श्रद्धा, स्नान और दान का महापर्व कार्तिक पूर्णिमा 5 नवंबर को

 

  • कार्तिक पूर्णिमा का पर्व भारतीय संस्कृति में शुद्धता, त्याग, प्रकाश और भक्ति का है संगम : संजय सर्राफ

एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि इस वर्ष कार्तिक पूर्णिमा का पर्व 5 नवंबर दिन बुधवार को मनाया जाएगा। हिंदू धर्म मे कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि अत्यंत पवित्र मानी जाती है। यह दिन धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। 

इस वर्ष कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि 4 नवंबर को प्रातः काल 10:36 बजे से प्रारंभ होकर अगले दिन 5 नवंबर को सायं काल 6:48 बजे तक रहेगी ऐसे में उदया तिथि के अनुसार इस साल कार्तिक पूर्णिमा का पावन पर्व 5 नवंबर को मनाया जाएगा। कार्तिक पूर्णिमा का पर्व  इस दिन को देव दीपावली, त्रिपुरी पूर्णिमा या गंगा स्नान पर्व के नाम से भी जाना जाता है।

मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार धारण कर सृष्टि की रक्ष की थी। साथ ही यह भी कहा जाता है कि इसी दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक तीन राक्षसों का संहार कर धर्म की पुनर्स्थापना की थी, इसलिए इसे त्रिपुरी पूर्णिमा कहा जाता है। यही कारण है कि यह तिथि भगवान विष्णु, भगवान शिव और देवी लक्ष्मी-तीनों की आराधना के लिए विशेष फलदायी मानी जाती है।

कार्तिक पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान, विशेषकर पवित्र नदियों जैसे गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा या किसी तीर्थ सरोवर में स्नान करने का विशेष महत्व है। इसे कार्तिक स्नान कहा जाता है। स्नान के उपरांत भगवान विष्णु और लक्ष्मीजी का पूजन कर दीपदान किया जाता है। कहा जाता है कि इस दिन दीप जलाने से पिछले सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

कार्तिक पूर्णिमा का व्रत रखने और इस दिन लक्ष्मी नारायण की विधिवत पूजा करने से घर में सुख, संपत्ति और खुशहाली बनी रहती है।इस दिन किया गया दान-पुण्य, तुलसी पूजन, हवन और दीपदान सामान्य दिनों की तुलना में अनेक गुना अधिक फलदायी होता है। कई स्थानों पर रात्रि में दीपावली की भाँति दीप प्रज्वलित कर देव दीपावली मनाई जाती है। 

वाराणसी में गंगा घाटों पर हजारों दीपों की रौशनी से सुसज्जित दृश्य अद्भुत और दिव्य प्रतीत होता है। कार्तिक पूर्णिमा केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्सव का भी प्रतीक है। यह पर्व अंधकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर और असत्य से सत्य की ओर अग्रसर होने का संदेश देता है। 

इस दिन समाज में दया, दान और करुणा की भावना जागृत होती है। तीर्थ स्थलों, मेलों और घाटों पर भक्तों का अपार जनसैलाब उमड़ता है, जिससे यह पर्व लोक-आस्था और एकता का प्रतीक बन जाता है। कार्तिक पूर्णिमा का पर्व भारतीय संस्कृति में शुद्धता, त्याग, प्रकाश और भक्ति का संगम है। यह दिन मानवता को यह सिखाता है कि जीवन में भक्ति, सेवा और सच्चे कर्म का प्रकाश ही सबसे बड़ा दीपक है। 

गंगा स्नान, दीपदान और दान-पुण्य के माध्यम से व्यक्ति अपने मन, वचन और कर्म को पवित्र कर परम आनंद की अनुभूति करता है। इस प्रकार कार्तिक पूर्णिमा केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि आस्था, अध्यात्म और सांस्कृतिक चेतना का उज्ज्वल पर्व है, जो हर हृदय में दिव्यता का दीप प्रज्वलित करता है।

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