अलग झारखंड राज्य के अटल आंदोलनकारी थे लाल रणविजय नाथ शाहदेव

 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ कोरनेलियुस मिंज)। स्वतंत्रता तेहें चाही लाल लहूक धार जैसी देश-भक्ति से ओत-प्रोत कविता रचने वाले नागपुरी कवि, गीतकार और आंदोलनकारी लालरण विजयनाथ शाहदेव ने झारखंड राज्य के पुनर्गठन में सक्रिय भूमिका निभायी थी। उनके मन में अलग राज्य के लिए आंदोलन करने की प्रबल इच्छा खरसावां की शहादत भूमि से जागृत हुई थी। जब वे अपने पिताजी पालकोट गढ़ के राजा छोटेलाल लक्ष्मीनाथ शाहदेव के साथ 1952 ई. में सरायकेला खरसावां शहीद स्थल देखने गये थे। वहीं पर शहीद स्थल की पावन माटी को मुट्ठी में लेकर कसम खायी कि झारखंडियों के लिए अलग राज्य की लड़ाई लडेंगे। इस बीच मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा छोटेलाल लक्ष्मीनाथ शाहदेव के घर अक्सर राजाडेरा करमटोली आया करते थे। अंतत: उनसे प्रभावित होकर औपचारिक रूप से झारखंड पार्टी में 1957 ई. में शामिल हुए और झारखंड आंदोलन में कूद पड़े। वे इसके लिए वीर रस के नागपुरी गीतों और कविताओं की रचनाएं करने लगे। उनकी रचनाएं लोगों के रोंगटे खड़े कर देने वाली होती थीं। हास्य कविता और व्यंग्य कविता लेखन में पकड़ अच्छी थी। एक बार रांची के टैगोर हिल में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने व्यंग्य हास्य कविता गांधीक नाम बेइच के आपन पेट भरू प्रस्तुत किया था, जिसे लोगों ने खूब पसंद किया। उनकी जागरण कविता - नरसिंघा बाजी आब फिर नागपुर देस में आमजनों के बीच खूब लोकप्रिय हुआ। उन्होंने 500 से अधिक गीत और कविताओं की रचना की हैं, जिनमें 250 से अधिक आकाशवाणी रांची से प्रसारित हुई हैं। लाल रणविजय नाथ शाहदेव हिंदी फिल्मी गाना भी गाते थे। उनकी पत्नी श्यामा देवी को नागपुरी गीत उतने पसंद नहीं थे। इसलिए प्रारंभ में वे अपनी धर्म पत्नी को हिंदी फिल्मी गाना गाकर सुनाते थे। उन्होंने बकायदा शास्त्रीय संगीत की शिक्षा भी प्राप्त की थी। आरंभ में वे नागपुरी में नहीं अपितु हिंदी में गायन करके अपने दोस्तों का मनोरंजन करते थे। गजल में उनकी पकड़ थी। पुराने हिंदी फिल्मी गीतों के भी शौकीन थे। गीत-गोविंद के साथ-साथ उनका मन अलग राज्य के लिए रमा हुआ था। सो इसे में रत रहते थे। 1963 ई. में जब झारखंड पार्टी का कांग्रेस में विलय हुआ, तब लाल रणविजय नाथ शाहदेव दिल्ली में पंडित जवाहर लाल नेहरू के समक्ष विरोध किया था। उनके नेतृत्व में 21 जलाई 1963 ई. में बहुबाजार में विशाल सभा आयोजित की गयी। इस सभा में झारखंड पार्टी को बनाये रखने का निर्णय लिया गया। लाल रणविजय नाथ शाहदेव के नेतृत्व में ही 27, 28 एवं 29 सितंबर को वीरमित्रापुर में विशाल जुलूस निकाला गया। अलग राज्य के लिए आंदोलन करने के कारण उन्हें 3 जून 1968 ई. में जेल भी जाना पड़ा। झारखंड पार्टी को कांग्रेस में विलय करने के बाद जब जयपाल सिंह मुंडा पुन: झारखंड पार्टी में आना चाहते थे, तब लाल रणविजय नाथ शाहदेव उनसे कहा था - आगे गुरू रहंय, आब गरू बटे गेलंय। इसे सुनकर मरांग गोमके भी ठहाका लगाकर हंस पड़े थे और लाल रणविजय नाथ से वादा किया था - मोंय घुरत हों, मोंय आवत हों। आब दोहरायके आंदोलन खड़ा करब। हालांकि इस वचन को देने के बाद जयपाल सिंह मुंडा की अचानक मृत्यु हो गयी। लाल रण विजय नाथ शाहदेव अलग राज्य के लिए 1977 ई. में तात्कालीन गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह से अलग राज्य पर हुई वार्ता में शामिल हुए। उसके बाद 1999 ई. में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के साथ हुई अलग राज्य वार्ता में भी शरीक थे। लाल रणविजय नाथ शाहदेव के अलग राज्य झारखंड नाम के लिए उनके समक्ष मजबूती से तर्कपूर्ण विचार रखा और इसी नाम अलग राज्य का गठन भी हुआ। लाल रणविजय नाथ शाहदेव नागपुरी कला संगम के निदेशक और नागपुरी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने पझरा और नागपुरी पत्रिका का संपादन किया। उनकी कुछ प्रकाशित पुस्तकें और पत्रिकाएं हैं जिनमें पूजा कर फूल 1984, खोता नागपुरी काव्य 1985, खुखड़ी रूगड़ा संपादन 1985, पझरा पत्रिका 1985, जागी जवानी चमकी बिजुरी 1986 शामिल हैं। लाल रणविजय नाथ शाहदेव को कई सम्मान भी मिले। झारखंड विधान सभा स्थापना के अवसर पर 22 नवंबर 2017 को प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया। दूरदर्शन सम्मान 2011, नागपुरी संस्थान पिठोरिया से 2014 में स्वर्ण सम्मान, 2014 में प्रफुल्ल सम्मान, 2015 में लोक सेवा समिति से झारखंड रत्न सम्मान मुख्य रूप से शामिल है। ऐसे अलग राज्य के आंदोलन में अटल रहने वाले वीर माटी पुत्र लाल रणविजय नाथ शाहदेव का जन्म पांच फरवरी 1940 ई. में हुआ। उनके पिता का नाम छोटेलाल लक्ष्मीनाथ शाहदेव और माता का नाम सीता देवी था। उनका विवाह श्यामा देवी से 1959 ई. में हुआ। उनके तीन बच्चे हैं निर्मला देवी, अजय नाथ शाहदेव और राजश्री सिंहदेव। भले ही लाल रणविजय नाथ शाहदेव अलग राज्य का सपना साकार कर इस धराधाम से 18 मार्च 2019 में विदा हो गये, किंतु हमारे लिए प्रेरणास्रोत बने रहेंगे। (लेखक गोस्सनर कॉलेज, रांची के सहायक प्राध्यापक हैं)।

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