एबीएन इलेक्शन डेस्क (रांची)। चक्रधरपुर से टोकलो रोड के रास्ते हम खरसावां के कुचाई प्रखंड पहुंचे। शहर की हवा सबको पता होती है, चुनाव का असली खेल तो ग्रामीण इलाकों में होता है। कुचाई के बिरसा मुंडा स्टेडियम में दशरथ गगराई की सभा हो रही थी। मोड़ पर दुकानें हैं, वहां कुछ लोग बैठकर राजनीति पर चर्चा कर रहे थे। हम चुपचाप बैठकर सुनने लगे, भाषा थोड़ी अलग थी, पर भाव समझ में आ गया। वे लोग कह रहे थे कि अर्जुन मुंडा के मुकाबले काम तो कुछ नहीं किया, लेकिन हमेशा मौजूद रहता है।
हेमंत सोरेन के कारण आदिवासी वोट भी मिल ही जायेगा। कुल मिलाकर दशरथ गगराई की स्थिति ठीक ही दिख रही है। उसके बाद हम स्टेडियम में जनसभा की ओर बढ़े। महिलाओं को खरसावां विधायक संबोधित कर रहे थे, पर पंडाल आधा भी नहीं भरा था। बारिश एक वजह हो सकती है, लेकिन महिलाओं में उत्साह की भी कमी थी। सबका ध्यान भाषण पर कम और नाश्ते के पैकेट और बाद में बंटने वाली खिचड़ी पर अधिक था।
अगर हर पंचायत के डेमोग्राफी को देखें तो कुचाई में 60 प्रतिशत आदिवासी हैं। यहां पहाड़ों के ऊपर मुंडा समाज है और बाकी हो या इसाई हैं। मुंडा समाज आमतौर पर भाजपा का वोटर है और हो समाज झामुमो को वोट देता है। झामुमो विधायक दशरथ गगरई हो समाज से आते हैं। खूंटपानी प्रखंड झारखंड मुक्ति मोर्चा का सबसे मजबूत गढ़ है। इसकी वजह कि इस प्रखंड में करीब 65 प्रतिशत इसाई हैं।
इसाई समाज पारंपरिक रूप से कांग्रेस और हाल के वर्षों में झामुमो का एकतरफा समर्थन करता है। खूंटपानी प्रखंड में झामुमो की मजबूती का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले चुनाव में झामुमो के दशरथ गगरई को सिर्फ इस प्रखंड से 20 हजार वोटों की लीड मिली थी। बाकी सभी प्रखंड मिलाकर उनकी लीड करीब 15 हजार वोटों की थी।
इसके अलावा करीब 12,000 मुस्लिम मतदाता एकतरफा झामुमो की तरफ जाते हैं। हो, इसाई और मुस्लिम का कंबिनेशन के कारण दशरथ गगराई लगातार दो बार से विधायक बन रहे हैं। इन तीनों के अलावा थोड़ा-बहुत खुदरा वोट अपने व्यवहार के कारण बटोर ही लेते हैं। महागठबंधन या इंडिया गठबंधन से वर्तमान विधायक दशरथ गगराई को ही टिकट मिलने की संभावना है। वे लगातार 10 सालों से विधायक हैं और क्षेत्र में मजबूत पकड़ है। कोई दूसरा उनके मुकाबले में दिख भी नहीं रहा है।
पति-पत्नी दोनों में से किसी को मिले, प्रतिष्ठा तो पूर्व केंद्रीय मंत्री और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा की ही जुड़ी रहेगी। अर्जुन मुंडा ने खरसावां विधानसभा का 4 बार प्रतिनिधित्व किया है। 1995 में सबसे पहले अर्जुन मुंडा झामुमो के टिकट पर चुनाव जीते। इसके बाद 2000 और 2005 में भाजपा के टिकट पर चुनाव जीते। 2009 में मंगल सिंह सोय अर्जुन मुंडा के ही नाम पर भाजपा से चुनाव जीतकर विधायक बने। एक साल बाद उन्होंने अर्जुन मुंडा के लिए वो सीट छोड़ दी। उसके बाद 2010 में अर्जुन मुंडा उपचुनाव जीतकर दोबारा खरसावां से विधायक चुने गये।
लेकिन 2010 के बाद स्थितियां बदलने लगीं। 2014 में जब पूरे राज्य में भाजपा के पक्ष में हवा थी तो खरसावां में अर्जुन मुंडा के खिलाफ जबरदस्त एंटी-इंकंबेंसी दिखी। दशरथ गगराई ने उन्हें पराजित किया। उसके बाद 2019 के विधानसभा चुनावों में चाईबासा से जवाहर वानरा को लाकर लड़ाया गया। दशरथ गगराई ने जवाहर वानरा को करीब 23 हजार वोटों से शिकस्त दी। दशरथ गगराई को 73, 341 वोट मिले, जबकि भाजपा के जवाहर वानरा को 50, 546 वोट। स्थानीय लोग बताते हैं कि खरसावां विधानसभा में खरसावां के नेता को ही लड़ाना चाहिए। चाईबासा से आदमी लाकर लड़ाने से बाहरी-भीतरी को मुद्दा बनाया जाता है। जवाहर वानरा की बड़ी हार की एक वजह ये भी रही।
भाजपा की ओर से जिस दूसरे प्रत्याशी की चर्चा हो रही है, वो हैं सरायकेला जिला परिषद अध्यक्ष सोनाराम बोदरा। सोनाराम बोदरा ने चंपई सोरेन के साथ ही झामुमो छोड़कर भाजपा ज्वाइन किया है। रांची में उन्होंने भाजपा में शामिल होते वक्त जिस तरह भीड़ जुटायी, उसकी चर्चा रांची तक थी। स्थानीय पत्रकार बताते हैं कि चंपई सोरेन सोनाराम बोदरा को टिकट दिलाने के लिए पैरवी कर रहे हैं। सोनाराम बोदरा हो समाज से आते हैं। इलाके में हो आदिवासियों की अच्छी खासी संख्या है। सोनाराम बोदरा की सभाओं में भीड़ भी जुट रही है।
अगर अर्जुन मुंडा या उनकी पत्नी मीरा मुंडा खुद नहीं लड़े, तो वे अबतक सरायकेला से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ते रहे गणेश महली को खरसावां से लड़वा सकते हैं। गणेश महली अर्जुन मुंडा के करीबी माने जाते हैं। उनके पास चुनाव लड़ने के लिए संसाधनों की कमी नहीं। भाजपा और झामुमो के अलावा खरसावां में इस बार तीसरे मोर्चे की भी खूब चर्चा है।
ये है जयराम महतो की पार्टी की। जेबीकेएसएस खुद चुनाव लड़कर जीत सकेंगे इसकी उम्मीद कम है, लेकिन वो खरसावां विधानसभा क्षेत्र में 12 से 15 हजार वोट लाकर बड़ी पार्टियों की जीत-हार के समीकरण बदल देंगे। जेबीकेएसएस से दो उम्मीदवार टिकट की रेस में हैं। पांडुराम हायबुरु और खूंटपानी प्रखंड प्रमुख सिद्धार्थ होनहागा।
स्थानीय पत्रकारों का आकलन है कि दशरथ गगराई को कोई हरा सकता है तो वे अर्जुन मुंडा ही हैं। लेकिन अर्जुन मुंडा से महतो वोटर नाराज हैं। जेबीकेएसएस फैक्टर अर्जुन मुंडा को ही नुकसान पहुंचयेगा। दूसरी बात जो स्थानीय पत्रकारों ने बतायी कि अर्जुन मुंडा के लोगों ने उनका बहुत नुकसान पहुंचाया है। आम लोगों को अर्जुन मुंडा से मिलने ही नहीं देते। सिर्फ बड़े-बड़े ठेकेदार और जमशेदपुर-आदित्यपुर के धन्नासेठ डेरा डाले रहते हैं। इससे अर्जुन मुंडा की छवि प्रभावित हुई है।
स्थानीय पत्रकारों का ये भी आकलन है कि अगर भाजपा ने सोनाराम बोदरा को टिकट दिया और अर्जुन मुंडा ने दिल से उनका समर्थन किया, तब वो जीत सकेंगे। लेकिन अर्जुन मुंडा चंपई सोरेन के आदमी का खरसावां में समर्थन करेंगे? इसके जवाब में सारे पत्रकार खिलखिला कर हंसने लगे।
हमें खरसावां बाजार में खुपई साई गांव के रहने वाले पूर्व कांग्रेसी दिलीप प्रधान मिले। विजय सिंह सोय के जमाने में उनकी खूब चलती थी। लेकिन हाल के दिनों में उन्होंने राजनीति छोड़ दी है। दिलीप प्रधान गंभीर होकर बताते हैं कि खरसावां में भाजपा को सिर्फ भाजपा हराती है। अर्जुन मुंडा कैसे हारे, पूरा राज्य जानता है। इस बार भी चंपई और अर्जुन मुंडा को लेकर दबी जुबान में चर्चाएं शुरू हो गयी हैं। (लेखक एनएीएफ से जुड़े हैं।)
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