एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ रेणु सिंह)। राजपथ पर सीमा भवानी का करतब देखकर पूरे देश का हौसला बढ़ा जब बीएसएफ की महिला बटालियन ने हैरत अंगेज कारनामें दिखलाये। इस साल के शुरू में खबर आई कि सार्वजनिक क्षेत्र की एक दिग्गज कंपनी तेल और प्राकृतिक गैस निगम के इतिहास में पहली बार एक महिला ने अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक का कार्य भार संभाला है। इसके पहले देश के कुछ बैंकों में सर्वोच्च पद पर भी महिलाएं रही हैं। छिटपुट ऐसे और उदाहरण भी हैं। इन सबसे लग सकता है कि भारत के कार्यबल में महिलाओं को वह स्थान हासिल है जिसकी कि वे हकदार हैं, पर यहां जो उदाहरण गए हैं, वे नियम कम अपवाद ज्यादा हैं। जैसे तमाम और मामलों में भारत कई विकासशील देशों से पीछे है, वैसे ही कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी के मामले में भी देश की स्थिति उत्साहजनक नहीं है। देश जिन बड़ी समस्याओं से जूझ रहा है, उनमें बेरोजगारी निश्चित रूप से एक है। देश में बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हैं, पर इन बेरोजगार लोगों में महिलाओं का अनुपात ज्यादा है। और तो और, सभी रोजगारशुदा लोगों में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ने की बजाय घटती जा रही है। चाहे सामाजिक समानता के नजरिए से देखें या मानवाधिकारों के नजरिए से, देश के कार्यबल में महिलाओं का समुचित प्रतिनिधित्व न होना एक गंभीर चिंता का विषय है। देश को आजादी मिलने के साथ जिस भारत की कल्पना की गई थी, करीब पचहत्तर वर्ष बाद की स्थिति भी इससे मेल नहीं खाती। लैंगिक समानता के मामले में भी हम अभी पीछे हैं। इस असमानता के कारणों की तलाश में हमें कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है। समाज का पुरुष प्रधान स्वरूप बना हुआ है और कहीं न कहीं यह दृष्टिकोण भी मौजूद है कि महिलाओं को उनका अधिकार देकर उन पर अहसान किया जा रहा है। मनोवैज्ञानिक और व्यवहार विज्ञानी यह बात बार-बार दोहराते रहे हैं कि प्रतिभा पुरुष और महिला में भेद नहीं करती। किसी भी प्रयोग में यह नहीं सिद्ध हुआ है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में कम बुद्धिमान होती हैं, बल्कि कई ऐसी भूमिकाएं बताई गई हैं जिनमें महिलाओं का प्रदर्शन बेहतर पाया गया है। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है जिनमें महिलाओं की क्षमता पर विश्वास कर उन्हें महत्त्वपूर्ण दायित्व सौंपे गए और उन्होंने इसे बखूबी पूरा कर के दिखाया। बिना किसी आधार के महिलाओं को कमजोर अथवा अक्षम मान लेना कहीं न कहीं अपरिपक्व सोच को ही इंगित करता है। यह सोच बदल रही है, पर उस गति से नहीं जितनी कि होनी चाहिए। महिलाओं की स्थिति में व्यापक सुधार तभी होगा जब यह सोच भी पूरी तरह से सुधर जाए। यदि कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी जनसंख्या में उनके अनुपात के अनुरूप नहीं है तो मुख्यत: यह सामाजिक कारणों से है। तमाम शोधों और अध्ययनों में बताया गया कि किसी भी देश की समृद्धि तथा उसकी अर्थव्यवस्था के फलने-फूलने के लिए उसमें महिलाओं की पूरी भागीदारी होनी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र संघ का भी कहना है कि सतत विकास तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए लैंगिक समानता जरूरी है। सभी प्रगतिशील संगठनों में मानव संसाधन के लिए विविधीकरण तथा समावेशन संबंधी नीतियां लागू की हैं। इसका मकसद जनशक्ति में सभी वर्गों के समुचित प्रतिनिधित्व और कमजोर लोगों को भी मौका देने से है। इसके अच्छे परिणाम निकले हैं और कारपोरेट जगत में महिलाओं के लिए अवसर बढ़ रहे हैं, पर देश में उपलब्ध कार्यबल से सीमित संख्या में ही लोगों को बड़ी कंपनियों तथा फर्मों में रोजगार मिल सकता है, क्योंकि यहां बड़ी संख्या में रोजगार नहीं है। विगत दो दशकों में भारत में महिलाओं की शिक्षा की स्थिति बेहतर हुई है। प्रजनन दर में गिरावट आई है। विश्व भर में इन कारणों से पारिश्रमिक युक्त कार्यों में महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि होना देखा गया है, पर भारत में ऐसा नहीं हो रहा। कार्यबल में जितनी महिलाएं जुड़ रही हैं, उससे कहीं अधिक कार्यबल से बाहर आ रही हैं। वैसे देखा जाए तो बैंकों में ठीक-ठाक संख्या में महिलाएं कार्य करती दिख जाएंगीं, महानगरों तथा बड़े शहरों के रेलवे काउंटरों पर भी उनकी थोड़ी बहुत मौजूदगी है, कुछ हवाई जहाज भी उड़ा रही हैं, पर महिलाएं बस कंडक्टर, टैक्सी और आटो रिक्शा चालक जैसी भूमिकाओं में शायद ही दिखती हैं। बीते समय में भारत में ई-कारोबार का काफी विस्तार हुआ है। घर बैठे सामान, जिसमें तैयार खाना भी शामिल है, मंगाने वालों में पुरुष भी हैं और महिलाएं भी। लेकिन ऐसा कभी नहीं देखने को मिलता कि सामान घर पर पहुंचाने वाली एक महिला हो। कारखानों में भी चाहे वहां गाड़ियां बनती हों अथवा उर्वरक जैसी कोई अन्य सामग्री, महिलाओं की संख्या नगण्य ही है। हां, ऐसी तस्वीरें जरूर दिख जाती हैं जिनमें महिलाएं घड़ी या मोबाइल फोन फैक्टरी में काम कर रही होती हैं। पर कुल मिला कर विनिर्माण क्षेत्र में नियोजित महिलाओं की संख्या काफी कम है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने कुछ वर्ष पहले एक महत्त्वपूर्ण आदेश जारी कर तीन सौ करोड़ रुपए सालाना बिक्री वाली सूचीबद्ध कंपनियों के निदेशक मंडल में एक स्वतंत्र महिला निदेशक का होना अनिवार्य कर दिया था। इसके अलावा बाजार पूंजीकरण के हिसाब से देश की शीर्ष एक हजार सूचीबद्ध कंपनियों के निदेशक मंडल में एक महिला सदस्य को नियुक्त करने की अनिवार्यता भी की गई थी, जो स्वतंत्र निदेशक भी हो। लेकिन इन अपेक्षाओं को पूरा करने कंपनियों को काफी मुश्किलें आर्इं। कई कंपनियां तो इसके लिए मन से तैयार नहीं थीं और उन्होंने खानापूरी करने के लिए इस आदेश का पालन किया तो कुछ कंपनियों के प्रवर्तकों ने अपने सगे संबंधियों में से किसी महिला को निदेशक बना कर छुट्टी पा ली। सेबी का यह आदेश कंपनियों के प्रबंधन वर्ग में लैंगिक विविधता लाने के लिए था, पर आदेश के कार्यान्वयन की प्रक्रिया में कई स्तरों पर साबित हो गया कि कई कंपनियां नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी के प्रति कितनी उदासीन हैं और साथ ही यह भी कि इतनी विशाल आबादी वाले देश में आसानी से इतनी महिलाएं नहीं मिल सकीं जिन्हें निदेशक नियुक्त किया जा सके। व्यक्ति हो या देश, उसकी सफलता इसमें मानी जाती है कि उसमें निहित संभावनाएं उभर कर आएं और इन संभावनाओं का भरपूर उपयोग हो। यदि कार्यबल में महिलाओं के लिए नए द्वार खुलते हैं तो इससे तमाम महिलाओं में निहित संभावनाओं को फलीभूत करने का मार्ग प्रशस्त होगा और हम अपने राष्ट्र की आबादी में मौजूद संभावनाओं का लाभ उठा सकेंगे। इसके लिए सरकार और निजी क्षेत्र दोनों को नए सिरे से आगे आना होगा।
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