एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग व श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी अत्यंत पुण्य दायिनी मानी जाती है। यह दिन भगवान विष्णु के शयन करने और चातुर्मास के आरंभ का प्रतीक है। इस वर्ष देवशयनी एकादशी 6 जुलाई दिन- रविवार को मनाई जाएगी।
देव शयनी एकादशी को हरि शयनी एकादशी पद्मा एकादशी और आषाढ़ी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग की शैया पर योगनिद्रा में चले जाते हैं। यह निद्रा चार महीनों तक रहती है, जिसे चातुर्मास कहा जाता है। इस अवधि में भगवान विष्णु का उत्तरायण से दक्षिणायन गमन होता है, और यह काल तपस्या, व्रत, संयम और भक्ति का होता है।
इस एकादशी को समस्त जगत के पालनकर्ता श्री हरि विष्णु जी की विधिवत पूजा कर शयन कर दिया जाता है, चातुर्मास में श्री विष्णु योग निद्रा में चले जाएंगे,भगवान के शयन के साथ ही विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, उपनयन जैसे शुभ एवं मांगलिक कार्यों पर अस्थायी रोक लग जाती है। यह निषेध कार्तिक माह के देव प्रबोधिनी उठनी एकादशी तक रहता है।
उसके बाद शुभ एवं मांगलिक कार्य प्रारंभ होते हैं और जब भगवान पुनः जागृत होते हैं। देव शयनी एकादशी का व्रत अत्यंत फलदायी माना गया है। इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान कर व्रत का संकल्प लिया जाता है। भगवान विष्णु का पीले पुष्पों, तुलसी पत्र, पंचामृत व धूप-दीप से पूजन किया जाता है। व्रती पूरे दिन उपवास रखते हैं और रात्रि को जागरण कर भगवान के भजन-कीर्तन करते हैं।
एकादशी तिथि का व्रत द्वादशी तिथि पर पारण के साथ संपन्न होता है। शास्त्रों में कहा गया है कि एकादशी का व्रत स्वर्ग और मोक्ष दोनों प्रदान करता है। इसी दिन से सन्यासी, साधु और भक्तजन विशेष तप, नियम और साधना प्रारंभ करते हैं। गृहस्थ जीवन में भी इस काल में तामसिक प्रवृत्तियों से दूर रहकर सात्विक जीवन अपनाने का संदेश दिया जाता है।
देव शयनी एकादशी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह आत्मशुद्धि, आत्मनियंत्रण और आध्यात्मिक उन्नयन का अवसर है। यह दिन हमें भीतर झाँकने, जीवन में संयम लाने और ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना को प्रबल करने की प्रेरणा देता है। जब भगवान विश्राम में हों, तब भक्तों का कर्तव्य है कि वे अपने जीवन को साधना और सेवा में लगाएँ। यही है देव शयन का वास्तविक रहस्य।
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