कचरा उत्पादन पूरी तरह खत्म करना ही बचाव और जमीनी हकीकत

 

एबीएन डेस्क (सुनीता नारायण)। भारत अपने यहां कचरे से निपटने के लिए तेजी से नीतियां तैयार कर रहा है। कचरा यानी घरों, संस्थानों और कारखानों में चीजों के इस्तेमाल से निकलने वाला अवशिष्ट। अब इसका प्रभाव हमारी गतिविधियों पर भी नजर आना चाहिए। हमारे कचरे को ऐसा संसाधन बनना चाहिए जिस पर दोबारा काम हो, दोबारा इस्तेमाल हो और जिसका पुनर्चक्रण हो सके। ऐसा करने से हमारी दुनिया में वस्तुओं का इस्तेमाल कम हो सकेगा और पर्यावरण को पहुंचने वाले नुकसान पर भी नियंत्रण किया जा सकेगा। यह उपाय सबके लिए लाभदायक है। हमें पता है कि जैसे-जैसे हमारे समाज अमीर और शहरी होते जाते हैं वैसे-वैसे ठोस कचरे की प्रकृति भी बदलती जाती है। जैविक अपघटन लायक कचरे के बजाय आम परिवार प्लास्टिक, कागज, धातु तथा अन्य ऐसे कचरे ज्यादा निकालते हैं जो पर्यावरण के अनुकूल नहीं होते। प्रति व्यक्ति आधार पर उत्पादित कचरे की मात्रा भी बढ़ती है। देश के शहरी इलाकों में से कई में पहले ही कचरे का उत्पादन बहुत अधिक बढ़ चुका है। सन 2000 में जब पहली बार नगर निकायों के लिए ठोस कचरे से संबंधित नियम अधिसूचित किए गए तब वे इस विचार पर आधारित थे कि कचरे को संग्रहीत किया जाए, वाहन से ले जाया जाए और किसी दूरवर्ती सुरक्षित जगह पर निपटाया जाए। इसका लक्ष्य यह था कि हम कचरे को अपने आसपास से हटाकर अपने शहरों को साफ रखें। परंतु यह नीति व्यावहारिक स्तर पर नाकाम रही और हमारे शहरों में कचरे का ढेर एकत्रित होता गया। नगर निकायों की क्षमता में कमी की वजह से जो कचरा इकठ्ठा करके दूर नहीं ले जाया जा सका वह हमारे घरों के आसपास एकत्रित होता रहा। जो कचरा संग्रहित किया गया उसे भी कहीं फेंका जाता और यह कचरा आज शर्मिंदा करने वाले कचरे के पहाड़ों में बदल चुका है। बीते कुछ वर्षों के दौरान देश में कचरा प्रबंधन की रणनीति में काफी बदलाव आया है। मौजूदा नीति की बात करें तो केंद्र सरकार की स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) 2.0 में कचरे को अलग-अलग करने, सूखे और गीले कचरे का प्रसंस्करण करने और कचरा फेंकने के लिए निर्धारित लैंडफिल साइट पर भेजे जाने वाले कचरे को न्यूनतम करने का प्रावधान किया गया। एसबीएम 2.0 के दिशा-निर्देशों के अनुसार जैव अपघटन के लिए अनुपयुक्त कचरा जिसे किसी भी तरह उपचारित नहीं किया जा सकता उसे किसी भी हालत में कुल कचरे के 20 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए और केवल इसे ही लैंडफिल की जगहों पर भेजा जाना चाहिए। इस हिसाब से दिशानिर्देशों में कहा गया है कि शहरों में कचरा फेंकना पूरी तरह बंद होना चाहिए। उन्हें अपने पूरे कचरे का भलीभांति प्रसंस्करण करना चाहिए। दिशा-निर्देशों में जोर दिया गया है कि कचरे से ऊर्जा तैयार करने की परियोजनाएं वित्तीय और परिचालन के मामले में तभी व्यवहार्य हो सकती हैं जब उन्हें रोजाना 150 से 200 टन उच्च कैलोरिफिक वैल्यू वाला ऐसा कचरा मिले जो छांटा हुआ तथा सूखा हुआ हो और जिसका पुनर्चक्रण संभव न हो। हमने यह भी सीखा है कि ऐसे संयंत्र कोई जादू की छड़ी नहीं होते। इनके ऊर्जा उत्पादन करने के लिए यह आवश्यक है कि इन्हें आपूर्ति किया जाने वाला कचरा उच्च गुणवत्ता वाला हो तथा इसे छांटने का काम एकदम प्राथमिक यानी स्रोत के स्तर पर हो। बिना इसके संयंत्र अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाएगा और निष्क्रिय हो जाएगा। दिशानिर्देश यह अवसर भी मुहैया कराते हैं कि 3,000 से अधिक लैंडफिल साइट जहां केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक करीब 80 करोड़ टन कचरा फेंका जाता है, उसे दोबारा इस्तेमाल में लाया जा सकता है। इससे न केवल मूल्यवान जमीन मुक्त होगी जिस पर हरियाली लगाई जा सकती है और अन्य उपयुक्त इस्तेमाल किया जा सकता है, बल्कि पर्यावरण से जुड़ी आपदाओं को भी टाला जा सकता है। इसके लिए खासतौर पर तैयार नीतियों की आवश्यकता है ताकि इन लैंडफिल वाली जगहों से निकलने वाली सामग्री का समुचित इस्तेमाल हो सके। शहरों को भी अब इन जगहों पर नया कचरा डालने से बचना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया तो यहां का कचरा कभी समाप्त नहीं होगा। अच्छी खबर यह है कि देश की ठोस कचरा प्रबंधन नीति को अब इस प्रकार तैयार किया जा रहा है कि ठोस कचरे को दोबारा इस्तेमाल किया जा सके। यह रुख सही मायनों में एक चक्रीय अर्थव्यवस्था पर केंद्रित है। इस नीति में कचरे को पूरी तरह समाप्त करने और विभिन्न सामग्रियों को पूरी तरह दोबारा इस्तेमाल करने की बात शामिल है। ऐसे में समय के साथ हमें यह भी पता चलेगा कि कौन से पदार्थ दोबारा इस्तेमाल नहीं किए जा सकते हैं। हम उनका इस्तेमाल कम कर सकते हैं। इससे नीतियां और व्यवहार पर्यावरण के अधिक अनुकूल होंगे। उस दृष्टि से देखें तो नीति बन चुकी है लेकिन हमारे व्यवहार में बदलाव शेष है। सबसे बड़ी समस्या है कचरे को स्रोत के स्तर पर अलग-अलग करना। अगर घरों में कचरे को छांट भी लिया जाए तो इसे अलग-अलग प्रसंंस्करण इकाई पहुंचाना मुश्किल है। वास्तव में प्रसंस्करण इसलिए हो पाता है क्योंकि कुछ लोगों की आजीविका हमारे कचरे पर टिकी है। मसलन कचरा बीनने वाले। शहरों के प्रबंधक कचरे के प्रबंधन के लिए अलग-अलग विकल्पों पर काम कर रहे हैं ताकि इससे राजस्व जुट सके। सबसे बुरी बात यह है कि शहरों में प्लास्टिक कचरा तेजी से बढ़ रहा है। हमें मानना होगा कि हमारे इस्तेमाल वाले प्लास्टिक का पुनर्चक्रण नहीं हो सकता इसलिए इसका इस्तेमाल बंद करना होगा। एकल इस्तेमाल वाले प्लास्टिक को लेकर हमारी मौजूदा नीति इस बड़ी समस्या से निपटने के लिए अपर्याप्त है। जरूरत इस बात की है कि कचरा प्रबंधन के नए तरीके सीखे जाएं। इसके लिए सबसे आवश्यक है यह जानना कि क्या कारगर है और क्यों? इसीलिए सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वॉयरनमेंट ने नीति आयोग के साथ मिलकर एक दस्तावेज तैयार किया है, जिससे शहरों के कचरे के अनुसार उनके निपटान के नए सबक सीखे जा सकते हैं। इनको अपनाने की आवश्यकता है। यही बदलाव का सही अवसर है।

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