...जब भूख बनी आजादी का अस्त्र

 

23 बंदी, एक भूख हड़ताल, और टूट गया ब्रिटिश शासन का गुरूर 

हजारीबाग जेल का संघर्ष गाथा, जिसने सत्ता के अहंकार को तोड़ा 

भारतीय लोकतांत्रिक चेतना की ऐतिहासिक विजय गाथा 

डॉ. शत्रुघ्न कुमार पाण्डेय 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। 15 अगस्त उन अनगिनत संघर्षों की स्मृति दिवस भी है, जिनके कारण भारत स्वतंत्र हुआ। यह स्वतंत्रता केवल नारों, भाषणों, बैठकों एवं सम्मेलनों से नहीं मिली; यह जेलों की अंधेरी कोठरियों, भूख से सूखते शरीरों, जनमत की शक्ति और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए दिए गए त्याग से भी अर्जित की गई थी। ऐसी ही एक घटना 1938 में हजारीबाग केंद्रीय कारागार में घटी। पहली दृष्टि में यह कुछ राजनीतिक बंदियों की रिहाई का प्रश्न प्रतीत होता है, किंतु वास्तव में यह औपनिवेशिक निरंकुश सत्ता और भारतीय उत्तरदायी शासन के बीच टकराव था। 

एक ओर ब्रिटिश शासन अपनी विशेष शक्तियों को सर्वोपरि मानता था, दूसरी ओर भारतीय नेतृत्व यह सिद्ध करना चाहता था कि जनता द्वारा चुनी गयी सरकार को जनता के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए, न कि औपनिवेशिक अधिकारियों की इच्छा के प्रति। आज, जब हम स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं, तब यह प्रसंग मुझे उद्वेलित कर रहा है यह लिखने को कि लोकतंत्र केवल संविधान लिख देने से नहीं बनता, उसकी नींव उन संघर्षों से भी पड़ी है जिनमें सत्ता से अधिक सिद्धांतों को महत्व दिया जाता है। हजारीबाग जेल की भूख हड़ताल ऐसा ही एक संघर्ष थी। 

जब उम्मीदें सलाखों से टकरायी 

20 जुलाई 1937 को बिहार में कांग्रेस मंत्रिमंडल का गठन हुआ। जेलों के भीतर यह समाचार आशा का संदेश लेकर पहुंचा। राजनीतिक बंदियों को विश्वास था कि अब उनकी रिहाई दूर नहीं। कांग्रेस ने चुनावों के दौरान यह वादा किया था। लेकिन सप्ताह बीत गये, फिर महीने। जेल के फाटक बंद रहे। हजारीबाग केंद्रीय कारागार में बेचैनी बढ़ने लगी। यहां केवल बिहार के राजनीतिक कार्यकर्ता ही नहीं थे। कुछ ऐसे क्रांतिकारी भी थे जिन्हें अंडमान की सेल्युलर जेल में भूख हड़ताल करने के कारण हजारीबाग स्थानांतरित किया गया था। काला पानी उनकी इच्छाशक्ति को नहीं तोड़ सका था। हजारीबाग में भी उन्होंने संघर्ष का वही मार्ग चुना, प्रतिरोध का अस्त्र—भूख। 

17 जनवरी 1938 को आठ राजनीतिक बंदियों ने आमरण अनशन आरम्भ किया। नौ दिन बाद, 26 जनवरी तक अन्य बंदी भी इस संघर्ष में शामिल हो गए। अब यह केवल 23 बन्दियों का अनशन नहीं था। यह उस व्यवस्था के विरुद्ध नैतिक प्रतिरोध था, जो जनता के प्रतिनिधियों की सरकार बनने के बाद भी राजनीतिक बंदियों को स्वतंत्र करने को तैयार नहीं थी। 

जेल की चारदीवारी के भीतर उठी यह आवाज शीघ्र ही बिहार की सड़कों पर सुनाई देने लगी। 30 जनवरी को पूरे प्रदेश में राजनीतिक बंदी दिवस मनाया गया। प्रभात फेरियां निकलीं, सभाएं हुईं। छात्रों, किसानों, समाजवादियों और कांग्रेस कार्यकतार्ओं ने एक स्वर में राजनीतिक बंदियों की रिहाई की मांग उठायी। हजारीबाग जेल अब केवल एक जेल नहीं रह गई थी। वह भारतीय जनमत का प्रतीक बन चुकी थी। इतनी गंभीर हो गयी कि बिहार के मुख्यमंत्री, तब प्रधानमंत्री, श्रीकृष्ण सिंह, मौलाना अबुल कलाम आजाद और अच्युत पटवर्धन स्वयं हजारीबाग जेल पहुंचे। उन्होंने बंदियों से लंबी बातचीत की। उन्हें विश्वास दिलाया कि उनकी रिहाई के लिए पूरा प्रयास किया जाएगा। 

नेताओं के आग्रह पर भूख हड़ताल समाप्त हुई, किंतु संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। असली संघर्ष अब शुरू हो चुका था। प्रश्न केवल बंदियों की रिहाई का नहीं था। प्रश्न यह था—निर्णय लेने का अधिकार किसके पास है? जनता द्वारा चुनी गई भारतीय सरकार के पास या औपनिवेशिक गवर्नर और गवर्नर-जनरल के पास। दरअसल दो शासन-दृष्टियाँ आमने-सामने थीं। बिहार के मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह का मत स्पष्ट था, यदि जनता ने सरकार चुनी है, तो राजनीतिक बंदियों की रिहाई जैसे निर्णय लेने का अधिकार भी उसी सरकार का होना चाहिए। ब्रिटिश शासन इससे सहमत नहीं था। 

गवर्नर-जनरल लॉर्ड लिनलिथगो ने तर्क दिया कि भारत शासन अधिनियम, 1935 की धारा 126(5) के अंतर्गत शांति और व्यवस्था बनाए रखने का अंतिम उत्तरदायित्व उनके ऊपर है। उनके अनुसार सभी राजनीतिक बंदियों की सामूहिक रिहाई सार्वजनिक सुरक्षा के लिए जोखिम उत्पन्न कर सकती थी। इसलिए उन्होंने बिहार के गवर्नर मॉरिस गार्नियर हैलेट को मंत्रियों की सलाह न मानने का निर्देश दिया। यहीं से संघर्ष प्रशासनिक नहीं, संवैधानिक बन गया। भारतीय नेतृत्व उत्तरदायी सरकार की बात कर रहा था। औपनिवेशिक शासन विशेषाधिकारों की। 

15 फरवरी 1938 को बिहार कांग्रेस मंत्रिमंडल ने इस्तीफा दे दिया। यह इस्तीफा किसी पद के लिए नहीं था; यह एक सिद्धांत के लिए था। मंत्रिमंडल ने स्पष्ट कहा कि राजनीतिक बंदियों की रिहाई से शांति को कोई खतरा नहीं है। यदि निर्वाचित सरकार के अधिकारों में इस प्रकार हस्तक्षेप होगा, तो उत्तरदायी शासन केवल नाम का रह जायेगा। औपनिवेशिक शासन के सामने यह नैतिक चुनौती थी। 

गांधी और बोस ने दिया राष्ट्रीय स्वर 

बिहार मंत्रिमंडल के इस्तीफे ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। महात्मा गांधी ने गवर्नर-जनरल के निर्णय की आलोचना करते हुए कहा कि धारा 126(5) का प्रयोग इस मामले में उचित नहीं था। गांधी ने लिखा, गवर्नर का कार्य मंत्रियों को सलाह देना है, उनके अधिकारों का स्थान लेना नहीं। यदि निर्वाचित मंत्री स्वतंत्र निर्णय ही न ले सकें, तो उत्तरदायी शासन का सिद्धांत अर्थहीन हो जायेगा।

गांधी जी ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया, यदि कुछ राजनीतिक बंदियों की रिहाई से वास्तव में कोई अशांति नहीं होने वाली थी, तो फिर असाधारण संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग क्यों किया गया? यह प्रश्न केवल ब्रिटिश सरकार से नहीं था; यह औपनिवेशिक शासन की पूरी वैधता पर प्रश्नचिह्न था। हरिपुरा में कांग्रेस ने संघर्ष को राष्ट्रीय स्वर दिया। 19 से 21 फरवरी 1938 को आयोजित इस अधिवेशन के अध्यक्ष सुभाषचंद्र बोस थे। उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने बिहार मंत्रिमंडल का समर्थन किया। 

अधिवेशन के प्रस्ताव में स्पष्ट कहा गया कि राजनीतिक बंदियों की रिहाई प्रांतीय सरकार के अधिकार-क्षेत्र का विषय है। गवर्नर-जनरल का हस्तक्षेप उत्तरदायी शासन की भावना के विरुद्ध है। यह प्रस्ताव केवल राजनीतिक समर्थन नहीं था। यह भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों की घोषणा थी। कांग्रेस ने पहली बार इतने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जनता के प्रतिनिधियों की सरकार पर औपनिवेशिक नौकरशाही का नियंत्रण स्वीकार नहीं किया जा सकता। महात्मा गांधी और सुभाषचंद्र बोस के स्वर भी एक थे। इसलिए इसका प्रभाव भी औपनिवेशिक सत्ता के लिए भयावह और थर्रा देने वाला था। 

ब्रिटिश सत्ता झुकी, सिद्धांत जीता 

देशभर में बढ़ते जनमत, गांधी के हस्तक्षेप, बोस की अध्यक्षता में हरिपुरा अधिवेशन के समर्थन और बिहार मंत्रिमंडल की अडिग संवैधानिक स्थिति ने अंतत: परिस्थितियाँ बदल दीं। 26 फरवरी 1938 को बिहार के गवर्नर मॉरिस गार्नियर हैलेट और श्रीकृष्ण सिंह के बीच समझौता हुआ। राजनीतिक बंदियों के मामलों की समीक्षा का निर्णय लिया गया। उनकी रिहाई का मार्ग प्रशस्त हुआ। 

कांग्रेस मंत्रिमंडल ने पुन: कार्यभार संभाल लिया। यह किसी एक पक्ष की पूर्ण राजनीतिक विजय नहीं थी, लेकिन यह भारतीय संवैधानिक मूल्यों की नैतिक विजय अवश्य थी। औपनिवेशिक शासन को पहली बार यह स्वीकार करना पड़ा कि जनता द्वारा चुनी गई सरकार की उपेक्षा करके लंबे समय तक शासन नहीं चलाया जा सकता। हजारीबाग जेल की यह भूख हड़ताल केवल बारह बंदियों की कहानी नहीं है। 

यह भारतीय लोकतंत्र के निर्माण की कहानी है, जिसने दिखाया कि नैतिक शक्ति, जनमत और संवैधानिक प्रतिबद्धता मिलकर सबसे शक्तिशाली सत्ता को भी अपने निर्णयों पर पुनर्विचार करने के लिए विवश कर सकती है। यह भी कि स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक चेतना की लौ जेलों की अँधेरी कोठरियों में भी जली थी। यह भी कि जब भी तिरंगा लहराए, हजारीबाग जेल की उन कोठरियों को भी याद किया जाए, जहाँ भूख से क्षीण होते शरीरों ने साम्राज्य की शक्ति को नहीं, उसकी नैतिकता को चुनौती दी थी। 

इतिहास में ऐसे क्षण कम आते हैं, जब भूख हथियार बनती है, नैतिकता शक्ति बनती है और जेल की एक कोठरी पूरे साम्राज्य की राजनीति बदल देती है। और इतिहास साक्षी है, साम्राज्य पहले अपनी नैतिक वैधता खोते हैं, उसके बाद अपना राजनीतिक प्रभुत्व। (डॉ. पाण्डेय प्रोफेसर, क्षेत्रीय इतिहास के अध्येता-शोधकर्ता और दर्जन भर पुस्तकों के लेखक हैं।)

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