एबीएन डेस्क, रांची (बासुकी)। सरयू राय उन नेताओं में से हैं जिन्हें भारतीय जनता पार्टी ने बर्दाश्त नहीं किया। एक बुद्धिजीवी और सामाजिक समझ रखने वाले इस बिहारी नेता को झारखंड की राजनीति का चाणक्य कहा जाता है। पशुपालन घोटाले के विरोध से लेकर आज तक उनकी छवि एक नीति परख नेता की रही है। विगत रघुवर सरकार में जिस प्रकार रघुवर दास से ठन गयी और उन्हें जमशेदपुर में टिकट तक नहीं दिया गया, उसका बदला उन्होंने भाजपा के अब तक के सबसे दबंग सीएम रघुवर दास को हरा कर ले लिया। संघ की विचारधारा से रचे बसे और झारखंड में पके सरयू राय की राज्य के सीएम पद पर नजर है। हालांकि वे इसके योग्य भी हैं। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन जिस प्रकार वे केजरीवाल से मिल रहे हैं। उससे झारखंड में एक मजबूत गठबंधन की उम्मीद बंधी है, जो राज्य में सुदेश महतो के सहयोग से बन चुकी है। यह तय है कि वे अपनी संघ की विचारधारा को छोड़ना भी पसंद नहीं करते हैं, लेकिन राजनीति में अपनी लंबी सक्रियता में जो अनुभव है उसके आधार पर वे राजनीति के सभी गुर जानते हैं, जो भाजपा अपनाती है। आज देश की राजनीति में भाजपा के सहयोगी दलों की भूमिका और सेक्यूलर खेमों की बात को अलग-अलग करके किसी भी तरह से नहीं देखा जा सकता जब शिवसेना और कांग्रेस एक साथ आ सकती है। अब राजनीति सत्ता प्राप्त करने के लिये मात्र ही की जाती है और इसमें अवसरों की तलाश में सरयू कभी पीछे नहीं रहे। रघुवर दास के मंत्रिमंडल से जिस प्रकार त्याग पत्र दिया और उन्हें हराया भी, उससे झारखंड और बिहार की राजनीति में उनका कद बढ़ा है। अगर आम आदमी पार्टी को बिहार और झारखंड की राजनीति में साथ ले लेते हैं, तो एक बेहतर विकल्प तो दे ही सकते हैं; क्योंकि लोग भाजपा के एक विकल्प को पंजाब की तर्ज पर तलाश भी रहें हैं। कुल मिलाकर यह तस्वीर झारखंड की राजनीति के आने वाले दिनों की एक बड़ी तस्वीर पेश करने जा रही है, जिसका सटीक बैठना या न बैठना वक्त तय करेगा।
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