एबीएन सेंट्रल डेस्क। हमारा भारत कृषि प्रधान देश के रूप में जाना जाता है अफसोस जनक वाली बात यह है कि हमारा भारतीय कृषि एक चौराहे पर खड़ी है जहां उसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जो इसकी स्थिरता और विकास के लिए खतरा है। खास करके जब किसान अपनी फसल रोपाई से लेकर कटाई तक की व्यवस्था करते हैं लेकिन उसमें सभी फसलों के अपने-अपने गुण हैं जिसमें अनाज के भंडारण में किसानों को बहुत ज्यादा समस्या नहीं होती है क्योंकि उनके सड़ने या खराब होने में वक्त लगता है, लेकिन यही बात करें साग- सब्जियां और फलों को खेत से तुरंत बाजार तक पहुंचाना यह बड़ी चुनौतीपूर्ण है।
वहीं मछुआरों के लिए भी उनकी मछलियां जब ट्रांसपोर्ट मे जाती है तो सड़े नहीं इसका भी उन्हें एक समस्या के रूप में होती है। क्योंकि फल, सब्जियों और मछलियों में बहुत जल्द खराब होने की संभावना बनती है क्योंकि ये हवा, नमी, रोशनी, तापमान और माइक्रोबॉयल ग्रोथ के संपर्क में आते हैं जिससे उनकी खराब होने की संभावना बहुत जल्द हो जाती है। इसी वजह से कई बार किसानों को अपनी सब्जियों और तोड़े गये फलों को गंतव्य मंडियों में पहुंचने से पहले दलालों के हाथों कम दामों में बेचना पड़ जाता है यदि ऐसा नहीं करेंगे तो सड़ने के कगार पर आ जाता है।
इसलिए राजा रमन्ना सेंटर फॉर एडवांस्ड टेक्नोलॉजी जो कि परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत आता है उन किसानों को समर्पित किसानों की समस्या को समझते हुए उनके खेतों से मंडियों तक सफर होने में खराब न हो इसके लिए नयी तकनीक शीतल वाहक यंत्र का आविष्कार किया गया है। यह शीतल वाहक यंत्र जिसका नामकरण इन्होंने शिवाय रखा है। यह पूर्ण रूप से किसानों के फलों और सब्जियों तथा मछुआरों के मछलियों के प्रशीतित करता है। मछलियों के रख रखाव के मामले में खास बात यह है कि मछलियों के साथ बर्फ का कोई सीधा संपर्क नहीं होगा, इसलिए कोई संदूषण नहीं होगी।
भारत में वैज्ञानिक और खोजकर्ता लगातार बेहतर करने के लिए प्रयासरत है लेकिन इसमें एक सबसे बड़ी समस्या बीमारियों में इस्तेमाल में आने वाले टीके का ट्रांसपोर्ट से निकल कर आयी कि अखिर कैसे उसे उचित तापमान में मेंटेन करके उन हॉस्पिटल या स्टॉक तक पहुंचाया जाय इसी पर शोध करते शिवाय का प्रशीतन प्रणाली केंद्रित होकर बनाया गया है। तरल नाइट्रोजन आधारित परिवहन योग्य प्रशीतन प्रणाली- शीतल वाहक यंत्र शिवाय को किसी भी तापमान पर, माइनस 70 डिग्री सेल्सियस तक, दवा उत्पादों (टीकों सहित) के परिवहन के लिए विकसित किया गया है। यह 1 हजार क्यूबिक फीट वॉल्यूम का है जो कि इस परिवहन को किसी भी ट्रक पर लगे इस रेफ्रिजरेटेड कंटेनर से किया जा सकता है या इसे किसी भी वाहन के चेसिस पर बनाया जा सकता है।
इसे तरल नाइट्रोजन का उपयोग करके रेफ्रिजरेट किया जाता है। इस तकनीक को भारतीय परिस्थितियों के हिसाब से बनाया गया है और इसका उद्देश्य उबड़-खाबड़ सड़कों पर यात्रा करते समय उच्च रखरखाव जैसी समस्याओं को हल करना है। यह प्रणाली टीके के भंडारण और परिवहन का दोहरा कार्य करती है और इस प्रकार यह एक अद्वितीय उत्पाद है, जो फार्मास्युटिकल कोल्ड चेन में उपलब्ध नहीं है। इसे अस्पताल की इमारत के बाहर भी रखा जा सकता है और यह काम करता रहता है। यह टैंक में तरल नाइट्रोजन को दोबारा भरे बिना 2 से 8 डिग्री सेल्सियस तापमान पर लगभग 4 दिनों तक टीकों को संग्रहीत और परिवहन कर सकता है। इस तकनीक में ताजगी बनाये रखने के लिए तापमान, नमी और नाइट्रोजन वातावरण भी बनाये रखा जाता है।
यह प्रणाली प्रशीतन के लिए न ही डीजल न ही बिजली और न सीएफसी का उपयोग करती है इसलिए 100% पर्यावरण के अनुकूल है। यह कोई प्रदूषक गैस या ध्वनि उत्पन्न भी नहीं करता है। कंटेनर किसी भी आकार का बनाया जा सकता है। परिवहन के दौरान सिस्टम को वाहन या ड्राइवर से किसी इनपुट की आवश्यकता नहीं होती है। उसी सिस्टम को ट्रेन या ट्रक जैसे किसी भी वाहक पर लोड और स्थानांतरित किया जा सकता है और इस प्रकार, यह वास्तव में एक मल्टी मॉडल सिस्टम है।
इस प्रणाली का कुल वजन 30% कम है, अत: देखा जाय तो साफ तौर पर जगह की बचत है। कृषि उत्पादों के लिए यह तकनीक पूरी तरह से भारत के लिए विकसित की गयी है। यह तकनीक पारंपरिक प्रणालियों की तुलना में पूंजी और परिचालन के लिहाज से अधिक किफायती है। इसके कंटेनर अत्यधिक मजबूत होते हैं क्योंकि इन्हें पंखे और वाल्व को छोड़कर कोई डायनेमिक हिस्सा नहीं होता है इसलिए कम से कम टूट-फूट और इसकी रखरखाव में बहुत परेशानी नहीं होती है।
यह 100% पर्यावरण के अनुकूल तकनीक है क्योंकि इसमें कोई सीएफसी नहीं, कोई सीओसी2 नहीं, कोई कार्बन फुटप्रिंट नहीं और न ही कोई डीजल की आवश्कता होती है। इस सिस्टम का जीवन पारंपरिक रीफर कंटेनर से दो-तीन गुना अधिक होगा। इसके माडल की बात की जाये तो इसका 20 फीट शिवाय कंटेनर बनाया गया है और दूसरा इसका 20 फीट स्टेकबल मल्टी मॉडल कंटेनर है जिससे एक के ऊपर एक रख सकते हैं। इसकी विशेषता यह है कि तापमान, नमी और नाइट्रोजन वातावरण नियंत्रण के साथ रेफरीजरेशन लागत काफी कम है क्योंकि 1 किलोग्राम के परिवहन के लिए 1000 किलोमीटर तक 1 रुपये से कम लागत आती है।
इस तकनीक की उपलब्धियां के बारे में बात करते हुए प्रशांत खरे (सीडीसीए विभाग के हेड) ने अपनी पूरी टीम को आभार कहते हुए बताया कि यह तकनीक लंबे समय का मेहनत है जो धरातल पर पूरी तरह से किसानों और फार्मास्यूटिकल्स के लिए समर्पित है। साथ ही यह बताया कि इसे 3000 किलोमीटर के सड़क परीक्षण के बाद इस तकनीक को मेसर्स टाटा मोटर्स और मेसर्स फार्मेक इंजीनियर्स लिमिटेड इंदौर को हस्तांतरित कर दिया गया है।
सीआईएफटी द्वारा विस्तृत गुणवत्ता परीक्षण किया गया जा चुका है जो की विकसित उपकरण भी विनिर्देशों के अनुसार कार्यरत है। इसे डीएसटी और भारतीय राष्ट्रीय इंजीनियरिंग अकादमी द्वारा स्वतंत्र भारत की 75 ऐतिहासिक तकनीकी उपलब्धियां में से एक के रूप में चुना गया है। हालांकि इस अनुसंधान को भारत और चीन में पेटेंट भी प्रदान कर दिया गया है।
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