स्वामी विवेकानंद का शिक्षा दर्शन

 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ मेरी ग्रेस)। 12 जनवरी मंगलवार को युवा दिवस है। स्वामी विवेकानंद जी का जन्म दिन। स्वामी जी ने शिक्षा के सात उद्देश्य निश्चित किए-शारीरिक विकास, मानसिक एवं बौद्धिक विकास, समाज सेवा की भावना का विकास, नैतिक एवं चारित्रिक विकास, व्यावहारिक विकास, राष्ट्रीय एकता एवं विश्वबंधुत्व का विकास और आध्यात्मिक विकास पर पता नहीं भारतीय संस्कृति के पोषक होते हुए भी इन्होंने सांस्कृतिक विकास पर बल क्यों नहीं दिया। सम्भवत: ये धर्म और संस्कृति को अभिन्न समझते थे। उस समय अपना देश परतन्त्र था इसीलिए शासनतन्त्र और नागरिकता की शिक्षा का प्रश्न इनके मस्तिष्क में कैसे आता अन्तर्राष्ट्रीय भी इस युग का नारा है। इनके युग में यह विश्वबंधुत्व के रूप में जाना समझा जाता था। शिक्षा की पाठ्यचर्या के संदर्भ में स्वामी जी का दृष्टिकोण बहुत व्यापक था। इस सन्दर्भ में इन्होंने पहली बात यह कही कि शिक्षा की पाठ्यचर्या में वे सब विषय एवं क्रियाएं सम्मिलित की जाएं जो मनुष्य के भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिए आवश्यक हैं। दूसरी बात यह कही कि देश-विदेश, जहां से भी जो अच्छा मिले उसे पाठ्यचर्या में स्थान दिया जाए और तीसरी बात यह कही कि मनुष्य, समाज अथवा राष्ट्र के भौतिक विकास के लिए पाश्चात्य विज्ञान एवं तकनीकी को मुख्य स्थान दिया जाए और उन्हें समझने के लिए अंग्रेजी भाषा को स्थान दिया जाए और मनुष्य के आध्यात्मिक विकास के लिए भारतीय धर्म-दर्शन को पाठ्यचर्या का अनिवार्य विषय बनाया जाए। इन्होंने मनुष्य के भौतिक विकास की दृष्टि से मातृ भाषा, प्रादेशिक भाषा, संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं को कला, संगीत, इतिहास, भूगोल, राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, विज्ञान, गृह विज्ञान, कृषि विज्ञान, गणित, तकनीकी, और उद्योग शिक्षा विषयों को और खेल-कूद, व्यायाम, योगासन और समाज सेवा क्रियाओं को और उसके आध्यात्मिक विकास की दृष्टि से साहित्य, धर्म, दर्शन, और नीतिशास्त्र विषयों को तथा भजन, कीर्तन, सत्संग एवं ध्यान की क्रियाओं को पाठ्यचर्या में स्थान देने पर बल दिया। इन्होंने उस समय भारत में उच्च शिक्षा की व्यवस्था पर बल दिया और उसकी पाठ्यचर्या में देश-विदेश के उच्चतम् ज्ञान एवं कौशल और विज्ञान एवं तकनीकी को ध्यान देने पर बल दिया। शिक्षण विधियों के क्षेत्र में स्वामी जी की अपनी कोई देन नहीं हैं। इन्होंने कुछ परम्परावादी शिक्षण विधियों (अनुकरण, व्याख्यान, स्वाध्याय, तर्क और योग) और कुछ आधुनिक विधियों (निर्देशन, परामर्श और प्रयोग) का समर्थन किया है। इन सब में भी इन्होंने योग विधि को सर्वोत्तम विधि बताया है और जिस योग विधि का स्वामी जी ने समर्थन किया है, उसे उसी रूप में आज की परिस्थितियों में प्रयोग नहीं किया जा सकता। स्वामी जी के अनुसार अनुशासन का अर्थ है आत्मा द्वारा निर्दिष्ट होना। इस संदर्भ में हमारा निवेदन है कि जब तक मनुष्य आत्म तत्व की अनुभूति नहीं करता तब तक उसके द्वारा निर्दिष्ट होने का प्रश्न नहीं उठता और आत्म तत्व की अनुभूति करने में उसे पूरा जीवन लग सकता है। स्पष्ट है कि विद्यालय अनुशासन की बात स्वामी जी नहीं कर पाए। विद्यालय अनुशासन का हमारी दृष्टि से यह अर्थ होना चाहिए कि अध्यापक और बच्चे सभी अपने प्राकृतिक स्व पर नियंत्रण कर सकें, सामाजिक नियम एवं आदर्शों के अनुकूल आचरण करने के लिए अंदर से प्ररित हों और आत्मा की अनुभूति करने के लिए निरन्तर अग्रसर रहें। आज के युग में न शिक्षक से आत्माज्ञानी होने की आशा की जा सकती है और न शिष्ट से ब्रह्मचर्य व्रत पालन की। दोनों संयमी, ईमानदार और कर्मनिष्ठ हों, इतना ही पर्याप्त होगा। स्वामी जी विद्यालयों को जन कोलाहल से दूर स्थापित करने के पक्ष में थे। एक ओर जन शिक्षा, स्त्री शिक्षा, और उद्योग शिक्षा की बात और दूसरी ओर जन कोलाहल से दूर विद्यालयों की स्थापना। जहां तक जन शिक्षा, स्त्री शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा, धार्मिक शिक्षा, और राष्ट्रीय शिज्ञक्षा की बात है, इन सभी क्षेत्रों में स्वामी जी ने हामारा मार्ग दर्शन किया है। जन शिक्षा के सन्दर्भ में इनका दृष्किटकोण बड़ा व्यापक था। वे देश के सभी बच्चों, युवकों प्रौढ़ों और वृद्धों को साक्षर देखना चाहते थे, उन्हें सामान्य जीवन जीने योग्य बनाना चाहते थे, उन्हें अपनी रोजी रोटी कमाने में दक्ष करना चाहते थे। इनके इन विचारों ने हमें सामान्य अनिवार्य एवं नि:शुल्क और प्रौढ़ शिक्षा दोनों की व्यवस्था करने की प्रेरणा दी। इसमें दो मत नहीं कि स्वामी जी ने स्त्रियों को मातृशक्ति के रूप में सम्मान देकर भारतीय संस्कृति और उसकी अस्मिता की रक्षा की है और स्त्री शिक्षा की अनिवार्यता पर बल देकर हमारा बड़ा उपकार किया है। परन्तु स्त्री शिक्षा के संदर्भ में इनके ये विचार कि उन्हें आदर्श गृहिणी आदर्श मातायें और आदर्श शिक्षिकायें ही बनाया जाए, संकीर्ण ही कहे जायेंगे। देश में बेरोजगारी समाप्त करने हेतु व्यावसायिक शिक्षा पर विशेष जोर देकर पाश्चात्य विज्ञान और तकनीकी शिक्षा का प्रमुख स्थान दिया। आज इसी शिक्षा के बल पर हम विकास के पथ पर आगे हैं। स्वामी विवेकानंद ने स्वंय मनुष्य के ज्ञान और सीख पर भी काफी विचार लिखे हैं। पढ़ने के लिए जरूरी है एकाग्रता, एकाग्रता के लिए जरूरी है ध्यान, ध्यान से ही हम इंद्रियों पर संयम रखकर एकाग्रता प्राप्त कर सकते हैं। ज्ञान स्वयं में वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है। उठो और जागो और तब तक रुको नहीं जब तक कि तमु अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लेते। जब तक जीना, तब तक सीखना, अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है। पवित्रता, धैर्य और उद्यम- ये तीनों गुण मैं एक साथ चाहता हूं। लोग तुम्हारी स्तुति करें या निन्दा, लक्ष्य तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हो, तुम्हारा देहांत आज हो या युग में, तुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो। क्या तुम नहीं अनुभव करते कि दूसरों के ऊपर निर्भर रहना बुद्धिमानी नहीं हैं। बुद्धिमान व्यक्ति को अपने ही पैरों पर दृढ़तापूर्वक खड़ा होकर कार्य करना चहिए।

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