टीम एबीएन, रांची। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग व श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारतवर्ष विविधता में एकता का देश है, जहां हर पर्व एक गहरी सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़ा होता है। इन्हीं पर्वों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है विजयादशमी, जिसे आमजन दशहरा के नाम से भी जानते हैं। यह पर्व अश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष विजयदशमी पर्व 2 अक्टूबर दिन गुरुवार को मनाया जा रहा है।
यह नवरात्रि के समापन के साथ जुड़ा हुआ है। विजयादशमी के पर्व के पीछे दो प्रमुख पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं, जो इसे अत्यंत महत्व प्रदान करती हैं।रामायण की कथा के अनुसार, भगवान श्रीराम ने इसी दिन अधर्म, अन्याय और अहंकार के प्रतीक रावण का वध कर सत्य, धर्म और मर्यादा की विजय सुनिश्चित की थी।
यह घटना अयोध्या लौटने से पहले की है और इसी कारण इसे विजय की दशमी कहा जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार, माँ दुर्गा ने महिषासुर नामक असुर का वध कर शक्ति की विजय को स्थापित किया था। नवरात्रि के नौ दिनों तक साधना और उपासना के बाद दशमी के दिन शक्ति की पूर्णता का उत्सव मनाया जाता है।
विजयादशमी का पर्व पूरे भारत में भिन्न-भिन्न तरीकों से मनाया जाता है। उत्तर भारत में रामलीला का मंचन किया जाता है, जिसमें राम, रावण, लक्ष्मण, सीता और हनुमान के चरित्रों को जीवंत किया जाता है। दशहरे के दिन रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पुतलों का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है।
पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड असम और उड़ीसा में यह दिन दुर्गा पूजा का अंतिम दिन होता है, जिसे विजया दशमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन माँ दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है और नारी शक्ति को प्रणाम किया जाता है। महाराष्ट्र में यह दिन शस्त्र पूजन और विजया अभिवादन का अवसर होता है।
दक्षिण भारत में इसे आयुध पूजन और सरस्वती पूजन के रूप में मनाया जाता है, जहां ज्ञान, कला और शस्त्रों की पूजा की जाती है। विजयादशमी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन है। यह पर्व हमें सिखाता है कि कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अधर्म और अन्याय का अंत सुनिश्चित है। यह आत्मबल, साहस, संयम और सत्कर्मों की प्रेरणा देता है।
यह दिन यह भी याद दिलाता है कि हर व्यक्ति के भीतर रावण रूपी अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह और ईर्ष्या को नष्ट करना ही असली विजय है। विजयादशमी का पर्व भारतीय संस्कृति के मूल्यों-धर्म, सत्य, शक्ति और नैतिकता-का प्रतीक है। यह पर्व हर वर्ष हमें अपने भीतर की बुराइयों को पहचानने और उन्हें समाप्त करने की प्रेरणा देता है।
यह पर्व न केवल पौराणिक महत्व रखता है, बल्कि आज के सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में भी इसकी प्रासंगिकता अत्यंत गहन है। इसलिए विजयादशमी केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि मानवता के उत्थान का संदेश है, एक ऐसा पर्व जो हर वर्ष हमें याद दिलाता है कि सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं।
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