टीम एबीएन, पटना। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के द्वारा 157 साल पुराने अनुमंडल बाढ़ को जिला बनाए जाने की संभावना पर सरगर्मी बढ़ गई है। जिला बनाने के सवाल पर पिछले 30 सालों से राजनीतिक रस्साकशी चल रही है। कई बार भरोसा दिया गया लेकिन उसे पूरा नहीं किया गया। इस बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के द्वारा संकेत दिए जाने से जिला बनने की संभावना बढ़ गई है। बाढ़ को जिला बनाने के लिए पिछले तीन दशक से आंदोलन जारी है। 22 मार्च 91 को क्षेत्रीय जनता की मांग पर बाढ़ को संयुक्त बिहार का 51वां जिले का दर्जा बनाने की अधिसूचना राज्य सरकार द्वारा जारी की गई थी। 2 अप्रैल 91 को बाढ़ जिला का उद्घाटन आनन-फानन में कर दिया गया। नए जिले के पहले जिला अधिकारी के रूप में पटना के तत्कालीन जिला पदाधिकारी अरविंद प्रसाद ने अनुमंडल मुख्यालय में राष्ट्रीय ध्वज फहराकर कामकाज की विधिवत शुरुआत की। इसी बीच राजनीतिक दांवपेच के कारण विरोध शुरू कर दिया गया। इस दौरान जिले के सभी सरकारी दफ्तरों को आदेश दिया गया था कि तत्काल प्रभाव से बाढ़ जिले का उल्लेख अपने कामकाज में करें। दूसरी तरफ तत्कालीन बाढ़ के विधायक और राजभाषा मंत्री विजय कृष्ण ने बाढ़ को जिला बनाने के मुद्दे पर हुए विरोधाभास के कारण इस्तीफा दे दिया था। स्थानीय सांसद नीतीश कुमार और विधायक विजय कृष्ण के बीच छत्तीस का आंकड़ा होने के कारण मामला तूल पकड़ लिया और महज 3 दिनों के भीतर अधिसूचना को राज्य सरकार के द्वारा स्थगित कर दिया गया। बाढ़ को जिला बनाने के लिए अधिवक्ता संघ ने भी हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया लेकिन बात नहीं बनी। बाद में राज्य सरकार ने स्थगित अधिसूचना को हमेशा के लिए रद्द कर दिया था। प्रदेश जदयू उपाध्यक्ष विधान पार्षद संजय सिंह ने कहा है कि बाढ़ के लोगों का दिल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर से जीत लिया। बाढ़ की जनता अब आजीवन नीतीश कुमार की आभारी रहेगी। 70 के दशक से लगातार बाढ़ को जिला बनाने मांग चल रही थी। लेकिन लालू यादव के शासनकाल में इसे कभी पूरा नहीं किया गया। जदयू नेता ने कहा कि मुख्यमंत्री ने बाढ़ के लोगों का मान-सम्मान-अभिमान को बरकरार रखते हुए यह घोषणा कर दी कि जल्द बाढ़ जिला बनेगा। बाढ़ को जिला बनाने का संघर्ष 70 के दशक में शुरू हुआ और 22 मार्च 1991 को संयुक्त बिहार का 51वां जिला बनाने की घोषणा हुई। 1 अप्रैल को इसका औपचारिक उद्घाटन तत्कालीन डीएम अरविंद प्रसाद ने किया। लेकिन, 2 अप्रैल 1991 को ही यह फैसला रद्द हो गया। तब से ये मांग जारी है।
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