल्हे, सामान रखने के लिए बना दीवार पर ताखा ऐसी कहानियों को बयां करते हैं, जिन्हें हम शायद काफी पीछे छोड़ आए हैं। लेकिन प्रकृति से जुड़ी आदिवासी परंपरा और संस्कृति ने उसे मजबूती से पकड़ रखा है। हालांकि आदिवासी संस्कृति का अब तेजी से शहरीकरण भी होता जा रहा है। ग्रामीण इलाकों से निकले कई आदिवासी परिवारों ने शहरों में भी अपना पक्का मकान बना लिया है। लेकिन, उनकी जड़ें आज भी सरहुल पर उन्हें अपने मिट्टी के मकान की याद दिलाती हैं। इसलिए कई परिवार ऐसे भी हैं, जो गर्मी के दिनों में स्कूलों की छुट्टियां होने के बाद मिट्टी के घरों में रहने के लिए अपने गांव लौट आते हैं।
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