रंगभरी आमलकी एकादशी 27 को, आस्था, भक्ति और उत्सव का अद्भुत संगम

 

  • रंगभरी आमलकी एकादशी 27 को, आस्था, भक्ति और उत्सव का अद्भुत संगम
  • यह पर्व हमें प्रकृति, धर्म और सामाजिक एकता के महत्व का देता है संदेश : संजय सर्राफ

एबीएन सोशल डेस्क। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट व विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाने वाली रंगभरी एकादशी, जिसे आमलकी एकादशी भी कहा जाता है, इस वर्ष रंगभरी एकादशी 27 फरवरी दिन शुक्रवार को मनाई जाएगी। यह तिथि हिंदू पंचांग के अनुसार अत्यंत पुण्यदायी मानी जाती है। 

यह एकादशी विशेष रूप से भगवान विष्णु और आंवला (आमलकी) वृक्ष की पूजा के लिए समर्पित है तथा होली के उत्सव की आधिकारिक शुरुआत का भी प्रतीक मानी जाती है।धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु का आंवले के वृक्ष में वास होता है। इसलिए आमलकी एकादशी पर आंवले के वृक्ष की पूजा, परिक्रमा और उसके नीचे बैठकर विष्णु स्तुति करने का विशेष महत्व बताया गया है। 

पद्म पुराण में वर्णित कथा के अनुसार एक बार एक निर्धन ब्राह्मण ने इस व्रत को श्रद्धा से किया, जिसके प्रभाव से उसे अगले जन्म में राजा बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि यह व्रत व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि और पापों से मुक्ति प्रदान करता है। रंगभरी एकादशी का विशेष संबंध काशी विश्वनाथ मंदिर से भी है। 

मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव माता पार्वती को विवाह के बाद पहली बार काशी लेकर आए थे और बाबा  विश्वनाथ का गुलाल एवं अबीर से भव्य श्रृंगार किया गया था। इसी कारण इसे रंगभरी एकादशी कहा जाता है। इस दिन वाराणसी में विशेष शोभायात्रा निकाली जाती है और मंदिरों में अबीर-गुलाल अर्पित कर भक्तगण होली के रंगों की शुरुआत करते हैं।

आमलकी एकादशी का व्रत प्रातः स्नान, संकल्प और भगवान विष्णु की विधिवत पूजा से आरंभ होता है। श्रद्धालु दिनभर उपवास रखते हैं तथा सायंकाल कथा-श्रवण और भजन-कीर्तन करते हैं। इस दिन श्रीहरि विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की आराधना करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस व्रत के पालन से सहस्र गोदान के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।

आंवला वृक्ष को आयुर्वेद में भी अत्यंत पवित्र और औषधीय गुणों से भरपूर माना गया है। यह वृक्ष दीर्घायु,स्वास्थ्य और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। इस दिन आंवले का सेवन तथा दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। सामाजिक दृष्टि से भी यह पर्व लोगों में सद्भाव, भक्ति और उत्साह का संचार करता है तथा होली जैसे रंगोत्सव के आगमन का संदेश देता है।

समग्र रूप से देखा जाए तो रंगभरी आमलकी एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और उल्लास का अद्भुत संगम है। यह पर्व हमें प्रकृति, धर्म और सामाजिक एकता के महत्व का संदेश देता है। भक्तिभाव और श्रद्धा से किया गया यह व्रत व्यक्ति के जीवन में सुख-शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।

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