एबीएन सोशल डेस्क। हिंदू धर्म में चार धाम माने गये हैं : रामेश्वरम, जगन्नाथ पुरी, बद्रीनाथ और द्वारका धाम। कहा जाता है कि भगवान रामेश्वरम में स्नान करते हैं, पुरी में भोजन करते हैं, बद्रीनाथ में तपस्या करते हैं और द्वारका में शयन करते हैं। आप इन चारों स्थानों पर जाइए, यह सिर्फ़ कथा नहीं लगती वह अनुभूति बन जाती है।
रामेश्वरम में दर्शन से पहले 22 कुओं में स्नान की परंपरा है। बद्रीनाथ में हिमालय के बीच बैठते ही मन अपने आप ध्यान में चला जाता है। द्वारका में दोपहर को भगवान की अपराह्न निद्रा होती है और उसी समय पूरे शहर की दुकानें तक बंद हो जाती हैं, जैसे भगवान के साथ पूरा नगर भी विश्राम करता हो।
जगन्नाथ पुरी भगवान का भोजन स्थल है। यहाँ भगवान खाते हैं यह बात प्रतीकात्मक नहीं, परंपरागत और व्यवस्थित है। जगन्नाथ मंदिर की अपनी एक विशाल और समर्पित रसोई है, जिसे आप टिकट लेकर मंदिर परिसर के भीतर जाकर देख सकते हैं। सुबह से ही महाप्रसाद की तैयारी शुरू हो जाती है।
भोजन मिट्टी की हांडियों में पकता है। हांडियाँ एक के ऊपर एक रखी जाती हैं नीचे आग जलती है। और चमत्कार यह कि सबसे ऊपर रखी हांडी का भोजन सबसे पहले पक जाता है, जबकि नीचे वाली बाद में। विज्ञान आज भी इसे पूरी तरह समझा नहीं पाया है।
इन हांडियों में 56 भोग महाप्रसाद बनता है। त्यौहार के समय सौ प्लस तरह का प्रसाद चढ़ता है। चावल इसका मुख्य आधार है। यहाँ तक कि एकादशी के दिन, जब सामान्यतः हिंदू घरों में चावल नहीं खाया जाता, जगन्नाथ मंदिर में चावल ही पकता है और वही प्रसाद के रूप में वितरित होता है।
सुबह से दोपहर तक अलग-अलग हांडियों में चावल, दाल, सब्ज़ियाँ और अन्य व्यंजन बनते रहते हैं। फिर यह सब पहले भगवान को अर्पित किया जाता है उसके बाद पूरे दिन भक्त महाप्रसाद ग्रहण करते हैं। दिन में पांच बार भगवान् को भोग लगाया जाता है इसके पश्चात् यह महाप्रसाद बन जाता है।
मंदिर और रसोई क्षेत्र में हर समय एक विशेष गहमागहमी रहती है। पुजारीगण, ऊपर से निर्वस्त्र, धोती और जनेऊ धारण किए, कंधों पर हांडियाँ उठाये भगवान के लिए भोजन ले जाते दिखते हैं। उन्हें स्पर्श करना वर्जित होता है क्योंकि वह भोजन सीधे भगवान को अर्पित होने जा रहा होता है।
और यह केवल जगन्नाथ जी तक सीमित नहीं है। मंदिर परिसर के भीतर सैकड़ों छोटे-बड़े मंदिर हैं सभी को वही महाप्रसाद मिलता है। केवल एक ही मंदिर ऐसा है जहाँ चावल का प्रसाद नहीं चढ़ता उसकी कथा फिर कभी।
जगन्नाथ पुरी में प्रसाद केवल भक्तों के लिए नहीं होता। यहाँ भगवान स्वयं भोजन करते हैं, और फिर भक्त उसी भोजन को उनके साथ साझा करते हैं। यही कारण है कि पुरी का महाप्रसाद सिर्फ़ पेट नहीं भरता मन को तृप्त करता है। यहाँ भगवान सिर्फ़ पूजे नहीं जाते, यहाँ भगवान जीते हैं।
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