सार्वजनिक संपति पर कब्जा जमाने वाले का समूल नाश हो जाता है : जीयर स्वामी

 

एबीएन न्यूज नेटवर्क, मेदिनीनगर। निगम क्षेत्र के सिंगरा स्थित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान जीयर स्वामी ने कहा कि कभी भी सार्वजनिक संपत्ति, पंचायत की संपत्ति, जनहित की संपत्ति, स्कूल, अस्पताल, अनाथालय, मंदिर, मठ, गोशाला, गुरु, पुरोहित को दान दी हुई भूमि संपति को पुन: स्वीकार, भोग या हड़पना नहीं चाहिए। ऐसा करने से कुल खानदान समाप्त हो जाता है। 

आज का परिवेश ऐसा है कि दादाजी ने स्कूल, मंदिर, मठ, गुरु, पुरोहित सहित सार्वजनिक उपयोग में दान दिया था। अब उनके नाती, पोता कहते हैं कि लिखा पढ़ी नहीं हुआ था हम नहीं मानते हैं। लिखा पढ़ी तो एक कागजी बात है लेकिन जब दिया हुआ था तो दिया हुआ था। ऐसे दान की संपत्ति को अपने पास रख लेते हैं या हड़प लेते है तो जैसे किसी के शरीर पर तेजाब गिर जाने से  शरीर धीरे-धीरे गलकर समाप्त हो जाता है वैसे ही पूरा कुल खानदान समाप्त हो जाता है। 

इसलिए सार्वजनिक उपयोग में की जाने वाली दान की संपत्ति को हड़पने की कोशिश नहीं करनी चाहिए चाहे कारण हो या ना हो कोई देखा हो या ना देखा हो।यही बातों को भगवान श्रीकृष्णा अपने कुल खानदान के बालकों को समझाया लेकिन कुछ मान गये और कुछ नही माने इसका परिणाम अच्छा नहीं हुआ।

अकारण किसी से ईर्ष्या, द्वेष नहीं करना चाहिए

भगवान श्रीकृष्ण धर्म की रक्षा एवम मानव कल्याण के धरती पर आए। कभी जंगलों में रहे कभी मथुरा, ब्रज, गोकुल, बृंदावन में रहते हुए द्वारिका में रहे,लेकिन राजा पौंड्रक अकारण ही भगवान श्रीकृष्ण से ईर्ष्या, द्वेष करने लगा। पौंड्रक पुंड्र देश का राजा था जो, खुद को असली कृष्ण घोषित कर रखा था। राजा पौंड्रक के पास नकली सुदर्शन चक्र, शंख, मोर मुकुट, कौस्तुभ मणि जैसी चीजें थीं। राजा पौंड्रक ने खुद को भगवान विष्णु का अवतार कहता था और द्वारिकधीश श्रीकृष्ण को नकली बताता था।

भगवान श्रीकृष्ण बहुत समय तक पौंड्रक की इन गलतियों को क्षमा करते रहे। एक दिन राजा पौंड्रक ने द्वारिका में श्रीकृष्ण को संदेश भेजा था कि अब धरती पर भगवान विष्णु का असली अवतार हो चुका है। तुम द्वारिका छोड़कर भाग जाओ अन्यथा युद्ध के लिए तैयार रहो। इस संदेश के बाद श्रीकृष्ण और बलराम पौंड्रक से युद्ध किये। युद्ध में पौंड्रक ने श्रीकृष्ण जैसा स्वरूप बना रखा। पौंड्रक भी युद्ध विद्या जनता था। श्रीकृष्ण और पौंड्रक बीच घमासान युद्ध हुआ जिसमें कृष्ण ने पौंड्रक का अंत कर दिया।

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