ज्ञान और श्रद्धा का समर्पण दिवस गुरु पूर्णिमा 10 को

 

गुरु पूर्णिमा आत्मिक विकास, आत्म संयम और श्रम की योग्यता को निखारने की देता है प्रेरणा : संजय सर्राफ 

टीम एबीएन, रांची। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट व विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि धर्म में गुरु पूर्णिमा को बेहद पवित्र और आध्यात्मिक महत्व का दिन माना जाता है। हर साल यह पर्व आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। यही दिन व्यास पूर्णिमा और वेदव्यास जयंती के रूप में भी श्रद्धा से मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन महर्षि वेदव्यास जी का जन्म हुआ था। 

उन्होंने न केवल महाभारत, बल्कि श्रीमद् भागवत 18 पुराण और ब्रह्म सूत्र जैसे ग्रंथों की रचना करके सनातन धर्म को अमूल्य धरोहर दी। हर वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाये जाने वाला गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख पर्व है, जो इस वर्ष 10 जुलाई, दिन गुरुवार को पड़ रहा है। यह दिन समस्त गुरुओं-आध्यात्मिक शैक्षिक या जीवन के अनुभवों से मार्गदर्शन देने वाले का आदर व आभार व्यक्त करने का शुभ अवसर है। 

गुरु पूर्णिमा का महत्व सनातन धर्म में गुरुशिष्य परंपरा के पवित्र संबंध को प्रणाम करने का होता है। श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण को अर्जुन का गुरू कहकर चिन्हित किया गया है। वेदों में इसे ऋषिपर्व के रूप में पहचाना जाता है, जिसमें सम्मानित ऋषि महर्षियों, विशेषकर ऋषि वशिष्ठ, विश्वामित्र, कणाद, कण्व और उपनिषदाचार्यो को स्मरण किया जाता है। 

शिष्य जन गुरुकुटी में रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे, इस त्योहार से शिक्षकों को अपना सम्मान एवं कृतज्ञता प्रकट करने का परंपरागत तरीका स्थापित हुआ। आध्यात्मिक गुरु के प्रति भक्ति और समर्पण व्यक्त करने का उत्तम अवसर। छाया की भांति गुरु ज्ञान देते हैं,उनके चरणों में सिर नवाकर हम जीवन की अज्ञानता से ज्ञान की ओर अग्रसर होते हैं। यह दिन स्वयं आत्मनिरीक्षण और गुरु के दिखाए पथ पर चलने की इच्छाशक्ति हेतु आदर्श है। 

गुरुकृपा प्राप्ति के साथ सत्कर्म विनम्रता, संयम, संतोष, और आध्यात्मिक एकाग्रता को बल मिलता है। प्रात: स्नान और विष्णु-या श्रीकृष्ण मंत्र से पूजा। गुरु के चरणों में पुष्प-पेन-फल चढ़ाकर, तिलक लगाकर सम्मान। शिष्य गीता, उपनिषद, भगवद्-गीता या अन्य धार्मिक ग्रंथों का पाठ करते हैं। योग, ध्यान और सत्संग करते हुए गुरु-शिष्य मिलन पर चर्चा प्रस्तुत करना आम प्रथा है। 

सामाजिक और धार्मिक सभाओं में श्लोक-भजनों के माध्यम से गुरु-बन्धु वेद्धि होती है। धार्मिक आध्यात्मिक आश्रमों में अनुष्ठान करना और दान-पुण्य व अनुशासन की शिक्षा ग्रहण करना प्रमुख है। गुरु केवल आध्यात्मिक गुरु ही नहीं होते,विश्वविद्यालयों के शिक्षक, कार्यालय में मेंटर्स, क्रिकेट टीम का कोच,जीवन के चौथे सौदृष्टि व प्रेरक, माता-पिता सभी हमारे गुरु हो सकते हैं। 

आधुनिक युग में गुरुओं का सम्मान केवल भावनात्मक पूजन से नहीं, बल्कि उनके वास्तविक योगदान से भी होता है। शिक्षा-संस्थान इस दिन कार्यक्रम आयोजित करते हैं- गुरु सम्मान, टीचर्स डे से तो भिन्न, यह पर्व विशेष आध्यात्मिक धरातल पर आधारित होता है। कॉर्पोरेट जगत में कोचिंग, नेतृत्व-विश्लेषण और परामर्श पूर्वक प्रदान करने वाले लोगों को गुरु कहा जाने लगा है। 

आनलाइन गुरु जैसे कोच, लाइफ सलाहकार, योग-गुरु आदि को भी हम श्रद्धा-पूर्वक स्मरण करते हैं। गुरु-पूजन हेतु कहा जाता है कि जीवन में शुभता, विवेक और तरक्की की प्राप्ति होती है। यह दिन आत्मिक विकास, आत्म-संयम, और श्रम की योग्यता को निखारने की प्रेरणा देता है। पुराणों में भी गुरु पूजन को श्रेष्ठतम पुण्य समझा गया है। 

गुरु पूर्णिमा का पर्व केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि यह ज्ञान की ओर प्रकट सजगता और गुरु के प्रति अविरल श्रद्धा का प्रतीक है। जब हम अपने जीवन में जो कुछ ज्ञान, संयम और पथदर्शन के योग्य बनना सीखते हैं, वह सब संतोष एवं गुरु श्री से ही संभव होता है। 

यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि जहां तक हमने देखा है, वह केवल गुरु की छाया है,और जहां तक देखना है, वह गुरु के अनुग्रह-दीप्त पथ पर चलना है। इस पूज्य पर्व पर हम सभी उन गुरुओं का सम्मान करें,जो दीपक की भांति हमें हर अंधकार से रास्ता दिखाते हैं।

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