एबीएन एडिटोरियल डेस्क (एनके मुरलीधर)। देश की आवाज स्वर कोकिला के जाने से वह आवाज संसार से चली गयी जिसका कोई जोड़ दुनिया में नहीं थी। उन्होंने कभी संगीत को व्यापार की दृष्टि से नही देखा। इतनी विविधिता वाला गायन का एक इतिहास संसार से चला गया। गायन की विविधता और श्रेष्ठ शैली के साथ संगीत की देवी स्वरूप लता जी ने जो लकीर खींच दी उसे सृष्टि के सजृनहार का एक उपहार मानकर हम सब अनंत काल तक संजोकर रखेंगे। एक दिव्य ज्योंति जो संगी और कला के क्षेत्र को लभगभ 80 साल तक आलोकित करती रही। जीवन संघर्ष के साथ सफलता की राह कभी भी आसान नहीं होती है। लता जी को भी अपना स्थान बनाने में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पडा़। कई संगीतकारों ने तो आपको शुरू-शुरू में पतली आवाज के कारण काम देने से साफ मना कर दिया था। उस समय की प्रसिद्ध पार्श्व गायिका नूरजहां के साथ लता जी की तुलना की जाती थी। लेकिन धीरे-धीरे अपनी लगन और प्रतिभा के बल पर आपको काम मिलने लगा। लता जी देश का स्वर थी, आवाज थी। अब यह स्वर विलीन हो गया। लता मंगेशकर जिस प्रकार दुनिया की संगीत प्रेमियों के लिये आस्था और समर्पण का राह आलोकित करती रहीं हैं उसका दूसरा कोई विकल्प की कल्पना नहीं की जा सकती है। उनका कद इतना बड़ा था कि पूरा राष्ट्र की के स्वर का प्रतिक बन गयी थी। आज हम कह सकते हैं कि देश का स्वर विलीन हो गया। यूनिवर्स ने देश को जो स्वर उपहार में दिया था उसे वापस ले लिया। आने वाली पीढ़ी शायद लता जी के कृति को विश्वास ही न कर सके। देश रत्न, भारत कोकिला की आवाज मानों राष्ट्र की संस्कृति थी जो अब शून्य में विलीन हो गयी है। पूरा राष्ट्र प्रकृति के नियम को लेकर शोकाकुल है। देश को अपनी लता दी पर अभिमान था, अभिमान है। देश के इतिहास में कभी न मिटने वाली हस्ताक्षर हैं लता दी।
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